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महाकवि कालिदास-A new short hindi motivational story of mahakavi Kalidaaslidas

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प्रेरक प्रसंग-महाकवि कालिदास और विक्रमादित्य—कालिदास राजा विक्रमादित्य के प्रमुख दरबारियो में से एक थे। एक दी राजा विक्रमादित्य ने अजीब प्रश्न किया -,’महात्मन आप इतने विद्वान् हैं परन्तु आपका शरीर आपकी बुद्धि के अनुसार सुन्दर नहीं है। इसके क्या कारण हैं ?महाकवि उस समय चुप रहे और प्रश्न को टाल दिया। कुछ दिनों के बाद महाराज ने अपने सेवक से पीने के लिए पानी माँगा। सेवक कालिदास के निदेशानुसार दो बर्तनो में पानी ले आया। एक बर्तन तो मिटटी का था तो दूसरा पात्र बहुमूल्य धातु का। महाराज आश्चर्यचकित थे। कालिदास ने आग्रहपूर्वक दोनों बर्तनो से पानी पीने को कहा। महाराज ने ऐसा ही किया। कालिदास ने पूछा -महाराज इन दोनों बर्तनो में से किस बर्तन का पानी आपको ज्यादे शीतल लगा ?;मिटटी वाले बर्तन का -महाराज ने जवाब दिया ‘कालिदास ने कहा -राजन ,जिस प्रकार पानी की शीतलता बर्तन की सुंदरता पर निर्भर नहीं करती उसी तरह बुद्धि की सुंदरता शरीर की सुंदरता पर निर्भर नहीं करती। महाराज को अपने प्रश्न का उत्तर मिल चुका था।
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[२] तीन गुरु -प्राचीन समय की बात है। ,किसी नगर में एक महंत रहते थे। एक दिन उनके शिष्य ने पूछा की स्वामीजी आपके गुरु कौन है ?उन्होंने अपने तीनो गुरुओं के बारे में बताया। एक चोर था। रास्ता भटक गया था एक चोर को दीवार में सेंध लगाने की कोशिश कर रहा था। आसरा कोई था नहीं सो उस चोर के साथ उसके घर पर ठहर गया। वह पेशी चोर तो अवश्य था पर था बहुत ही प्यारा इंसान। मैं एक महीने तक उसके साथ रहा। वह हर रात चोरी करने निकलता और मुझे ईश्वर की प्रार्थना करने को कहता। लौटने पर पूछता की आज कुछ मिला क्या ?वह कहता ,’भगवान् ने चाहा तो जल्द ही जरूर कुछ मिलेगा। वह कभी निराश नहीं होता वह मेरा पहला गुरु था। मेरा दूसरा गुरु एक कुत्ता है। वह प्यासा था। मगर वह जब भी पानी पीने नदी के पास जाता उसकी परछाईं उसे डराती। वह भौंकता और पिछे हट जाता। अंततः वह प्यास से व्याकुल होकर नदी में कूद पड़ा और अपनी प्यास बुझाई। सफलता तो उसे ही मिलती है जो दर का सहस से मुकाबला करता है। और मेरा तीसरा गुरु एक छोटा बच्चा है। वह एक जलती हुई मोमबत्ती लेकर जा रहा था। मैंने उससे उस स्रोत के बारे में पूछा जहाँ से ज्योति आयी है। उसने मोमबत्ती पर फूंक मारकर बुझाते हुए पूछा -‘,क्या आपने ज्योति को जाते हुए देखा है ?मेरा अहंकार उस बच्चे के सामने चकनाचूर हो चुका था। और अपनी मूढ़ता पर लज्जित हुआ। जीवन का हर पल हमें कुछ ना कुछ सीखने का मौक़ा देता है। सीखने की कोई उम्र नहीं होती

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