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अचीवमेंट-a new motivational story on the achievement of a girl

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रात के ग्यारह बज रहे थे. रमा ने सोने से पहले मां के कमरे में झांका, वे बेड पर लेटीं उमा दी से बात कर रही थीं. अपने से आठ वर्ष बड़ी उमा दी और मां को ‘गुडनाइट’ बोलने के लिए वह अंदर आ गई, ‘गुडनाइट’ कहते हुए पूछा, “मां, थक गई हैं क्या?”
“नहीं-नहीं, बिल्कुल नहीं. आज का दिन तो बहुत अच्छा रहा. बहुत मज़ा आया, उमा दी भी अभी यही कह रही थीं. नींद ना आ रही है तो आओ, बैठो.”
“नहीं मां, नींद तो आ रही है. अब कल सुबह बात करेंगे.” कहकर रमा दूसरे कमरे में सोने आ गई, उमा दी भी अभी उसके पास सोने वाली हैं, रमा कई बातें सोचने लगी. आज मां का पचहत्तरवां जन्मदिन था. वह मुंबई से, उमा दी दिल्ली से मेरठ पहुंची हैं. अनिल भैया जो रमा से पांच साल बड़े हैं, उनसे फोन पर बात कर रमा और उमा दी ने एक सरप्राइज़ पार्टी रखी थी. रमा कल रात उमा दी के पास दिल्ली पहुंच गई थी. आज सुबह-सुबह मेरठ आकर मां को सरप्राइज़ दिया है. मां टीचर थीं, अब रिटायर्ड हैं. उमा दी भी एक अच्छी कंपनी में अच्छे पद पर कार्यरत हैं. रमा हाउसवाइफ है, दोपहर में मां की ख़ास सहेलियों को एक होटल में लंच पर आमंत्रित किया गया था. मां बहुत ख़ुश थीं. उन्हें देखकर उमा दी, अनिल भैया और रमा भी ख़ुश हो रहे थे. पिता का स्वर्गवास तो सालों पहले हो गया था. मां को ख़ुश रखने के लिए तीनों यथासंभव कोशिश करते थे.
जब भी रमा मेरठ आती है, मन में एक उदासी घिरी रहती है. यह उदासी वह कभी किसी से शेयर नहीं कर पाई. हां, अनजाने में ही अनिल भैया उसका साथ देते रहे हैं. रेखा भाभी और भतीजी काव्या से भी उसका मन ख़ुश रहता है, पर मां और दी! पता नहीं जान-बूझकर या अनजाने में वे दोनों रमा का दिल सालों से दुखाती रही हैं. अगर अनजाने में, तो दोनों की इतनी कम उम्र तो है नहीं कि वे किसी को दिल दुखानेवाली बातें कहें और उन्हें महसूस न हो और अगर जान-बूझकर, तो यह कितना कटु सत्य है कि आपके अपने ही आपका मन सबसे ज़्यादा आहत करते हैं. अगर बाहरवाले आपके मन को कष्ट पहुंचाते हैं, तो आप उनसे अपने संबंध सीमित कर एक किनारा कर सकते हैं, पर इन सबसे क़रीबी रिश्तों का क्या किया जाए, जिन्हें आपकी आंतरिक पीड़ा का एहसास नहीं होता.
अभी भी उसका मन तो था कि मां और बहन के साथ बहुत-सी बातें करे. दो दिन बाद चली ही जाएगी, पर बातों का अंत क्या होता है इसका जो अनुभव उसे था, उसे देखते हुए उसने अकेले लेटना ही ठीक समझा.
