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दूसरा जनम-a new inspirational And motivated story in hindi language

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कभी-कभी जीवन में कुछ ऐसा घट जाता है, जिसकी याद सदा बनी रहती है. मुझे जब भी वह दिन याद आता है, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं और फिर घंटों उस घटना के बारे में सोचती रहती हूं. और लाख कोशिश करने पर भी वह बात दिल और दिमाग़ से हटती ही नहीं.
मैं जब छोटी थी, तो ज़्यादातर खेलने में ही ध्यान रहता. पढ़ने में मन लगता ही नहीं था. संयुक्त परिवार था हमारा. हम छः-सात भाई-बहन स्कूल जाते एक साथ. मां और चाची सुबह से उठकर हमें उठाने और तैयार करने में लग जाती थीं. सुबह सात बजे बुलाने वाली आ जाती थी. वह कई घरों से बच्चों को जमा करके स्कूल पहुंचाती थी.
दोपहर को स्कूल से लौटने के बाद मां-चाची हमें बिस्तरों पर सोने के लिए लिटा देतीं. हमें सुलाते-सुलाते मां और चाची की तो आंख लग जाती, लेकिन हमारी आंखों में नींद कहां? हम चुपके से उठ कर दरवाज़ा खोल बाहर निकल जाते खेलने के लिए. बीच में मां की आंख ख्ुलती, तो हमें न पाकर ग़ुस्से में बाहर आती और फिर पकड़कर अन्दर ले जाकर फिर से डांट-डपटकर सुला देती. कई बार जब हम बहुत शैतानी करते, तो हमारी पिटाई भी कर देती. मां से हमें डर भी बहुत लगता था, लेकिन हम भी मजबूर थे मन तो हमेशा खेल-कूद में ही लगा रहता था.
इसी तरह हमारे दिन बीत रहे थे. जाड़ा हो, गर्मी हो या बरसात, दोपहर को खाना खाकर 15-20 मिनट लेटना ही हमारे लिए काफ़ी था. दो-चार बच्चे पड़ोस के भी आ जाते और हम, खूब उत्पात मचाते. कभी ‘‘छिपा छिपौअल’’ खेलते तो कभी कुछ और.
पिताजी का बड़ा रौब था घर में. शाम को जब उनके द़फ़्तर से आने का समय होता तो हम सब घर के अन्दर आ के चुपचाप से अपनी-अपनी किताब निकाल कर पढ़ने बैठ जाते. पिताजी हमें बहुत सीधे-सादे और अच्छे बच्चे समझते. लेकिन हैरानी की बात ये थी कि इतनी शैतानी और खेलकूद के बावजूद हम सब पढ़ने में अच्छे थे और हमेशा अव्वल नंबर से पास होते थे. पिताजी को हमारी पढ़ाई पर नाज़ था. जब हम अपना रिपोर्ट कार्ड लेकर घर आते तो वह बहुत ख़ुश होते थे, यह देख कर कि हम सब कितने अच्छे नंम्बर से पास हुए हैं.
उन दिनों बरसात का मौसम था और हमारे घर के पास ही एक और घर बन रहा था. जगह-जगह चूने, मिट्टी और ईटों के ढेर लगे हुए थे. उन ईंटों के बीच में ही हम लुकने-छिपने का खेल खेलते थे. घर बनाने के लिए पानी की ज़रूरत होती है. इसलिए जब भी ऐसा कोई बिल्डिंग बनाने का काम होता है, तो पास में ही पानी के लिए एक बड़ा-सा गड्ढा खोद कर उसमें पानी भर देते हैं. उस समय भी जब घर बन रहा था तो गड्ढा खोदा गया था और उसे पानी से भर दिया गया था. हम सब काग़ज़ की नावें बना-बनाकर उसमें डालते और देखते कि किसकी नाव कितनी देर तैर कर पानी में डूबती है. जिसकी नाव सबसे देर तक तैरती रहती, वही जीत जाता.
एक दिन बारिश बहुत हुई थी और हर तरफ़ फिसलन हो गई थी. बारिश के पानी से वह गड्ढा और भी भर गया था. हमारा नावों का खेल ज़ारी था. कोई 10-12 नावें गड्ढे में तैर रही थीं. सब अपनी-अपनी नाव को संभाल रहे थे. ठण्डी हवा चल रही थी. बहुत ही सुहावना मौसम था. बड़ा ही आनन्द आ रहा था. पांच वर्ष का मेरा छोटा भाई भी खेल में शामिल था, एक नाव उसकी भी थी. एक छोटी डण्डी उसके हाथ में भी थी. वह भी अपनी नांव को सम्भाल रहा था. देखते-देखते उसकी नाव बहकर पानी में कुछ दूर चली गई. अपनी डण्डी से वह उसे अपने पास लाने की कोशिश कर रहा था.
