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जादूगरनी,जिसका नाम था धापूड़ी-a new type of inspirational story

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फ़ोन की रिंग बजी, हालांकि गाना उसकी पसंद का था,”आपकी आंखों में कुछ महके हुए से ख़्वाब हैं “, लेकिन कानों में चुभ रहा था. मन अच्छा न हो तो क्या गाना और क्या खाना? फ़ोन उठाया तो विनोद थे,”डार्लिंग, होम मिनिस्टर ने मीटिंग रखी है, कल आना पॉसिबल नहीं है, अब अगले संडे तक ही आ पाऊंगा,” छोटी-सी सूचना और फ़ोन डिसकनेक्ट हो गया. कोई नई बात नहीं है, सीनियर आईएएस अधिकारी आज यहां तो कल वहां. वह ख़ुद भी महिला बाल विकास अधिकारी है तो ऐसा तो कम ही होता है कि साथ में वक़्त गुज़रता हो. शादी हुई तो सबको रश्क हुआ था, वह ख़ुद भी तो अपनी किस्मत पर इठला उठी थी. सुदर्शन सौम्य विनोद और वो दोनों पहली नज़र में एक दूजे को भा गए थे. बड़ा बंगला नौकर-चाकर, धन-वैभव, सुख-समृद्धि क्या सुख था जो उन्हें नहीं मिला? कुछ साल रोमांच में गुज़रे समय कम होने पर भी एक दूजे का साथ नई ऊर्जा से भर जाता था. दो बच्चे हुए तो मानो दुनिया पूरी हुई. लेकिन बच्चों के साथ साथ ज़िम्मेदारियां भी बढ़ने लगीं. बड़ी सरकारी नौकरी के सुख सबको दिखते हैं, लेकिन दिक़्क़तें उसे ही पता होती है जो नौकरी कर रहा होता है. महिला बाल विकास अधिकारी, दूसरी महिलाओं व बच्चों की समस्या सुलझाती, लेकिन उसकी ज़िंदगी की उलझनें, अपने बच्चों की समस्या किस विभाग में सुलझाए? बच्चों की परवरिश, हार-बीमारी में भी जब वह किसी दूर-दराज़ इलाक़े में होती तो तड़प कर रह जाती. विनोद भी उसकी उलझन समझ रहे थे, कई बार नौकरी छोड़ने का मन हुआ लेकिन… भविष्य का ख़्याल आ जाता और इतनी बड़ी नौकरी छूटती कहां है? फिर तय हुआ बच्चे बोर्डिंग में रहेंगे. अब हर पंद्रह दिन में मिलने चले जाते हैं उनसे. हर दो-तीन साल में ट्रांस्फ़र, नई जगह, नए लोग, नई चुनौतियां. हफ़्तेभर के टूर के बाद आज घर लौट रही थी सोचा विनोद भी लौट रहे हैं, लेकिन… घर, घर कहां है? सराय है. रात गुज़ारो अगले दिन फिर यायावर की तरह चल दो नए पड़ाव पर. शाम हो गई बड़े शौक़ से बैगन की सब्ज़ी, कढ़ी और मक्के की रोटी बनवाई तो ख़ानसामा आश्चर्य से उसे देखने लगा. टेबल पर बड़ी नफ़ासत से महंगी क्रॉकरी में सजा खाना खाने बैठी तो बेमन से एक रोटी ही खा पाई यह कहते हुए उठ गई,”आजकल चीज़ों में स्वाद ही नहीं
रह गया.”
विदेशी दौरे, होटल, पार्टी, हर महंगी से महंगी चीज़ सोचे तो हाज़िर, लेकिन कहीं मन नहीं ठहरता. सब कुछ फीका ही लगता है. यह सब सोच ही रही थी कि तभी कनिष्ठ अधिकारी का फ़ोन आया,‘‘मैडम झाबुआ ज़िले के टूर का क्या करना है?’’
विनोद भी नहीं आ रहे हैं यहां रह कर क्या करूंगी यह सोचते हुए उसने कहा,‘‘कल ही चलेंगे.’’
अगली सुबह शहर पीछे छूट गया और पहुंच गई एक गांव में, जहां महिला बाल विकास की कुछ योजनाओं को वहां के अधिकारियों और कार्यकर्ताओं को समझाना था. रेस्ट हॉउस में पहुंची तो चाय तैयार थी, चाय का एक घूंट लिया ही था कि लगा अमृत होंठों से लग गया है.
