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शिक्षक की अनमोल सीख-A Hindi moral story of 2018


एक शिक्षक अपने एक संपन्न परिवार के युवा शिष्य को अपने साथ एक खेत की तरफ टहलने के लिए ले गया। बहुत दूर जाने के बाद खेतो के बीच किनारे उस शिष्‍य को रास्ते में पुराने हो चुके एक जोड़ी जूते उतरे देखे जो शायद उस खेत में काम करने वाले किसी गरीब मजदूर के थे।
वह मजदूर जल्‍दी-जल्‍दी अपना काम पूरा कर घर जाने की तैयारी कर रहा था, ऐसा लग रहा था कि वह बहुत जल्‍दी में हैं। शिष्य को उस मजदूर के साथ मजाक करने का मन हुआ और उसने अपने शिक्षक से कहा, “गुरु जी क्यों न हम यह जूते कहीं छिपा दें और फिर झाड़ियों के पीछे छिप कर देखें कि वह मजदूर जूते न पाकर क्‍या करता है।
शिक्षक ने बड़े ही गंभीरता से उस शिष्‍य से कहा, “किसी गरीब के साथ इस तरह का भद्दा मजाक करना ठीक नहीं है। क्यों ना तुम इन जूतों में कुछ रूपए डाल दो और फिर देखो की उस मजदूर पर क्‍या प्रभाव पड़ता है। शिष्य ने अपनी जेब से 200 रूपए निकाल कर उस पुराने जूते में छिपा दिए, और दोनों पास की झाड़ियों में छुप गए।
कुछ देर बाद ही मजदूर उस जगह आ गया जहां जूते रखे हुए थे। पहले तो उसने अपने पैरों में चुभे कांटे निकाले और फिर उसने जैसे ही एक पैर जूते में डाले, उसे जूते में किसी चीज का आभास हुआ। उसने जल्दी से जूते हाथ में लिए और देखा की जूते के अन्दर 100-100 के दो नोट रखे हुए हैं। उस मजदूर को बहुत ही आश्चर्य हुआ। वह उन 200 रूपए को लेकर बड़े गौर से उन्हें पलट-पलट कर देखने लगा।
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मजदूर ने खेतो के चारो ओर देखा। उसे दूर-दूर तक कोई नज़र नहीं आया तो उसने वह 200 रूपए अपनी जेब में रख लिए और मजदूर बहुत ही भावविभोर हो गया, उसकी आँखों में आंसू आ गए। उसने हाथ जोड़ ऊपर देखते हुए कहा,
हे भगवान, तेरा बहुत धन्यवाद जो तुमने समय रहते मुझे 200 रूपयों दे दिए और उस अनजाने व्‍यक्ति का भी लाख-लाख धन्यवाद, आज उसकी सहायता और दयालुता के कारण मैं मेरी बीमार पत्नी को दवा और भूखें बच्चों को रोटी खिला सकुंगा।”
पास ही छाडि़यों में छिपे शिक्षक और शिष्‍य की आँखों में आँसू भर आए, उस मजदूर की बातों को सुनकर। शिक्षक ने अपने धनी शिष्य से कहा, “क्या तुम उसके साथ मजाक करते वह अच्‍छा था या तुमने उसके पूराने जूतों में कुछ रूपए ड़ाल दिए वह अच्‍छा है।
शिष्य बोला, “सर आपके कारण आज मुझसे बहुत बड़ा पाप होते-होते बच गया। आपके द्वारा आज जो पाठ मैंने सीखा है, उसे मैं अपने पूरे जीवन याद रखुंगा। आज मैं उन शब्दों का मतलब समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले कभी नहीं समझ पाया था कि लेने की अपेक्षा देना कहीं अधिक आनंददायी है।
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