मुंबई में रमा अपने पति विपिन और बच्चों तन्मय व तन्वी के साथ अपनी गृहस्थी में बहुत ख़ुश और संतुष्ट थी. सुशिक्षित होने के बावजूद रमा ने घर और बच्चों की उचित देख-रेख को ही प्राथमिकता देते हुए कभी कोई नौकरी करने के बारे में नहीं सोचा था. इसके पीछे भी उसके अपने कुछ तीखे-कटु अनुभव थे. विपिन और बच्चों ने उसे हमेशा प्यार और आदर दिया था. उसे कभी अपने हाउसवाइफ होने पर दुख नहीं था, पर वह जब भी मां और उमा दी से मिलती, तो दोनों ही उस पर वर्किंग वुमन न होने का ताना कसतीं. मां का तो हमेशा यही कहना होता था, “तुझे इतना पढ़ाया-लिखाया, तूने कुछ नहीं किया. अगर तुझे घर-गृहस्थी में ही जीवन ख़राब करना था, तो बता देती. मैं क्यों इतना पढ़ाती-लिखाती.” उमा दी ने भी हमेशा ऐसी बातें ही की थीं. “भई, हाउसवाइफ के रंग-ढंग तो मैं अपनी पड़ोसनों के रोज़ ही देखती हूं, कोई काम नहीं होता उन्हें, बस गेट पर खड़े होकर गप्पे लड़वा लो. मैं तो पूरा दिन घर पर रहने की सोच भी नहीं सकती.” मां और बहन की ऐसी बातें रमा के दिल पर गहरा प्रहार-सा कर जातीं, लगता क्या सचमुच जीवन में उसने कुछ नहीं किया? भैया ने हमेशा उसकी उदार मन से प्रशंसा की थी. पता नहीं कितनी ही बातें उसे अक्सर याद आती रहती थीं, जब मां और उमा दी ने उसका मज़ाक उड़ाया था. उमा दी सोने आईं, तो रमा ने अपनी आंखें यूं ही बंद कर लीं. दिन की बहुत-सी बातें याद आ गई थीं, तो अब बात करने का मन ही नहीं हो रहा था. उमा दी भी उसे सोया समझ चुपचाप सो गई थीं.
रमा को आज दिन की पार्टी की कुछ बातें याद आ रही थीं. मां की सहेलियों ने जब उमा दी और उससे पूछा था कि क्या कर रही हो आजकल, तो उमा दी ने गर्वभरे स्वर में अपने कामकाजी होने के बारे में बताया था. उसके ‘हाउसवाइफ हूं’ कहने पर मां ने जैसे शर्मिंदा होते हुए कहा था, “इसने नहीं किया कुछ. बस, घर पर आराम किया है.” छलछलाई आंखों को बड़ी मुश्किल से रोका था रमा ने. मन अंदर तक कड़वाहट से भर गया था. उसके सब्र का पैमाना अब छलकने लगा था, पर हमेशा की तरह इन कटाक्षों का जवाब देने से उसने ख़ुद को रोक ही लिया था. फिर कितने ही विचारों के आरोह-अवरोह में डूबते-उतराते उसकी आंख लग गई थी
अगला दिन भी घर में कब बीत गया, पता ही नहीं चला. फिर अगली सुबह उमा दी और रमा साथ ही निकलनेवाली थीं. प्रोग्राम यही था कि उमा दी रमा को एयरपोर्ट छोड़कर अपने घर चली जाएंगी. दोनों पैकिंग कर रही थीं, तभी मां वहीं पास आकर बैठ गईं. कुछ इधर-उधर की बातों के बाद बोलीं, “रमा, तुम थोड़ा रुक जातीं.”
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नहीं मां, विपिन और बच्चों को परेशानी होती है. बच्चों की परीक्षाएं भी शुरू होनेवाली हैं. मेरा वहां रहना अभी ज़रूरी है.” उमा दी ने कहा, “अरे, सब मैनेज कर लेते हैं. मैं भी तो छुट्टियों में यहां आती रहती हूं वहां सबको छोड़कर. एक तो पता नहीं घर में रहनेवाली लेडीज़ को यह क्यों लगता है कि उनके कहीं जाने से कोई काम रुकता है. मुझे देखो, मैं तो ऑफिस से भी छुट्टी लेकर यहां आई हूं. घर के काम क्या चीज़ हैं. क्या तुम सचमुच घर-गृहस्थी के अलावा कुछ नहीं सोचती रमा?” अपमान का एक घूंट जैसे रमा के गले में अटक-सा गया. मां भी शुरू हो गईं, “इसने यही तो किया है हमेशा, इसी में तो रच-बस गई है. वैेसे रमा, परसों पार्टी में जब सब अपने बारे में, अपनी बेटी-बहू के अचीवमेंट्स के बारे में बता रही थीं, तुम्हें मन में दुख तो होता होगा न कि सारी पढ़ाई-लिखाई ख़राब कर दी.”
