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भज गोविंदम मूढ़मते-A new short hindi motivational story of a tesajvi and Indra Dev

A new short hindi motivational story of a tesajvi and Indra Dev

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यह एक रोचक प्राचीन कथा है। एक तपस्वी घने जंगल में साधना कर रहे थे। सतत प्रभु -स्मरण में लीन। ना भूख की चिंता,ना ही प्यास की। एक अत्यंत गरीब लड़की लकड़ियां बीनने आती थी वन में। वही कुछ फल तोड़ लाती,पत्तों का दोना बनाकर जल ले आती और तपस्वी के आगे छोड़ जाती। तपस्वी इसी के सहारे जी रहा था। कुछ दिनों बाद वे घोर तपस्या में लीन हो गए। ना खाना ना पीना लकड़ियां बीनने वाली लड़की यह देखकर उदास होती पर वह असहाय थी। जैसा की होना था,इन्द्रासन डोला ,इंद्र चिंतित हुए। तपस्या भांग करना जरूरी था। क्या पता कब तपस्वी तप के बल पर इन्द्रासन पर कब्ज़ा कर बैठे?इंद्रा मनुष्य के मन से वाकिफ थे। स्वर्ग से एक दिव्य सुंदरी उतरी। अप्रतिम सौंदर्य पानी भर रही थी जैसे ही एक किरण स्वर्ग से उतरी ,वह काली-कलूटी औरत की देह स्वर्णमंडित हो गई। वह अब अप्सरा सी दिखने लगी थी। तपस्वी की सेवा में वह नित्य जुटी रही। एक दिन तपस्वी ने आँखे खोली। उन्होंने स्वप्न में भी ऐसा सौंदर्य नहीं देखा था। पर उन्होंने युवती से कहा -अब मई यहां से प्रस्थान करूंगा ,यहां मेरा कार्य पूरा हुआ। युवती यह सुनकर रोने लगी। आसूं अनवरत बहे जा रहे थे।
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कहा -मैंने ऐसा कौन सा दुष्कर्म किया है कि आप मुझे अपनी सेवा करने से वंचित करना चाहते हो ?मैंने तो आपसे कुछ माँगा भी नहीं। तपस्वी को चेहरा कुछ परिचित लगा वे बैठ गए और अपनी आँखे बंद कर ली वे रुक गए थे। युवती उस रात आनंदित थी पर उसे किसी तपस्वी को सन्मार्ग से हटाने के प्रयास पर दुःख भी था। रात भर सो नहीं पायी। सुबह निर्णय लिया और तपस्वी के चरणों पर गिर पड़ी। कहा ,-मुझे अब जाना पडेगा क्योंकि मेरा परिवार दूसरे गांव को प्रस्थान कर रहा है। तपस्वी ने उसे आशीर्वाद दिया। युवती चली गई। तपस्या पूरी हुई। इंद्र नीचे उतरे और तपस्वी के चरणों पर झुके कहा -स्वर्ग के द्वार आपके लिए खुले हैं। तपस्वी ने अपनी आँखे खोली ,कहा -स्वर्ग की मुझे कोई जरूरत नहीं है। इंद्र को सहज विश्वास ही नहीं हुआ यह सुनकर ,उन्होंने पूछा ,-तब क्या आपको मोक्ष चाहिए ?’ तपस्वी ने कहा -नहीं मै मोक्ष का क्या करूंगा ?’इंद्र ने पूछा -फिर आप को क्या चाहिए ?’उस तपस्वी का जवाब अप्रत्याशित था -;कुछ भी नहीं ,वह लकड़ियां बीनने वाली लड़की कहाँ है ,वही चाहिए ‘–यही तो इंसान की कमजोरी है। इस धरा पर यही सबसे प्रबल आकर्षण है। सभी के सामने विकल्प वही है। या तो उन सुखों को चुनो जो छणभंगुर है या उसे चुनो जो शाश्वत है। शाश्वत को गवां दो छणभंगुर के लिए या फिर छणभंगुर को समर्पित कर दो शाश्वत के लिए। यह चुनाव आपका है। यही तो मनुष्य की गरिमा है और उसका दुर्भाग्य भी। अक्सर हम मोहपाश में गलत का ही तो चुनाव कर लेते हैं।

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