इसी चक्कर में मेरे भाई ने ज़रा-सा अपना पैर आगे बढ़ाया ही था कि वह फिसल गया और गड्ढे में जा गिरा. अब वह उस पानी में डुबकी लगाने लगा. उसने हाथ ऊपर किए, मैंने उसका हाथ पकड़ने की कोशिश की, लेकिन मैं भी फिसलने लगी. बाकी के बच्चों ने जब यह देखा, तो इस डर से भाग गए कि कहीं उन पर दोष न लग जाए कि तुमने धक्का दिया होगा. मैं अब अकेली रह गई, निस्सहाय! मुझे रोना आ गया. रोते-रोते मेरी हिचकियां बंध गईं. भाई कभी डूबता, कभी उतराता. उसकी हालत ख़राब होती जा रही थी और मेरे पास रोने के अलावा और कोई चारा नहीं था. उसे अकेला छोड़कर भी नहीं जा सकती थी. मैं मन-ही-मन भगवान को याद कर रही थी कि मेरे भाई को बचा लो. मां ने एक बार हमें बतलाया था कि जो भी सच्चे मन से भगवान को पुकारता है, उसकी सहायता के लिए वे अवश्य ही आते हैं.
तभी पड़ोस के घर से उनका नौकर अपना काम ख़त्म करके बाहर निकला. उसने मुझे अकेले खड़े रोते देखा. मेरे पास आया और बोला, ‘‘बेबी क्या बात है? क्यों रो रही हो?’’ मेरे मुंह से बोल नहीं निकले. रुलाई और भी ज़ोर से छूट गई. मैंने इशारे से कहा, ‘‘वो…वो देखो.’’
‘‘उसने देखा तो एक क्षण भी सोचे बिना वह गड्ढे में कूद गया और भाई को गोदी में उठा लिया और पानी और फिसलन में से बड़ी मुश्किल से गड्ढे में से बाहर निकला और मेरे पास आकर बोला, ‘‘चलो बेबी, तुम्हें घर पहुंचा दूं.’’
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हम जब घर आए, तो भाई की ऐसी हालत देखकर मां हक्की-बक्की रह गई. इससे पहले कि वह कुछ बोलतीं, नौकर बोला, ‘‘लो माईजी, सम्भालो अपने लाड़ले को. आज तो भगवान की बड़ी कृपा हो गई. बस समझ लो बाबा को नई ज़िन्दगी मिली है. यदि मैं समय पर न पहुंचता तो पता नहीं क्या हो जाता. मुझे तो, समझो, भगवान ने ही भेज दिया.”
मां ने लपककर भाई को अपनी गोदी में उठा लिया. उनकी आंखों में आंसू आ गए. पूछने लगी, ‘‘क्या हो गया इसे? ये सब क्या हुआ? क्यों हुआ? कैसे हुआ?’’ एक साथ घबराहट में इतने सारे प्रश्‍न पूछ डाले उन्होंने. तब नौकर ने पूरी बात बताई, ‘‘माईजी, वो तो आपकी तक़दीर अच्छी थी. थोड़ी भी और देर हो जाती तो मालूम नहीं क्या होता. बाबा बच गया! अब तो आप लड्डू मंगाकर भगवान का भोग लगाइए और सारे मोहल्ले में बांटिए. बाबा का नया जनम हुआ है.’’ मां ने तुरन्त रुपए निकालकर उस नौकर को दिए और कहा, ‘‘तुमने इतना बड़ा काम किया है, अब तुम्ही लड्डू भी लाओ, फिर शाम को हम सब मन्दिर जाकर भगवान का भोग लगाकर आएंगे.’
शाम को पिताजी जब द़फ़्तर से आए और उन्हें यह सब हाल पता चला, तो उन्होंने भगवान का बड़ा धन्यवाद किया- बड़ी प्रार्थना की, ‘हे प्रभो ! तुमने ही मेरे बेटे की ज़िन्दगी बचाई है. हे भगवान, तुम्हारे बड़े लम्बे हाथ हैं. तुम्हारी इस कृपा के लिए हम सब नतमस्तक हैं.’’ फिर भाई को गोदी में लेकर बहुत प्यार किया और मुझे भी अपने पास बुलाकर प्यार किया और कहने लगे, ‘‘तेरी वजह से ही इसकी जान बच गई. तू भी अगर और सबकी तरह भाग जाती, तो वह नौकर गड्ढे में झांकने थोड़े ही आता!’’
शाम को हम सब मन्दिर गए, प्रसाद चढ़ाया भगवान को. मां ने भाई के हाथ से बहुत-सा दान-पुण्य करवाया.
उस दिन मेरी समझ में आया, कि दिल की पुकार भगवान ज़रूर सुनते हैं. मेरी आवाज़ उन्होंने सुनी और नौकर के रूप में आकर भाई को बचा लिया.
मेरा वह भाई अब बहुत बड़ा हो गया है. बाल-बच्चोंवाला है और नौकरी से रिटायर भी हो गया है. हम लोग कई बार उस घटना की बातें करते हैं और हर बार भगवान की कृपा के लिए नतमस्तक हो जाते हैं. मुझे आज भी जब कभी उस घटना की याद आती है, तो पूरे शरीर में सिहरन-सी दौड़ जाती है और रोंगटे खड़े हो जाते हैं. सचमुच मैं तो यही समझती भी हूं कि मेरे भाई का दूसरा जनम ही हुआ था- यही सच भी है कि पूर्ण रूप से आश्रित होकर- शरणागत होकर सच्चे दिल से जो भगवान को पुकारता है, उसकी सहायता के लिए वे नंगे पैरों दौड़े आते हैं.
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