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कसक-a new cute love story of a couple about the rudeness of life in hindi language

कसक
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कम्बख्त जिंदगी भी कभी -कभी ऐसे मोड़ पर ले आती है ,ऐसे हालातों से सामना कराती है जिसकी कल्पना भी नहीं कर सकते। ट्रैन में वो अकेली सफर कर रही थी। एक शख्स का मिलना मानो जिंदगी में एक संजीवनी के मिलने के समान था। वो बगल की सीट पर बैठ गया। बाहर रिमझिम बारिश हो रही थी। उम्र के इस मोड़ पर भी कम्बख्त वैसा ही था। कुछ भारी जरूर हो गया था। उसने जेब से चश्मा निकाला और मोबाइल में लग गया। मेरे सिर के बाल सफ़ेद थे लिहाजा उसे छिपाने के लिए सिर पर पल्लू डाल लिया। बाथरूम से लौटी तो उस महाशय को अपनी सीट पर काबिज़ पाया। थोड़ी देर में आपका सीट छोड़ दूंगा -उसने कहा। वह मोबाइल में खो गया। वह दस सालों में ही मुझे भूल चुका था। शादी शुदा है ,मैं भी शादीशुदा हूँ। सपनो में जीने के लिए उसके सानिध्य की कल्पना भर कर सकती हूँ। कभी प्यार का इज़हार नहीं हुआ , छुपी हुई चाहते तो थी। उसकी हर कविता ,शायरी में खुद को खोजा करती थी। बस एक दूसरे का हम दोनों केयर करते थे। दोनों की शादी हो गई। ऐसे ही जिंदगी गुजर गई। उसने ठीक से नज़रें उठाकर मुझे देखा तक नहीं। अचानक टीटी आ गया। मैंने अपना टिकट दिखा दिया उसने कहा कि उसके पास टिकट नहीं है। उसने फाइन के साथ कानपूर तक का टिकट लिया। मुझसे नहीं रहा गया मैंने पूछा कानपुर में कहाँ रहते हो ? कहीं नहीं -उसने मोबाइल में नज़रें गड़ाये ही बोला। किसी काम से जा रहे हो ? हाँ। शायद वहाँ नौकरी करते हो ?’ नहीं उसने कहा। अब मेरी हिम्मत नहीं हुयी कि कुछ और पूंछूं . कुछ देर बाद वह खुद ही बोला ये भी पूछ ही लो कि क्यों जा रहा हूँ कानपुर ?’ मेरे पूछने पर उसने बताया कि एक पुरानी दोस्त मिल गई है जो आज अकेले सफर पर जा रही है। फौजी आदमी हूँ सुरक्षा करना मेरी नैतिक जवाबदेही है। बस उसे ही कानपुर तक छोड़ने जा रहा हूँ। कहाँ है तुम्हारा दोस्त -मैंने उतावलेपन में पूछा। यहीं मेरे पास बैठी है ना। अब समझ में आया कि क्यों उसने टिकट नहीं लिया। वह सिर्फ मेरे लिए दिल्ली से कानपूर तक का सफर कर रहा था। आँखों में आंसू आ गए। तुम मर्द हो ना ,नहीं समझ सकते कि रो क्यों रही हूँ। उसने कहा -एक कवी और लेखक भी हूँ सब समझ सकता हूँ। शुक्रिया ,पहचानने के लिए। मैंने आंसूओ पोछते हुए कहा। तुम्हारे साथ कोई नहीं था इसलिए आना पड़ा। तुमको यूँ अकेले सफर नहीं करना चाहिए। भाई दिल्ली में है इसलिए राखी बाँधने चली आई थी। ऐसे भाइयों को राखी बाँधने गई थी जिसे यह भी फ़िक्र नहीं कि उसकी बहन इतना लंबा सफर अकेली कैसे करेगी ? भाई शादी के बाद भाई जैसा रहे ही नहीं स्नेह का बंधन कब का टूट चुका। । वे लोग भाभीयों के हो गए। मम्मी -पापा भी नहीं रहे। कहकर मैं उदास हो गई। तो पति को तो समझना चाहिए। उनकी बहुत बिजी लाइफ है मैं उनको डिस्टर्ब नहीं करना चाहती। मेरी याद आती थी तुम्हे ,-मैंने हिम्मत करके पूछा। उसने कोई जवाब नहीं दिया। उसने हाथ में पहना ताम्बे का कडा दिखाया जो मैंने उसे फ्रेंडशिप डे उसे दिया था। यही अक्सर तुम्हारी याद दिला देता था -उसने कहा।
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अब तो दोनों की अलग -अलग जिंदगी है। है ना ? मैंने डरते हुए कहा -तुम्हे छु लूँ ? पाप नहीं लगेगा -उसने कहा। फिर कानपुर तक उसका हाथ पकडे बैठी रही। कानपूर पहुंची वह मुझे घर छोड़कर चला गया। उसके बाद कोई बात नहीं हुयी क्योंकि हमने एक दूसरे का नंबर तक नहीं लिया था । एक अजीब था यह रिश्ता। प्यार था , आकर्षण था पर गरिमा के आवरण से ढंका हुआ। एक महीने बाद अखबार में पढ़ा कि वह देश के लिए शहीद हो गया। मेरे ऊपर क्या गुजरी होगी इसकी कल्पना कर लीजिये। लोक -लाज की दर से उसके अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाई। एक साल गुजर गए। रक्षाबंधन के दूसरे दिन दिल्ली से कानपुर लौट रही हूँ अकेली ,उदास इस आस में बैठी हूँ कि वह खिड़की के पास बैठा मिलेगा। हमसफ़र नहीं रहा बस यादें ही हमसफ़र बन कर रह गई। जिंदगी के सफर में कौन साथ चलता है कौन साथ छोड़ देता है किसी को नहीं मालूम -स्मृतियाँ साथ रह जाती है जो कभी गुदगुदाती हैं तो कभी रुलाती भी है।

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