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मेरे तो गिरिधर गोपाल,दुसरो ना कोई-a new short hindi story of meerabai

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मीरा का कृष्ण मीरा का पति हैं संगी-साथी,सब कुछ। मीरा ने कृष्ण को चुना। जब मीरा छोटी थी उनके घर में एक संत ठहरे थे। उनके पास कृष्णा की एक सुन्दर सी प्रतिमा थी। सुबह संत ने अपने पास से प्रतिमा निकाली। पूजा करने के लिए। बच्ची ने जब प्रतिमा देखी तो उसे लेने हेतु मचल उठी। संत प्रतिमा देने को राजी नहीं हुआ। मीरा की माँ ने समझाया .जितना पैसा चाहिए ले लीजिये .साधू ने कहा -ये मेरे प्रभु हैं इन्हे भला मैं कैसे बेच सकता हूँ ?’यह मैं हरगिज नहीं दे सकता। अंततः संत मूर्ति लेकर चले गए। दूसरे गाव में रात्रि विश्राम किया। निद्रा में भगवान् कृष्ण प्रगट हुए और कहा -तूने ठीक नहीं किया। जिसकी मूर्ति थी उसे ही दे दे। उसने कहा -भगवन यह मूर्ति मेरी है ,उस बच्ची की नहीं –.कृष्णा ने कहा -यह प्रतिमा उसी का है। तू नहीं जानता उसकी भक्ति ,उसका लगाओ कितना गहरा है। तू कोई और मूर्ति ले ले। जा लौटकर मूर्ति उसे दे आ। उधर मीरा दिन भर भूखी बैठी थी। बाल हाथ -मूर्ति तो खाना भी नहीं। माँ परेशान यह भी कैसी जिद है?वह मूर्ति उस संत की है उसके आराध्य देव के हैं ,वह दे या ना दे ,यह उसकी मर्जी है।
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दूसरे दिन सुबह होते -होते वह संत भागा -भागा मीरा के पास आया। और उसके चरणों पर गिर पड़ा। कहा -अब सम्भालो अपने प्यारे कृष्ण को। ये तुम्हारे हैं। मीरा उस प्रतिमा को हमेशा अपने साइन से चिपकाये रहती। अब वह पांच साल की थी पड़ोस में एक वैवाहिक कार्यक्रम था। मीरा प्रतिमा के साथ वहाँ गई। और अपनी माँ से पूछने लगी ,-‘इसका तो विवाह हो रहा है पर मेरी शादी कब होगी। /?माँ ने मजाक में कहा -तेरा टी विवाह हो गया है ना। ये कृष्णा कन्हैया से ‘और ये सच भी हो गया मीरा ने कृष्णा को अपना पति मान लिया ,आगे विवाह भी हुआ ,वह हमेशा के लिए कृष्णमय हो गई। भक्ति -भाव से सरोवार जाकी रही भावना जैसी ,प्रभु मूरत देखि तीन तैसी . प्रभु के विराट स्वरुप का बखान करना संभव नहीं है।

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