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धम्म सकाळ-a new short inspirational story of Mahatma Buddha about arrogance

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बुद्ध कहते हैं -कभी किसी चीज़ का घमंड आ जाये तो श्मशान का एक चक्कर लगा आना तुम से बेहतरीन लोग वहाँ राख बने पड़े हैं। अंडे से बेहतर है बांग पर मरना – एक आदमी एक मुर्गा खरीद कर लाया। और उसे पालने लगा। एक दिन मालिक उस मुर्गे को वध करने की सोचा बहाना तो बनाना था सो उसने मुर्गे से कहा -तुम कल से बांग नहीं डोज अगर दिया तो मैं तुम्हे डालूंगा। मुर्गे ने कहा ,ठीक है सर नहीं दूंगा। सुबह हुई ,मालिक ने देखा ,-मुर्गा बांग नहीं दे रहा है लेकिन हमेशा की तरह अपने पंख फड़ फड़ा रहा है। मालिक ने अगला आदेश जारी किया कल से तुम अपना पंख भी नहीं फड़ फडाओगे नहीं तो मैं तुम्हारा जिबह कर दूंगा। अगले दिन मुर्गे ने फंक नहीं फड़ फड़ाये पर आदतन अपने गर्दन को लंबा किया और उसे उठाया। मालिक ने फरमान जारी किया ,अगले दिन से तुम गर्दन भी नहीं उठाओगे नहीं तो मैं तुम्हारा जिबह कर दूंगा। अगले दिन मुर्गा सहमा रहा और कुछ नहीं किया। मालिक परेशान ऐसा फरमान जारी किया जो मुर्गे के लिए पालन करना असंभव सा था। मालिक ने कहा -कल से तुम्हे अंडे देने होंगे नहीं तो तुम्हारा जिबह कर दूंगा। मुर्गे को अपनी मौत साफ़ दिखाई देने लगी और वह रोने लगा।
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मालिक ने कहा -क्या बात है मौत के डर से रोने लगे ? मुर्गे ने कहा -नहीं मैं इस लिए रो रहा हूँ कि अंडे से मरने से बेहतर है कि बांग पर मरना। बांग मेरी पहचान और मेरी अस्मिता थी मैंने सब कुछ त्याग दिया। तुम्हारी हर बात मानी लेकिन जिसका इरादा ही संहार करना हो तो उसके आगे समर्पण नहीं बल्कि संघर्ष करके ही जान बचाई जा सकती है। मुझे संघर्ष करना चाहिए था शायद मेरी जान बच जाती और मेरी अस्मिता भी बच जाती। मैंने कायरों की तरह तुम्हारी बात मानकर गलत किया। और अंत में -सुख के लम्हे तक पहुंचते -पहुंचते हम सब उन लोगों से जुदा हो जाते हैं जिनके साथ हमने दुःख झेलकर सुख का स्वप्न देखा था।

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