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अन्याय-a new short motivational story about the labour class

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एक समय की बात है की एक अंगूर के बगीचे के मालिक ने कुछ मज़दूर को काम पर बुलाया। चूँकि अंगूर पक गए थे लिहाजा तोड़वाना आवश्यक था। छोड़ने पर या तो वे सड़ जाते या पेड़ से गिर जाते। मज़दूर काम थे। दोपहर में कुछ मज़दूर को रखा फिर सांझ में कुछ मज़दूर को ,फिर भी मज़दूरों की संख्या पूरी नहीं हुई। अन्धेरा छाने लगा था। काम बंद करना पड़ा। मालिक ने सारे मज़दूरों को इक्क्ठा किया और सभी को सामान रूप में मज़दूरी के पैसे बाँट दिए। जो मज़दूर सुबह से काम कर रहे थे वे स्वाभाविक रूप में नाराज़ हो गए। उन्होंने कहा कि यह तो अन्नाय है। हम सुबह से काम पर है। खून -पसीना बहाया ,जो मज़दूर दोपहर को आये ,आधा दिन काम किया और जो सांझ में आये उन्होंने बिलकुल ही काम नहीं किया ,फिर भी समान तनखाह आखिर अन्नाय की भी कोई सीमा होती है।मालिक ने शान्ति से सब सूना फिर हंसने लगा। उन्होंने नाराज़ मज़दूरों से पूछा -मैंने जो तुम्हे दिया है क्या वह तुम्हारी मज़दूरी से कम है?उन्होंने जवाब दिया -नहीं बल्कि ज्यादे ही है। जितना माँगा था उससे आपने दुगुना दिया है।
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मालिक ने तब कहा कि -तब तो तुमलोगों को मुझे धन्यवाद देना चाहिए जहां तक मेरे देने का प्रश्न है तो यह सम्पति मेरी है। मैं इसे लुटाऊँ तो तुम्हे कैसी शिकायत आखिर तुम हो कौन पूछनेवाले ?जिन्होंने सुबह से काम किया ,दोपहर से किया और वे जो सांझ में आये और काम ही नहीं किया उनको भी उतना ही दिया इसलिए नहीं कि वे पात्र हैं या उन्होंने मिहनत की है बस इसलिए दिया कि मेरे पास देने को बहुत है मुझे जो मिल जाता है उसे कुछ ना कुछ दे देता हूँ। परमात्मा ने हमें जो दिया है अपने आधिक्य से। तम्हे आँखे दी ,जीवन दिया क्या इसके लिए तुम्हारी पात्रता थी >परमात्मा को धन्यवाद देना सीखो ,शिकायत करना बिलकुल नहीं। अनुग्रह करना सीखो महत्वाकांक्षा केवल शिकायत करना सीखाती है। ईश्वर ने प्रेम और भक्ति करना सिखाया है तृष्णा का त्याग करना चाहिए और किसी के प्रति शिकायत तो बिलकुल नहीं करना चाहिए। कहानी से हमें बहुत बड़ी सीख मिलती है।

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