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जैसे को तैसा-a new short motivational story of a farmer with moral

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बुबाष का गरीबी के मारे बुरा हाल था। उसकी पत्नी बुद्धिमती थी ,वह उसे रोज समझ ती कि समझ और मिहनत से काम करो। पर वह तो ठहरा भोला -भाला और मासूम इंसान ,इस कारण वह हर जगह धोखा खा जाता। उसके सीधेपन का हर कोई नाज़ायज़ फायदा उठाता उसे अपनी दिहाड़ी तक पूरी नहीं मिलती थी। एक दिन अपनी पत्नी के सलाह पर गामाल के यहां कोई काम मांगने को कहा। वह मित्र है ,काम से काम वह धोखा तो नहीं देगा। उसके पास ढेर साड़ी बैल ,घोड़े हैं गुजारे लायक जरूर कुछ ना कुछ मिल ही जाएगा। लेकिन इंसानी फितरत को क्या कहेंगे ,गामाल बहुत चालाक और स्वार्थी बन चुका था। उसने अपनापन दिखाते हुए अपने एक खेत की जिम्मेवारी दे दी। तय यह हुआ कि जो भी फसल होगी आधी तुम्हारी ,आधी हमारी। पत्नी यह समाचार सुनकर बहुत खुश हुयी। उसने सोचा ,अब हमारे दिन भी बदल जाएंगे घर में खुशहाली आएगी। गामाल ने कहा कि खाद बीज मैं दूंगा हम लोग लिखित सौदा कर लेते हैं फसल का ऊपरी भाग तुम्हारा और जमीन का निचला हिस्सा मेरा बुबाष ने सौदा तय कर लिया। उसने अगले दिन से ही खेत में खूब मिहनत की। बीज धरती में बो दिए। कुछ ही दिनों में पौधे निकल आये। आखिरकार फसल पक कर तैयार हो गयी ! सीधा -साधा बुबाष अब तक चालाकी को नहीं समझ पाया था. गामाल ने चालाकी की थी , उसने नीचे शलगम की फसल बोई थी। वो शलगम लेकर बाज़ार चला गया।
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उसकी फसल खूब अच्छे दामों पर बिकी। बुबाष बेचारा दुखी होकर घर पहुंचा। पत्नी यह सुनकर मन ही मन कुपित हुयी . थोड़े दिन बाद बुबाष का शलगम के पत्तों को कोई खरीदनेवाला नहीं था। शाम तक पत्ते सड़ने लगे। थोड़े दिन बाद वह गमाल के खेत पर काम करने गया इस बार उसने नीचे का फसल माँगा। गेहूं की फसल थी। गामाल ने सभी बालियां ले ली और नीचे की शाखाएं बुबाष को दे दी। बुबाष ने सुखी डालियों को कटवाकर भूसा बनाकर बाज़ार में बेच दिया। इस बार बुबाशके साथ उसकी पत्नी फातिमा भी गई। साड़ी सर्टेन लिखित में पक्की की गई। उसकी पत्नी ने दिए गए बीज का बोरा बदल दिया। और खेत में जाकर बो दिया। फसल पकने पर गामाल बहुत खुश था। इस बार बुबाश की नीचे की फसल है यह सुनकर गामाल के पैरों तले जमीं खिसक गई। गामाल को समझ नहीं आ रहा था की धान की फसल के बदले आलू की फसल कैसे हो गई इस बार फसल अधिक होने के कारण ट्रक पर लादकर बुबाश मंडी -पहुंचा और बहुत अच्छे दामों पर फसल बेच दी। इधर आलू के पुढे मंडी पहुंचते पहुंचते सुख चुके थे। बुलावा आने पर भी बुबाष नहीं गया और मिली रकम से एक छोटा सा खेत खरीदा। और उसपर मिहनत कर सुखीपुर्वक रहने लगे। ?

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