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वो कौन थी-a ghost story

a ghost story

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देसिकहानियाँ में हम हर दिन एक से बढ़कर एक डरावनी कहानी व लेख प्रकाशित करते हैं। इसी कड़ी में हम आज “वो कौन थी” a ghost story प्रकाशित  कर रहे हैं। आशा है ये आपको अच्छी लगेगी।
लेखक – आदित्य
आज का युग विज्ञानं का युग है, विज्ञानं ने बहुत तरक्की कर ली है, लेकिन आज भी विज्ञानं वहां हार जाता है, जहाँ से दूसरे लोक की शुरुवात होती है. भलए ही विज्ञानं इस बात को ना माने, लेकिन कभी-कभी आँखों से देखे हुए चीज को हम नजर अंदाज भी नहीं कर सकते हैं.बात उस समय की है जब मैं दिल्ली में एक इंस्टिट्यूट में पढ़ता था, मेरे साथ 5 लड़के और 4 लड़कियां भी पढ़ती थी,मतलब हम लोग कुल मिला कर 10 स्टूडेंट थे,दुर्गा पूजा की छुट्टी होने वाली थी और इंस्टिट्यूट 7 दिनों के लिए बंद होने वाला था. हमने बाहर घूमने का प्लान बनाया. हमारे साथ दो पढ़ने वाले लड़के ने ,मना कर दिया, क्योंकि उन्हें घर जाना था, अब हम लोग 8 बचे. जिसमे 4 लड़किया और 4 लड़के थे. लेकिन घूमने कहाँ जाना है तय नहीं हो रहा था, तभी एक ने कहा, गुहाटी या सिक्किम चलते हैं. सभी उसकी तरफ आस्चर्य से देखने लगे, इस पर उसने कहा की क्यों न पहाड़ो का मजा लिया जाए, बाकि जगह तो समतल ही देखने को मिलेगा.उसकी बात में दम था. मैंने भी हामी भर दी. सभी ने तय किया की दिल्ली से कोलकाता फ्लैट से जाएंगे, फिर वहां से एसयूवी कार किया जाएगा और सभी बाय रोड सिक्किम जाएंगे.तय समय के अनुसार सभी एयर पोर्ट पहुंच गए और फ्लैट ले कर कोलकत्ता पहुंच गए. हमने दिल्ली से ही एक एसयूवी कार बुक कर ली. हमने प्लान बना रखा था की हम खुद ड्राइव करेंगे, किसी ड्राइवर को नहीं लेंगे. कोलकत्ता पहुंच कर हमने अपने लिए कार मंगवा ली और सभी उस में बैठ गए और ड्राइव करते हुए निकल पड़े.हलाकि ड्राइवर ने बता दिया था की दुरी बहुत अधिक है, और रास्ता भी सही नहीं है इसलिए उसे ड्राइव करने दे,लेकिन हमने तो पहले ही प्लान बना रखा था इसलिए खुद ड्राइव करने लगे. हमे ये पहले से पता था की समय लगेगा,लेकिन इसी का मजा तो लेने हम दिल्ली से यहाँ आये थे. पहले से तय था की जब रात होगी हम पास के किसी होटल में रुक जाएंगे. फिर सिलसिला शुरू हुआ ड्राइव का और पूरी मस्ती का, जहाँ भी हमे सीन अच्छा लगता हम गाडी रोक कर उतर जाते और फोटो लेना शुरू कर देते. इस तरह हम लोग पूरी मस्ती करते हुए, आगे बढ़ रहे थे. रात होते ही हम पास के होटल में रुक गए और सुबह जल्दी तैयार हो कर एक बार फिर जर्नी शुरू करने के रवाना हो गए. कल हो कर हम लोग सिल्लीगुड़ी पहुंच गए, जहाँ से हमे हसीन वादियां शुरू होने का एहसास होने लगा. पहले हम सिल्लीगुड़ी से दार्जलिंग जाने की सोच दार्जलिंग की तरफ मूड गए. रात को दार्जलिंग में रुक कर फिर अगली सुबह सिक्किम यानी गंगटोक की तरफ बढ़ गए. हमे बहुत अच्छा लग रहा था, लेकिन एक समय ऐसा आया जब हम लोग पहाड़ो की वादियों में गुम हो गए. शायद हम रास्ता भटक गए थे. क्योंकि जिस रास्ते से हम जा रहे थे, उस रास्ते पर कोई और सवारी नजर नहीं आ रही थी, और हम जंगल की तरफ तेजी से बढे जा रहे थे, धीरे-धीरे अँधेरा भी बढ़ता जा रहा था, अब थोड़ी सी चिंता और घबराहट सी महसूस होने लगी थी, क्योंकि सामने कोई नजर नहीं आ रहा था, जिससे पूछ सके की हम लोग जा कहाँ रहे हैं और यह भी समझ नहीं आ रहा था की आगे रास्ता जाएगा कहाँ? लेकिन जो दोस्त ड्राइविंग सीट पर बैठा हुआ था उसका कहना था की रास्ता है तो कहीं ना कहीं निकलेगा जरूर.