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हमदर्दी-a new short hindi motivational story of an old man and his wife

a new short hindi motivational story of an old man and his wife

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सुबह का वक़्त था। डॉक्टर के दरवाज़े पर कॉल बेल बज़ी। पत्नी ने दरवाज़ा खोला। एक वृद्ध व्यक्ति बाहर खड़ा था। उन्हें देखते ही डॉक्टर साहब की पत्नी ने कहा-इतनी सुबह,क्या परेशानी है?मुझे अंघूठे के टाँके कटवाना है। सुबह मुझे दूसरी जगह पहुँचना होता है इसलिए सुबह-सुबह आ गया। ,डॉक्टर उस वृद्ध व्यक्ति से परिचित सो उन्होंने कहा–कोई बात नहीं दादा,आप बैठो डॉक्टर ने टाँके खोले और कहा-दादा,आपके अँगूठे का घाव भर गया है। फिर भी मैं पट्टी लगा देता हूँ। फिर डॉक्टर ने हमदर्दी दिखाते हुए पूछा,आपको सुबह कहाँ पहुँचना पड़ता है,चलिए मैं आपको छोड़ आऊँ उस व्यक्ति ने कहा,-नहीं ,डॉक्टर साहब मैं अब घर जाऊँगा ,नास्ता तैयार करूंगा फिर निकलूंगा। उन्होंने डॉक्टर का आभार व्यक्त किया और प्रस्थान करने के लिए खड़े हुए। डॉक्टर साहब की पत्नी ने कहा -‘दादा। यहीं नाश्ता कर लीजिये ना ‘वृद्ध ने कहा ,ना बेन ,मैं तो यहां नाश्ता कर लूंगा पर वहाँ मेरी पत्नी को कौन नाश्ता कराएगा ?वह कहाँ रहती है। क्या वे अस्वस्थ हैं ?हाँ,मेरी पत्नी को अल्ज़ाइमर हो गया है। पिछले पांच सालों से उसकी यादाश्त चली गयी है वह तो मेरे को भी पहचानती नहीं है। मैं नर्सिंग होम जाता हूँ उसे नाश्ता खिलाता हूँ वह तो सिर्फ शून्य नेत्रों से देखती है। पति होकर भी मैं उसके लिए अनजाना हो गया हूँ। वृद्ध के आँखों में आंसू भर गए थे। डॉक्टर और उनकी पत्नी को भी यह दास्ताँ सुनकर आँखें गीली हो गयी। प्रेम तो निस्वार्थ होता है कबीर ने लिखा है -प्रेम ना बाड़ी उपजे। ,प्रेम ना हाट बिकाय दादा ,आप इतने वृद्ध हो। पिछले पांच वर्षों से नर्सिंग होम जा रहे हो ,कभी थकते नहीं, ऊबते नहीं ,डॉक्टर दम्पति ने पूछा। उन्होंने कहा -नित्य तीन बार जाता हूँ ,उसने जिंदगी में मेरी खूब सेवा की है आज तक मैं उसके सहारे ही तो जी रहा हूँ।
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मैं जब भी उसके पास बैठता हूँ तो ना जाने मुझमे कहाँ से अदृश्य शक्ति आ जाती है। मुझे उसे ठीक करना है इसलिए तो ईश्वर ने मुझे इतनी आत्मबल दिया है। उसके साथ नाश्ता करने का आनंद ही अलग है मैं अपने हाथों से उसे नाश्ता ,खाना खिलाता हूँ। डॉक्टर साहब ने तब पूछा -वह तो ना आपको पहचानती है और ना ही आपसे कुछ बोलती है फिर भी आप उससे मिलने जाते हो ?वृद्ध ने कहा -डॉक्टर साहब ,वह नहीं जानती कि मैं कौन हूँ पर मैं तो जानता हूँ कि वह कौन है। यह उदगार अत्यंत ही मार्मिक था जिसे सुनकर डॉक्टर दम्पति काफी मर्माहत हो गए। सच ही तो है -पारवारिक जीवन में स्वार्थ अभिशाप है ,और प्रेम आशीर्वाद है। प्रेम जब टूटता है तभी परिवार बिखरता है। जिसे अपने परिवार से लगाव,प्रेम ही ना हो उसे दुःख -दर्द से क्या वास्ता ?ऐसे लोग अभिशप्त ही होते है क्योंकि उनका जीवन,अपने -पराये को फर्क करने में ही बीत जाता है। और चलते -चलते -इस दुनिया में तीन तरह के लोग होते हैं [१]जिनको लूटने में मज़ा आता है [२]जिन्हे लुटाने में मज़ा आता है [३]जिन्हे लूट जाने में मज़ा आता है। ये तीनो तरह के लोग मज़े करते हैं बांकी सब इनकी खिदमत कर खुश हो लेते हैं।

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