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उपनिषद से-a new hindi inspirational story of lord brahma ji

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राजा दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन देवासुर संग्राम में ,देवताओं की सहायता हेतु देवराज इंद्र के पास गए। वहाँ देवराज ने उनके शौर्य से प्रसन्न होकर कहा हे प्रतर्दन मैं तुम्हे कौन सा वर प्रदान करूँ ? वीर प्रतर्दन ने कहा -हे देवेंद्र ,कोई ऐसा वर दें जो मानव -जाति के लिए परम कल्याणकारी हो। इंद्रा ने कहा -हे राजन ,यह सर्वविदित है की कोई भी दूसरे के लिए वर नहीं मांगता ,इसलिए आप अपने लिए कोई वर मांगे .प्रतर्दन ने कहा ,तब तो मेरे लिए वर का अभाव ही रह गया। तब देवराज इंद्रा ने अपने यतार्थ स्वरुप के बारे में बताया। प्रजापति के पुत्र विश्वरूप को जिसके तीन सिर थे उसे मैंने ही अपने वज्र के प्रहार से मार डाला। कई बार प्रह्लाद के सहयोगी दैत्य राजाओं को मौत की नींद सुला डाला। अतः जो मुझे ठीक से जान ले उसके पुण्य लोक की किसी भी कर्म से एक रोम को नुक्सान नहीं पहुंचता .
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देव प्रवृतियों के बचाव के लिए किसी आतातायी का वध भी करना पड़े तो उस क्रिया का पातक नहीं लगता। आयु ही प्राण है और प्राण ही आयु है। इस शरीर में जब तक प्राण का निवास है ,तभी तक आयु है। एक बार महर्षि नारद ने ब्रह्माजी से प्रश्न किया की ,हे भगवन ,जन्म- मरण के चक्र से पार लगाने वाला कौन सा मंत्र है ? आपकी शरण में आया हूँ कृपया बताने का अनुग्रह करें। भगवान् ब्रह्मा जी ने तथास्तु कहकर उपदेश देना शुरू किया। कहा -हे नारद ,ओंकार ही तारक मंत्र है। यही तो ब्रह्म का स्वरुप है। ब्यष्टि और समस्टी ब्रह्म -प्रणव के अंग -अवयव हैं। ब्रह्म क्या है नारद जी ने पूछा। इसका क्या स्वरुप है? ब्रह्मा जी ने कहा -अपना निजस्वरूप आत्मा ही तो ब्रह्म है।

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