लेकिन कहाँ उसे खुद नहीं मालूम था. और अब तो अँधेरा भी बढ़ गया था, रात हो चुकी थी और सुन सान जंगल में सिर्फ पत्तो की सरसराहट के साथ हमारे कार की आवाज आ रही थी, कुछ समझ में नहीं आ रहा था की क्या किया जाए? साथ में लड़किया भी थी, जो बुरी तरह से डर गयी थी. लेकिन किया क्या जा सकता था? मुझे जिसका अंदेसा था वही हुआ, क्योंकि आगे जा कर रास्ता खत्म हो गया. मतलब हम रात में जंगल में गुम हो कर रह गए थे. कार की हेड लाइट बंद करके कार को बंद कर दिया गया और चारो और से खिड़की का सीसा बंद कर, गेट को भी बंद कर दिया. क्योंकि रात अब कार में ही गुजारनी थी. अगली सुबह देखा जाता की रास्ता कहाँ से निकलेगा. फ़िलहाल कार में ही सोने का प्लान बनाया गया. और हम लोग बैठे-बैठे ही अपनी अपनी सीट पर आँखे मुंड कर सोने की कोशिश करने लगे. तभी कुछ हलचल सुनाई दी, आँखे खुली तो पाया की सफेद छाया कार के आस-पास चक्कर लगा रही है, बिना रौशनी के यह सफ़ेद छाया हमे दिख रही थी, वो किसी औरत की सफ़ेद छाया थी, जिसके बाल काले-काले और खुले हुए थे, वो जमीन से ऊपर उठ कर उड़ रही थी, जिसे देख कर हमारी साँसे रुक सी गयी थी, हमे समझ में नहीं आ रहा था की हम क्या करे? तभी हमे एहसास हुआ की हमारी कार के ऊपर कोई कूद रहा है, अचानक से खिड़की के सीसे से किसी ने हमारी और झाका, जिसका चेहरा देख कर हम पूरी तरह से घबरा गए, चेहरे पर आँखे और नाक नहीं थी, चेहरा बिलकुल कला और डरवाना नजर आ रहा था, जिसे देख कर अचानक से लड़किया चीख पड़ी और बेहोश हो गयी. मैं भी पूरी तरह से दार गया था, भले दिल को समझा रहा था की डरना नहीं है लेकिन मैं भी काफी डर गया था, ड्राइविंग सीट पर बैठे मेरे दोस्त ने अचानक से कार स्टार्ट की और पीछे की तरफ कार को ले जाने लगा, वो भी बहुत ही तेजी से लेकिन ये क्या कार का पिछला छक्का तो जमीन को छू ही नहीं रहा था, वो जमीं से ऊपर था, अब तो और डर हो रहा था, तभी मेरे पास बैठे दोस्त ने जोर जोर से हनुमान चालीसा पढ़ना शुरू कर दिया.

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अचानक कार का पिछला हिस्सा जमीं को छुआ और तेजी से कार पीछे की तरफ चलने लगी, ड्राइविंग सीट पर बैठा दोस्त पसीना पोछते हुए लगातार तेजी से कार को भगाये जा रहा है, वहीँ पास में बैठा दोस्त जोर जोर से हनुमान चालीसा पढ़े जा रहा है, जबकि वो छाया भी हमारे कार के साथ बढ़ती जा रही थी, कुछ दूर तक लगातार कार के जाने के बाद हमे अचानक से एक सड़क नजर आयी और दोस्त ने कार को सड़क पर ले आया, सड़क पर चलने के बाद वो छाया नजर नहीं आ रहा था, मेरी समझ में ये नहीं आ रहा था की छाया ने हमारी मदद की या फिर फिर हमे डराया या फिर हम उनके एरिया में चले जाने से उन्हें अच्छा नहीं लगा, जिसकी वजह से उन्होंने ऐसा कुछ किया. खैर जो भी हो आज भी जब वो डरावना चेहरा और रात का मंजर याद आता है तो दिल में डर सा होता है.
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