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झेलम के किनारे-A new hindi short motivational story of the sultaan of Kashmir

A new hindi short motivational story of the sultaan of Kashmir

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हब्बा खातून कश्मीर के परिवार में जन्मी थी। अप्रतिम सौंदर्य की धनी , प्यार से लोग उसे जून यानि चाँद कहकर बुलाते थे। वह अपने विवाहित जीवन से खुश नहीं थी। एक दिन वह अखरोट के बगीचे में गए रही थी तभी कश्मीर के सुलतान युसूफ शाह चक की नज़र उसपर इनायत हुई और वह उनकी मलिका बन गई। कश्मीर के कोयल का जीवन एक नए मोड़ पर खड़ा था। अकबर का स्वप्न कश्मीर पर विजय पताका फहराना था। उसने दो बार सुलतान को बुलावा भेजा। बर्ष १५८५ में अकबर की विशाल सेना कश्मीर की सीमा में प्रवेश कर चुकी थी। सुलतान ने भरसक रोकने की कोशिश की। अत्यधिक ठण्ड के कारण अकबर की इच्छा पूरी ना हो सकी। सुलतान का भाई लोहार चक खुद शासक बन बैठा। दुखी सुलतान ने मानसिंह से सम्पर्क साधा। युसूफ अकबर बादशाह के दरबार में हाज़िर हुये अकबर ने मानसिंह को उनके साथ एक बड़ी सेना के साथ भेजा। युसूफ शाह को लगा की उन्होंने बड़ी गलती कर दी है। वे मानसिंह को सरहद पर रोककर सेना के साथ स्वयं गए और लोहार चक के मंत्री को पराजित कर पुनः गद्दी हासिल कर ली। वे मुग़ल के अधीन नहीं रहना चाहते थे ,अकबर ने युसूफ को अपने दरबार में बुलाया। वे नहीं गए। आठ हज़ार सैनिकों के साथ एक दाल कश्मीर पहुंचा।
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कड़ाके की ठण्ड थी। किसी तरह युसूफ को भरोसे में लेकर अकबर के दरबार में युसूफ को लाया गया। युसूफ को गिरफ्तार कर लिया गया। दुखी भगवानदास जिन्होंने भरोसा देकर युसूफ को दरबार में ले गए थे ,इस विश्वासघात के कारण आत्महत्या कर ली। युसूफ शाह चक को टोडरमल के अधीन कर दिया गया। फिर मनसबदार बनाकर बिहार भेज दिए गए। कहाँ कश्मीर की ठंडक और कहाँ बिहार की भीषण गर्मी ,नालंदा में युसूफ शाह का इंतकाल हो गया। जहां उनकी आज भी समाधि है। मुगलो ने बर्ष १५८६ में कश्मीर पर फतह कर लिया। बाद में अफगानो औरसिक्खो ने कश्मीर को अपने- अपने कब्जे में लिया। १९३१ में कश्मीरियों ने डोगरा राजा के अत्याचार से तंग आकर विद्रोह कर दिया। कश्मीर के सुलतान जब बंगाल और बिहार की गर्मियों में झुलस रहे थे तब हब्बा खातून भी कश्मीर में जुल्मो और दुश्वारियों सामना कर रही थी।वियोग की पीड़ा के वावजूद झेलम नदी के किनारे ,घाटी में भटकते वे प्रेम और सौंदर्य के गीतों की रचना करती रही। चिनार के पेड़ों के नीचे उदासी के मंजर में गीत गुनगुनाती थी। युसूफ साह की याद में कवितायें लिखकर अपने मनोभावों को समेटे जिंदगी गुजार दी। चिनार के पेड़ और झेलम नदी के प्रवाह उसके दर्द के साक्षी बने।

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