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राजुला मालूशाही-a new short inspirational story from ancient times

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राजुला मालूशाही -भगवान् बागनाथ के मंदिर में प्याज़ा दुलाशाही और रानी धर्मदेवी संतान प्राप्ति की मनोकामना लिए बागनाथ के दरबार में आये थे। दोनों ने मिलकर एक ही वरदान माँगा। उनके साथ संपन्न व्यापारी सुनपति शौक और उनकी पत्नी गांगुली भी थे। दोनों की पत्नी ने भगवान् से वर माँगा कि अगर एक को पुत्र और दूसरे को पुत्री होगी तो वे उन्हें परिणय सूत्र में बांधेंगे भगवान् की कृपा से राजा के यहां पुत्र और व्यापारी के यहां रूपवती कन्या का जन्म होता है। दोनों बच्चे समय के साथ बड़े होते हैं। एक दिन राजुला अपने माँ से पूछती है कि दिशाओं में कौन सी दिशा प्यारी है ?’पेड़ों में कौन पेड़ बड़ा है ?–डिवॉन में कौन देव है ?–राजाओं में कौन राजा तथा देशों में कौन देश ? माँ जवाब देती है -दिशाओं में सबसे प्यारी पूर्व दिशा है /पेड़ों में सबसे बड़ा पद पीपल है /जिसमे देवताओं का वास होता है ,देवताओं में सबसे बड़े महादेव आशुतोष हैं। राजाओं के राजा रंगीला मालूशाही और देशों में देश रंगीलो बैराठ। राजुला मुस्कराई और कहा -‘माँ मेरा विवाह रंगीलो बैराठ से ही करन उसके पिता व्यापार के सिलसिले में बैराठ ही जा रहे थे राजुला भी साथ जाने का हाथ करती है। वे बागनाथ मंदिर में अपनी सुपुत्री के साथ पहुंचते हैं। राजुला को मालूशाही के दर्शन हो जाते हैं। मालूशाही राजुला से प्राण करते हैं कि वह एक दिन उससे व्याहने दारमा जरूर आएंगे। राजुला के पिता को जब इस बात का पता चलता है तब वे क्रोधित हो जातें हैं।
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वे अपने देश वापस लौट जाते हैं। वे अपनी पुत्री का विवाह तिब्बत के हुन राजा ऋषिपाल के साथ तय कर देते हैं। राजुला यह जानकार निश्चय करती है कि वह स्वयं बैराठ जायेगी और मालुशाही से मिलेगी। वह एक हीरे की अंघूटी लेकर रंगीली बैराठ की तरफ चल दी। मालूशाही उसे सामने देखकर अचंभित होते हैं और राजुला से कहते है कि वे शिघ्र दारमा आकर उससे व्याह कर लेंगे। मालूशाही के लिए कठिन धैर्य का समय था वे गुरु गोरखनाथ से मिलते हैं राजुला के मिलने का मार्गदर्शन मांगते हैं। वे गुरु गोरखनाथ का आशीर्वाद प्राप्त कर साधू के वेश में कत्यूरी सेना लेकर शौक देश पहुंचते हैं। सुनपति शौक मालूशाही को पहचान लेता है। सुनपति ने सभी को हलवा -पूरी खिलाया .यह एक साज़िश थी। खीर में जहर मिला होता है। मालूशाही और उसके साथी बेहोश हो जाते हैं। योगी गुरुनाथ अपने मन्त्र बल से मालूशाही और उनके साथियों को जीवित कर देते हैं। गुरुके आदेश से कत्यूरी सेना के साथ सुनपति और हूण देश की सेना पर हमला बोल देते हैं। और वे विजयी होते हैं। सुनपति लज़्ज़ित होकर अपनी पुत्री का हाथ मालूशाही को दे देता है। दृढ संकल्प से उनका हर सपना साकार होता है।

और चलते चलते-
जिसे ढूढता था
वो कभी मिला नहीं
जो साथ में मिला
वो अपना कभी हुआ नहीं
रिश्तों में यह कैसी अकुलाहट
निभाने की हसरत थी ही नहीं।

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