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नरपिचाशानि और राजकुमार-a new short hindi motivational story of a prince

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प्राचीन समय में सूंदर नगरी में सुकेतु नाम का एक राजा था। नाम के अनुरूप सुन्दर नगरी धन -धान्य एवं सौंदर्य से परिपूर्ण था। प्रजा खुशहाल थी। एक दिन एक नरपिचाशिनी सुन्दर नगरी से गुज़र रही थी। उसने नगर की सौंदर्य देख अपना घर वहीँ बनाने का निश्चय किया। वह छद्म वेश में रहकर अपनी पहचान बना ली थी। वह प्रतिदिन एक बालक को अपना ग्रास बनाने लगी। धीरे -धीरे इस बात का पता राजा को चला तब उन्होंने अपने सैनिकों की एक टुकड़ी को इसकी खोजबीन करने हेतु लगा दिया। पर लाख पता लगाने पर भी उन्हें कुछ भी पता नहीं लगा और प्रतिदिन एक -एक बालक गायब होते चले गए। अब तो यह स्थिति हो गई की नगर के प्रत्येक द्वार बंद रहने लगे। अब तो नरपिचाश्नी का बुरा हाल था। वह भूखी रहने लगी। राजा बहुत चिंतित थे पर सभासदों में से कोई भी हल नहीं बता पा रहा था। तभी एक बूढ़ा आदमी सभा में आया और उसने अपनी एक योजना बताई। उसने महाराज से कहा की यदि हम कुछ बच्चों को इकट्ठा छोड़कर चुपचाप निगरानी करें तो बालकों का हत्यारा जरूर पकड़ा जाएगा। पर प्रजा में से कोई भी अपने बच्चों को छोड़ने को तैयार नहीं हुआ। अंततः राजा अपने बेटे को चंचल को अकेला बाहर छोड़ने का आदेश दे दिया। बालक ने दौड़ना शुरू कर दिया। सैनिक भी पीछे -पीछे दौड़ने लगे। नरपिचाश्नी को सुन्दर राजकुमार को देख मुहं में पानी आ गया। किसी को आसपास नहीं देखकर उसने राजकुमार को कुछ खिलौने खेलने को दिए।
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राजकुमार उस छद्म पिचाशनि के पीछे -पीछे चल दिए। कुछ दूर जाने के बाद वह अपनी मायावी शक्ति से अदृश्य हो गई। सैनिक तो कब के पीछे छूट चुके थे। उसने राजकुमार को चूल्हे के पास बिठा दिया। आग जलाकर वह मांस पकाने की बर्तन लाने गई ,तभी चंचल राजकुमार ने एक जलती लकड़ी उठाई और उसे छत की ओर फ़ेंक दिया। दूसरी जलती हुई लकड़ी लेकर उस पिचाशानि के पीछे खड़ा हो गया। जैसे ही वजह पीछे मुड़ी राजकुमार ने उस जलती हुई लकड़ी को उसके सिर पर दे मारा। पूरा घर जल रहा था और पिचाश्नी जलन के मारे पागलों की तरह इधर -उधर दौड़ रही थी। उठते धुवें को देख तबतक सैनिक भी आ पहुंचे। उन्होंने अविलम्ब पिचाशनि को बंदी बना लिया। इस प्रकार राजकुमार की सूझ बुझ से उस पिचाशानि के आतंक से नगर मुक्त हुआ। आज भी समाज में कई नर पिचाशियाँ है जो बाल मन का भक्षण करती है

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