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ईश्वर का न्याय-a new super motivational story about the justice of god

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एक समय की बात है एक महात्मा अपने शिष्यों के साथ भ्रमण पर निकले। एक शिष्य बहुत चपल किस्म का था। वह हमेशा इधर -उधर की बातें किया करता। जब वे एक तालाब के किनारे से गुजर रहे थे तब उन्होंने देखा कि एक धीवर तालाब में जाल डाले हुए है। वह रुकर धीवर को ,’अहिंसा परमधर्मो’का उपदेश देने लगा। धीवर को बहुत बुरा लगा और दोनों के बीच बहस होने लगा। गुरूजी ने शिष्य को साथ चलने को कहा। उन्होंने कहा ,’बेटा ,हम जैसे साधुओं को का कर्तव्य सिर्फ समझाना है। ईश्वर ने हमें किसी को दंड देने के लिए नहीं भेजा है। शिष्य ने कहा ,’आखिर इन्हे कौन दंड देगा ?’गुरूजी ने कहा ,’बेटा तुम निश्चिंत रहो ,इसे भी दंड देनेवाला एक अलौकिक शक्ति इस दुनिया में मौजूद है। जो हर जगह विद्यमान है। उनकी दृष्टि हर तरफ है। इसलिए तुम चलो इस झगडे से बिलकुल दूर रहना ही श्रेयस्कर होगा। ठीक दो बर्षों बाद गुरूजी और वही शिष्य उसी तालाब से होकर गुजरे .शिष्य धीवर वाला घटना भूल चुका था। उन्होंने देखा कि एक छुटियल सांप बहुत कष्ट में था। उसे हज़ारों चीटियां नोच -नोच कर खा रही थी। शिष्य ने जब यह दृश्य देखा तो उसका ह्रदय करुणा से पिघल गया। वह सर्प को चीटियों से बचानेवाला ही था कि गुरूजी ने हाथ पकड़कर जाने से मना किया -और कहा -‘बेटा ,इसे अपने कुकर्मों का फल भोगने दो। अगर तुमने इसे रोका तो इस बेचारे को दूसरे जन्म में भी यह फल भोगने ही पड़ेंगे।
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क्योंकि प्रत्येक को अपने कर्म का फल भोगना ही पड़ता है। ‘शिष्य ने पूछा ,-गुरूजी ,इसने ऐसे कौन से कर्म किये हैं कि यह इस दुर्दशा में फंसा है ?’गुरूजी ने कहा ,’यह वही धीवर है जिसे तुम मछली नहीं मारने का उपदेश दे रहे थे। और वह तुम पर क्रोध से आग -बबूला हो रहा था। वे मछलियां ही ये चीटियां हैं जो इसे नोच -नोच कर खा रही हैं। शिष्य ने कहा ,-गुरूजी यह तो विचित्र न्याय है। गुरूजी ने कहा ,-बेटा ,तुम्हरे कर्म शुभ हों या अशुभ उसका फल तो भोगना ही पड़ता है। जीवन का हर पल कीमती है इसलिए बुरे कर्मों में इसे व्यर्थ नहीं जाने दो। अच्छे कर्मों का फल तो हमेशा अच्छा ही होता है। ईश्वर हमेशा सही न्याय करते हैं। हम जैसा कर्म करेंगे ईश्वर उसी के अनुरूप न्याय करेंगे।
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[२] गांव और शहर में अंतर -गाँव में कुत्ते आवारा घूमते हैं और गौमाता पाली जाती हैं ,शहर में कुत्ता पाला जाता है और गौमाता आवारा घूमती हैं। कड़वा सच है कि अनाथ आश्रम में बच्चे मिलते हैं ,गरीबों के ,वृद्धाश्रम में बुजुर्ग मिलते हैं अमीरों के। –पुराने ज़माने में जिसे ठेंगा कहते थे उसे आज ‘like ‘ कहते हैं।

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