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यह भी नशा,वह भी नशा-a new short hindi motivational story written by MunshiPremchnd

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होली का दिन था रॉय साहेब घसीटेलाल के यहां भांग छान रही थी। मालूम हुआ कि जिलाधीश मिस्टर बुल आ रहे हैं। उनके आने की खबर से खलबली मच गई। कोई उधर भागा कोई इधर पर रॉय साहेब निश्छल बैठे रहे। साहब ने आते ही कहा -हेलो रॉय साहेब ,आज तो आप का होली है ?रॉय साहब ने हाथ बांधकर कहा -हाँ सरकार ,आज होली है। बुल -खूब लाल रंग खेलता है ?साहब ने पिचकारी उठा ली। पिचकारी भरकर पंडितजी के मुख पर छोड़ दी। हाथ जोड़कर पंडितजी बोले ,धर्मावतार ,आज तो मेरा जीवन सफल हो गया। उन्होंने गुलाल का एक टीका साहब के माथे पर लगा दिया। बुल -इस बड़े बर्तन में क्या रखा है ? रॉय -सरकार ,यह भांग है , बुल -इसके पीने से क्या होगा ? हुजूर की आँखे खुल जाएँगी। बुल -हम भी पियेगा .रॉय साहब ने गिलास में भंग उढेली और साहब ने पी लिया। दूसरे दिन रॉय साहब मिस्टर बुल से मिलने पहुंचे। साहब उस समय भोजन कर रहे थे। रॉय साहब अंदर गए तो शराब की दुर्गन्ध से उनकी नाक फटने लगी। जी मचलाने लगा। साहब ने एक चुस्की ली ,और गिलास को मेज पर रखते हुए बोले ,-रॉय साहब ,कल तो हमने आप का भंग पी लिया आज आपको हमारा भंग पीना पडेगा .आपका भंग तो बहुत अच्छा था हम बहुत सा खाना खा गया।
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रॉय बोले -हुजूर ,हम तो मदिरा हाथ से भी नहीं छूते हमारे शास्त्रों में छूना भी पाप कहा गया है। बुल -नहीं रॉय साहब आपको तो पीना पडेगा यह हमारा भंग है ,वह आपका भंग था ,कोई फरक नहीं है। इसमें भी नशा होता है ,फिर फरक कैसा ?साहब ने एक ग्लास शराब भरकर रॉय साहब के मुहं में लगा ही दिया। साहब को लगा की वे दर के मारे नहीं पी रहे हैं सो उन्होंने रॉय साहब की गर्दन कस कर पकड़ी और ग्लास उनकी ओर बढ़ाया। रॉय साहब बोले ,हुजूर ,हम तो वैष्णव हैं इसे छूना भी पाप समझते हैं। भंग तो पवित्र वस्तु है। साधू महात्मा ,मुनि ,देवता सब इसका सेवन करते हैं। कौन ऐसा पंडित है जो बूटी ना छांटा हो। लेकिन मदिरा का नाम लेना भी हम पाप समझते हैं। बुल ने कहा -तुम तो पागल की माफिक बात करता है। धरम का किताब तो भंग और शराब दोनों को बुरा कहता है। नशा इसलिए बुरा है क्योंकि इससे अकाल ख़तम हो जाता है। तुम लोग कहेगा -यह अछूत है ,हम छु लें तो पानी भी नहीं पियेगा .यह सब खप्त लोगों की बात है। अच्छा सलाम। रॉय साहब की जान में जान आयी और गिरते -पड़ते घर की राह पकड़ी।

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