आज रमा को जैसे स्वाभिमान ने झिंझोड़ दिया, पलभर में ही उसके दिल से सारा लिहाज़, सारी झिझक, संकोच ख़त्म हो गया. वह बेहद गंभीर स्वर में कहने लगी, “मां, मेरे दिल में कामकाजी महिलाओं के लिए बहुत सम्मान है. वे घर-गृहस्थी के साथ ऑफिस की ज़िम्मेदारियां भी संभालती हैं, पर आप लोग मेरे जीवन को, घर-गृहस्थी संभालने की मेरी चॉइस को इतना तुच्छ क्यों समझती हैं? मैंने सचमुच कुछ नहीं किया होगा, ऐसा आपको लगता है, मैं ऐसा नहीं समझती. मेरा अचीवमेंट मुझे हज़ारों, लाखों रुपए नहीं देता, पर जो देता है वह अमूल्य है. मैंने अपने बच्चों को बचपन की, अपने स्नेह की, अपने रात-दिन के लाड़-प्यार की मधुर यादें दी हैं, जो दुर्भाग्यवश मेरे पास नहीं हैं. आपके आत्मनिर्भर होने के दंभी स्वभाव ने दिन-रात आहत किया है मुझे. आपको याद है मेरी सहेली विभा, उसकी मम्मी बेहद सरल, आम-सी गृहिणी थीं. मैं जब भी कभी स्कूल से उसके साथ उसके घर जाती थी, तो सरिता आंटी हम दोनों को कितने स्नेह से बिठाकर खाना खिलाती थीं. मैं कभी उन्हें भूल नहीं पाई और जब कभी वह मेरे साथ हमारे घर आती थी, तो आपका कहना होता था, “मैं तो काम करके आई हूं, यह दोस्ती ख़ुद ही निभाओ. ख़ुद बनाओ और खिलाओ. मैं कोई हाउसवाइफ हूं, जो किचन में ही घुसी रहूं.”
मां, मैंने आपको कभी घर के किसी काम में रुचि लेते नहीं देखा, आपको बाहर रहना ही अच्छा लगता था. चाहे स्कूल हो या छुट्टियां हों, मेरा बचपन कितना अकेला और उदास रहा है, आपको क्या पता. आपके घर से बाहर रहने के शौक़ में मैंने क्या-क्या सहा है, आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकतीं. मुझे ख़ुद ही नहीं पता, आधुनिक, शिक्षित माहौल में रहने के बावजूद अल्प शिक्षिता, सरल, स्नेही सरिता आंटी कब मेरी आदर्श बनती गईं. मैंने अपने बच्चों को वही स्नेह व सुरक्षा देने का प्रयत्न किया है, जो मुझे विभा के घर जाकर महसूस होता था. मैं इस बात को भी खुले दिल से स्वीकार करती हूं कि पिताजी के न रहने पर आपने ही घर संभाला है, पर मां, आत्मनिर्भर होने का इतना दंभ! इतना घमंड कि आप मेरे हर काम को हेय दृष्टि से देखती आई हैं. यहां तक कि आप मेरे पास मुंबई आने पर मेरे साफ़-सफ़ाई और घर को व्यवस्थित रखने के शौक़ का मज़ाक उड़ाती हैं, क्यों? मां, हम अपनी मां, बहन, बेटी की बात छोड़ भी दें, तो एक औरत होने के नाते आप दूसरी औरत के किसी काम को, उसकी लगन को, उसकी मेहनत को क्यों कोमल, स्नेही, उदार मन से स्वीकार नहीं सकतीं?
मैं अपना अचीवमेंट आप जैसे लोगों को समझा भी नहीं पाऊंगी. बस, मेरे बच्चे कभी यह बात नहीं कहेंगे कि उनका बचपन उदास, अकेले, आहत व उपेक्षित बीता है. इस बात की गारंटी देती हूं मैं और यही गारंटी मेरा अचीवमेंट है मां.” कहते-कहते रमा अपने सिर पर स्नेहिल स्पर्श से चौंकी, पता नहीं कब से पीछे खड़े अनिल भैया ने अपना हाथ उसके सिर पर रखा था. उसकी नज़रें भैया से मिलीं, तो उनकी आंखों में जो कुछ उसे दिखा, भीगी आंखों के साथ मुस्कुरा दी रमा. मां और उमा दी अवाक् बैठी थीं, रमा ने कहा, “मां, दी, मेरी बातों से आपको दुख पहुंचा हो, तो आई एम सॉरी. आज ख़ुद को रोक नहीं पाई.” रमा ने अपना बैग बंद कर सामने रखे ड्रेसिंग टेबल में स्वयं को देखा, अपना ही चेहरा आज शांत और ख़ुश लगा. मन पंख-सा हल्का हो गया था. सालों का गुबार निकलने के बाद अब बहुत शांत था मन.

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