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स्वप्नमयी-a new short hindi motivational by vishnu prabhakar of a mother

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स्वप्नमयी एक ऐसी माँ की कहानी है जो स्वप्न तो देखती है परन्तु उसमे जी नहीं पाती। इसलिए कि नहीं की उसमे साहस की कमी है बल्कि इसलिए कि वह बहुत भोली है। कहते हैं, स्वप्न को चरितार्थ करने के लिए व्यक्ति को अपने ऊपर अंकुश लगाना पड़ता है। ऐसा चरित्र स्वप्नमयी की देवरानी में मिल सकता है। मैं उसे भूलकर भी नहीं भूल सकता। वह मेरे जीवन में पार्थिव और अपार्थिव दोनों में रम रही है। उसने कहा था ,मुझे भूल जाना पर स्वप्न को अक्सर भूल जाता हूँ। बंगाल और पंजाब का ऐसा मेल हो सकता है ,ऐसा कभी सोचा तक नहीं था। बड़ी -बड़ी हिरनी जैसी आँखे ,रंग कुंदन सा दमकता हुआ। हम एक ही क्लास में थे। बिषय था हिंदी। बस एक दिन मैंने पूछ ही लिया -‘क्या तुम मुझसे शादी कर सकती हो ? वह बोली ,यही बात तो मैं तुमसे कहना चाहती थी। एक स्त्री के मुख से सहज में कही गई ते बातें अजीब सी लगती है। उसके पिता पंजाब से थे और माँ ठेठ बंगाली। उसके पिता नौकरी में हिन्दुस्तान घूमते -घूमते बंगाल में बस गए। उन्होंने नौकरी के बाद राजनीति को अपना लिया था। समाजवादी बन गए थे। ना जाने कितनी बार जेल गए। अलका का आगमन हुआ पर जैसा स्वागत होना चाहिए था वैसा नहीं हुआ अंतरजातीय विवाह स्वीकार्य उस समय नहीं था , यो तो उसका व्यवहार प्रेममय था शादी के बाद हम कोलकता में ही रहे। एकाएक उसमे परिवर्तन शुरू हुआ। बिशेषकर मेरी माँ को उसकी बातों से बड़ी चिंता हुयी थी। वह पहले तो उनकी बातों को सुन लेती थी ,अमल भी करती थी। माँ ने उसे ढेर सारे गहने पहनने को दिए तो उसने बड़े चाव से पहने एक -एक गहने के बारे में दस- दस बार पूछे। बहुत दिनों तक इसे वह रटती रही। हमारी पोशाक को उसने प्रेम से ग्रहण किया। हमारी पोशाक ,बोली ,व्यवहार उसपर ऐसे फबे की कोई उसे पहचान भी नहीं पाया। वह कुछ गलत भी कहती तो लोगों को यकीं नहीं होता। उन दिनों का चित्र आज भी उतर आता है तो मै आत्मविभोर हो जाता हूँ। मेरे एल्बम में उसके कई फोटो लगे हैं। पर अब तो जैसे कार्बन कॉपी मालूम देते हैं। उसका असली रूप तो मेरे मानस पर ही अंकित है।
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काश यह सब वह पहले ही समझ लेता तो आज कुछ लिखने को बचता ही नहीं। वह गृह लक्ष्मी नहीं स्वप्नमयी बन कर जीना चाहती थी। आशुतोष जो एक बिछुड़ा नौजवान था उस पर उसकी विशेष कृपा थी। वह बाद में साधू बन गया। अलका एक सुन्दर बच्ची की माँ बनी .वह अपने पिता के साथ राजनीति में सक्रिय रूप से भाग लेने लगी। उसी सिलसिले में वह तीन महीने जेल में भी रही। माँ एक सुशील ,आज्ञाकारी बहु चाहती थी और अलका स्वछन्द परिंदे की तरह उड़ना चाहती थी। उसका पति भरसक प्रयास करता रहा कि माँ और बहु के सम्बन्ध मजबूत हो पर ऐसा हो नहीं सका। अलका अपने पति के अविश्वास के साथ परलोक सिधार गई। अन्तर्मन को झखझोरने वाली यह कहानी तीन स्त्रियों पर केंद्रित है और स्वप्न और यथार्थ के बीच डगमगाती जिंदगी का सजी चित्रण इस उपन्यास में वखूबी हुआ है।

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