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दुखवा मै कासे कहूं मोरी सजनी-a new short motivational story in hindi by acharya chatursen

दुखवा मै कासे कहूं मोरी सजनी -आचार्य चतुरसेन

गर्मी के दिन थे। बादशाह ने सलीमा से नई शादी की थी। प्रेम और आनंद की कलोल करने वे कश्मीर की दौलतखाने में चले आये थे। आरामबाग के महलों के नीचे पहाड़ी नदी बल खाकर बह रही थी। खुली खिड़की के पास बैठी सलीमा रात के सौंदर्य को निहार रही थी। सुगन्धित मसालों से बने शमादान जल रहे थे। बादशाह दो दिन शिकार को गए थे। वह प्रतीक्षा कर रही थी। एक बांदी को बुलाया और पूछा -साकी ,तुम्हे बीन अच्छी लगती है या बांसुरी ? बांदी ने कहा -हुजूर जिसमे खुश हों। पर तू किसमे खुश है ? कम्पित स्वर में बांदी ने कहा – बांदियों की ख़ुशी ही क्या। बांदी ने एक सुवासित मदिरा का पात्र बेगम के समक्ष ला धारा। साकी ने गाना शुरू किया ,’दुखवा मैं कासे कहूं मोरी सजनी। ‘ गीत ख़त्म होते ही साकी ने देखा सलीमा बेसुध पड़ी है। उसने झुककर बेगम का मुख चूम लिया। अचानक उसने सामने शाहजहाँ खड़े थे। साकी को तो मानो सांप ने डस लिया। तू कौन है और यहां क्या कर रही थी ? साकी ने धीरे से कहा -जहाँपनाह ,कनीज अगर कुछ जवाब ना दे तो ? बांदी की इतनी हिम्मत ? बादशाह ने अग्निमय नेत्रों से सलीमा की तरफ देखा। अच्छा तुझे नंगी करके कोड़े लगवाए जाएंगे। साकी ने अकम्पित स्वर में कहा -‘मैं मर्द हूँ। फाहशा —उनका हाथ तलवार की मूठ पर गया। दोजख के कुत्ते ,तेरी यह मज़ाल ? फिर एक कठोर स्वर में पुकारा -‘मादूम ‘ एक भयंकर रूप वाली तातारी औरत सामने अदब के साथ खड़ी हो गई। बादशाह ने हुक्म दिया -‘इस मरदूद को तहखाने में डाल दिया जाये ताकि बिना खाये -पिए मर जाए। तातारी ने कैदी को तहखाने के अंदर धकेल दिया और दरवाज़ा बंद कर दिया। सलीमा ने सुबह होते ही साकी को पुकारा। पर कोई जवाब नहीं मिला। वह द्वार की तरफ चली पर वहाँ बादशाह के हुक्म से एक तातारी नंगी तलवार लिए पहरे पर खडी थी। बादशाह जीनत महल के दौलतखाने में थे। साकी के बारे में पूछने पर बताया कि वह कैदखाने में है। कैदखाने की चाभी मुझे दे उसे अभी छुड़ाती हूँ। ‘ आपको अपने कमरे से बाहर जाने का हुक्म नहीं है। क्या मैं भी कैद में हूँ ?जी हाँ। सलीमा की आँखों में आंसू भर आये। उसने एक खत लिखा -‘हुजूर,माफ़ी फ़रमावें, मेरी लौंडी की जान बख्श दी जाए। वह कमसिन गरीब दुखिया है। -कनीज सलीमा। बादशाह ने खत देखा और मुंह फेरकर कहा -उससे कह दे कि वह मर जाए। उसने एक और खत लिखा -‘दुनिया के मालिक ,आपकी बीबी और कनीज होने की वजह से आपके हुक्म को मानकर मरती हूँ। मेरा कुसूर तो इतना ही था कि मै बेखबर सो गई थी। और सिर्फ एक बार हुजूर को देखने की ख्वाहिश लेकर मरती हूँ। परवरदिगार आपको सलामत रखे। खत को एक गुलदस्ते में रख दिया और फिर जवाहरात की अंगूठी चाट ली। बादशाह को खबर मिली कि सलीमा बीबी जहर खा लिया है और वे मर रही हैं। वे तुरत सलीमा के पास पहुंचे। हाकिम बुलाये गए सलीमा का रंग कोयले के सामान काला पड़ गया था। बादशाह ने कहा -‘क्या तुम्हे यही लाज़िम था ? सलीमा ने कहा -हुजूर मेरा कुसूर बहुत मामूली था।
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बादशाह ने कहा -बदनसीब ,शाही जनानखाने में मर्द का भेष बदलकर रखना क्या मामूली कुसूर है ? तड़प कर सलीमा ने कहा -‘कौन जवान ?क्या वह मर्द है ? उसने पूछा। तो क्या तुम नहीं जानती ?नहीं ,उसके नेत्र से आंसू निकलने लगे। सलीमा को सचमुच कुछ पता नहीं था। उसने कसम खाई। बादशाह को भी सच्चाई का इल्म होते ही गला भर आया। उन्होंने कहा -‘प्यारी सलीमा ,तुम बेक़सूर हो। बादशाह रोने लगे। सलीमा ने बादशाह का हाथ पकड़कर अपने छाती पर रखकर कहा -‘मालिक मेरे ,जिसकी उम्मीद नहीं थी वह मरते वक़्त मज़ा मिल गया। एक अर्ज़ी लौंडी की मंजूर हो। बादशाह ने कहा -जल्दी कहो सलीमा। –शून्य आँखे। निःशब्द चेहरा। जिस खिड़की के पास सलीमा बैठी बादशाह की प्रतीक्षा कर रही थी उसी खिड़की से बादशाह सलीमा की कब्र दिन -रात देखा करते है। किसी को नजदीक आने का हुक्म नहीं है। आधी रात में सन्नाटे में एक मर्मभेदी गीत -ध्वनि उठ खड़ी होती है बादशाह साफ़ -साफ़ सुनते हैं -‘कोई ,कोमल स्वर में गा रहा है -‘दुखवा मैं कासे कहूं मोरी सजनी ‘

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