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अँधेरे में एक चेहरा-a new short hindi motivational story of an Anglo Indian teacher

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अँधेरे में एक चेहरा-रस्किन बॉन्ड-एंग्लो इंडियन टीचर मिस्टर ओलिवर शिमला हिल स्टेशन के बाहर अवस्थित स्कूल से देर रात घर लौट रहे थे। यह स्कूल रुडयार्ड किपलिंग के समय से पहले पब्लिक स्कूल के तर्ज़ पर चल रहा था। पढ़ने वाले अधिकतर बच्चे समृद्ध भारतीय परिवार से थे। मिस्टर ओलिवर यहां कुछ बर्षों से पढ़ा रहे थे। वे देवदार के जंगल से गुजर रहे थे। तेज हवाएं चल रही थी। देवदार के पेड़ से निकलती उदास ,कुछ डरावनी सी आवाजें द्वारा रही थी। अधिकाँश लोग उस रास्ते का इस्तेमाल नहीं कर मुख्य रास्ते से ही जाते थे। मिस्टर ओलिवर साहसी थे ,वे भीरु तथा कल्पनाशील नहीं थे। उनके पास एक टॉर्च था जिसकी बैटरी ख़त्म होनेवाली थी। टॉर्च से से निकलता अस्थिर प्रकाश किरण जंगल के संकरे रास्ते पर पद रहा था। जब रौशनी एक लड़के की आकृति पर पड़ी जो किसी चट्टान पर अकेले बैठा था। वे रुक गए। ,’तुम यहां बाहर क्या कर रहे हो ?’थोड़ा पास जाते हुए उन्होंने कठोरता से पूछा। उन्हें लगा किउस बदमाश लड़के को पहचान लेंगे। किन्तु उसके नज़दीक जाते ही उन्हें एहसास हुआ कि हो ना हो कुछ तो गड़बड़ है। ऐसा प्रतीत हो रहा था की लड़का रो रहा था। उसने अपना सिर झुका रखा था अपने हाथों से चेहरे को थाम रखा था। उसका शरीर झटकों के साथ हिल रहा था। वह एक विचित्र आवाज़हीन रुलाई थी।
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मिस्टर ओलिवर को माज़रा विचित्र लगा। ‘अरे बच्चे ,तुम्हे इस समय बाहर नहीं रहना चाहिए। क्या परेशानी है ,मुझे तो बताओ, ऊपर देखो। लड़के ने ऊपर देखा। उसने अपने चेहरे से हाथ हटाए और टीचर की तरफ देखा। उनके टॉर्च की रौशनी उस लड़के के चेहरे पर पड़ी। भयावह दृश्य था। उसके चेहरे पर ,आँख ,कान ,नाक ,मुहं कुछ भी नहीं था। बस एक गोल चिकना सिर था। जिसके ऊपर स्कूल की टोपी थी। उनके कांपते हाथों से टोर्च गिर पड़ा। वह पीछे मुड़े ,और गिरते -पड़ते पेड़ों के बीच से भागते मदद के लिए चिल्ला रहे थे। वह स्कूल की इमारत की तरफ ही दौड़ रहे थे. उन्होंने रास्ते में एक लालटेन झूलती हुई देखी वे चौकीदार से तकरागाये। हाँफते हुए साँसे लेने लगे। चौकीदार ने पूछा -‘आप दौड़ क्यों रहे हैं ? क्या वहाँ कोई दुर्घटना हुईं है ?’मैंने कुछ देखा ,बहुत ही भयावह जंगल में एक रोता हुआ लड़का जिसका चेहरा ही नहीं था। ‘चेहरा नहीं साहेब ,” आँख ,नाक ,कान ,मुँह कुछ भी नहीं। ‘क्या आपका मतलब है कि वह ऐसा था साहब ?’यह कहकर उसने लातें की रौशनी अपने चेहरे के सामने रखी ,चौकिदारके चेहरे पर ना आँखें थी और ना ही कान ,नाक ,मुँह। यहां तक कि भवें भी नहीं। तभी हवा का एक झोंका आया और लालटेन बुझ गया।

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