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असीम भक्ति-A new Hindi religious story of rishi mandukhi

असीम भक्ति
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माण्डुकी नाम के एक ऋषि थे। इनकी कई पत्निया थी। इन्ही में से एक पत्नी का नाम इतरा था। वह ईश्वर की परम भक्त थी तथा वह अत्यंत ही पवित्र जीवन व्यतीत करती थी। उसने पुत्र प्राप्ति के लिए कठिन तप किया। ईश्वर उसकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर उसकी इच्छा को पूरा कर दिया। उसके घर में एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ। वह बालक अत्यंत ही आकर्षक और सुन्दर था। उस बालक का नाम महिदास रखा गया। यह बालक बचपन से ही अलौकिक एवं चमत्कारिक घटनाओं का जनक था। उसके चेहरे से तेज़ निकलता प्रतीत होता था। आठवें साल में उसका यज्ञोपवीत संस्कार कराया गया। पिता ने वेद पढ़ाना चाहा पर उसने नहीं पढ़ा। पिता निराश हो गए और उसे मुर्ख समझते हुए उसकी तरह ध्यान देना बंद कर दिया। माता की तरफ से भी उन्होंने मुंह फेर लिया। माण्डुकी ऋषि के दूसरी पत्नियों से भी अनेक पुत्र हुए। बड़े होने पर सभी वेदों के एवं कर्मकांड के ज्ञाता हुए। उनकी ही घर में पूछ होती थी। महिदास उपेक्षित थे। उनकी माताओं की ही पूछ होती थी, पर महिदास को कोई फर्क नहीं पड़नेवाला था वह हर समय भगवान् के ध्यान में मग्न रहता और एक मंदिर में पड़ा रहता। .एक दिन उसकी माँ को बहुत दुःख हुआ वह अपने पुत्र से मिलने मंदिर पहुंची और कहने लगी ,-‘पुत्र तुम्हारे होने से मुझे क्या मिला ? तुम्हे तो कोई पूछता तक नहीं और मुझे भी सब घृणा की दृस्टि से देखते हैं। बताओ ,ऐसे जीवन से क्या लाभ ? माता की दुखभरी बातें सुनकर महिदास ने कहा -माता ,तुम तो इस संसार में आसक्त हो ,जबकि यह संसार और इसके सब भोग नाशवान हैं।
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केवल ईश्वर का नाम ही सत्य है। पर मेरा अपने माता के लिए भी कुछ कर्तव्य हैं। मैं उसे पूरा करूंगा मैं तुम्हे ऐसे जगह पदासीन करूंगा जहां अनेक जन्मो में भी पुण्य करके नहीं पहुंचा जा सकता है। महिदास ने भगवान् विष्णु के सच्चे ह्रदय से विधानपूर्वक स्तुति की और भगवान् प्रसन्न होकर उन्हें और उनकी माता को आशीर्वाद दिया। उन्होंने कहा। पुत्र ,यद्यपि तुमने वेदों का अध्ययन नहीं किया है किन्तु मेरे आशीर्वाद से सभी वेदों के ज्ञांता और प्रकांड विद्धान हो जाओगे। तुम वेद के एक अज्ञात भाग की खोज करोगे। वह तुम्हारे नाम से ऐतरेय ब्राह्मण कहलायेगा। विवाह करो और और सभी सुबह कर्म करो। लेकिन आसक्त कदापि मत होना। तुम इस संसार में नहीं फंसोगे . तुम कोटितीर्थ नामक स्थान पर जाओ। वहाँ पर हरिमेधा यज्ञ कर रहे हैं। वहाँ जाने पर तुम्हारी माता की सभी इच्छाएं पूर्ण हो जाएंगी। इतना कहकर भगवान् अंतर्ध्यान हो गए। अब माता और पुत्र ईश्वर की आज्ञा का पालन करते हुए हरिमेधा के यज्ञ में पहुँच गए। उनकी तेज और विद्वता से सभी विद्वान् प्रभावित हुए और उन्होंने वेद के नवीन चालीस अध्याओं का पाठ किया। जो अब तक ये पाठ पूरी तरह अज्ञात था। हरिमेधा ने उन्हें ऊँचे आसन पर बैठाया। और अपनी पुत्री से विवाह कराया। उनका नाम सदा के लिए अमर हो गया।

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