“चाय किसने बनाई है?” उसने पूछा.
सुपरवाइज़र ने कड़क आवाज़ में बुलाया,”धापूड़ी ओ धापूड़ी!”
डरते-डरते एक सांवली-सी 30-35 साल की एक महिला ने कमरे में प्रवेश किया. लाल रंग के छींट का घाघरा चोली और पचरंगी ओढ़नी ओढ़े थी वो. उसके सांवले रंग की चमक, आंखों में लगा काजल, आंखों के किनारों और ठोड़ी पर हरे गुदने के निशान, माथे का बौर और चांदी की हंसली, पैरों के कड़े, कमर की कंदोरा, एक हाथ से पकड़े घूंघट को दांतों में दबाकर वो भय से विस्फरित नेत्रों से उसे देख रही थी. आदिवासी खांटी सौंदर्य, ऐसी मासूमियत तो दुर्लभ है! स्मार्टनेस के नाम पर आजकल चेहरों से निश्छलता और मासूमियत खो गई है.
‘‘बाई साहेब, दूर से आवि री सोच्यो खाली दूध री चाय पवाड़ देऊन, एका सारू,” भय-मिश्रित हंसी हंसते हुए वह बोली. ओह, जैसे बिजली चमक गई हो और एक साथ कई सितार बज उठे हों. क्या सांवले लोगों के दांत ही इतने चमकदार होते हैं? और आवाज़ की खनक तो बनावट से दूर असली आत्मीयता से भरी हुई थी. ग़ौर से देखा और हंसते हुए बोली,”नहीं, नहीं. डरो नहीं बहुत अच्छी चाय है. सालों बाद स्वाद मिला ऐसा.”
जैसे किसी ने धापूड़ी को बड़ी राहत दी हो, मुस्कुरा दी वह. वह अंदर जाने लगी तो शरीर की गठन देखकर मन में आया विधाता ने कौन सी छैनी हथौड़ी से घड़ा है ऐसा नैसर्गिक सौंदर्य? कौन से जिम में पाई होगी इसने ऐसी काया? दिनभर आसपास के इलाक़ों में कामकाज निपटाने के बाद, रात को खाने का मन नहीं था. नहाकर सोना चाहती थी. धापूड़ी ने गरमागरम दूध का गिलास उसके हाथ में पकड़ा दिया. उसे बैठने का बोल वह उठ बैठी,‘‘यहां कब से हो ?’’
‘‘दोई साल से बाई साब,’’ वह मुस्कुराती हुई बोली, फिर बिजली चमकी, वह मंत्रमुग्ध-सी उसे देखने लगी.
फिर अचानक न जाने उसे क्या सूझा. कह दिया,”जाओ,” तो वह चली गई.
ठंड के दिन थे. अंधेरा जल्दी हो जाता है. काग़ज़ देखते-देखते उसकी नींद लग गई. रात दूर से अचानक स्त्रियों के लोकगीत गाने की आवाज़ आई. हड़बड़ाकर उठ गई. गार्ड को आवाज़ लगाई. पूछा,‘‘यह आवाज़ कैसी है?’’
‘‘मैडम आदिवासी लोग रात को लोकगीत गाते हैं.’’
‘‘क्यों? कोई त्यौहार है क्या?’’
‘‘नहीं मैडम, रोज़ रात को इकट्ठे हो कर गीत गाते हैं. आग जलाकर उसके आसपास. कैंप फ़ायर जैसे,” यह बोलते-बोलते उसके चेहरे पर अपने ज्ञानी होने का एहसास पसर गया. बहुत दिनों बाद एकाएक मुस्कान आ गई उसके चेहरे पर. उसने ओवरकोट डाला और बाहर निकल पड़ी. गार्ड भी उसके साथ हो लिया. रेस्ट हाउस से क़रीब दो किलोमीटर की दूरी पर देखा, आदिवासियों की झोपड़ियां बनी थीं. औरतें आग के आस पास बैठी लोकगीत गा रही थीं और बीच-बीच में उठकर नाच भी रही थीं. उसे देखते ही सबके चेहरों पर स्मित मुस्कान आ गई. नि:संकोच, बेफ़िक्र, अलमस्त… आदिवासी लड़कियां और महिलाएं सधे स्वर में लोकगीत पर झूम रही थीं. ढोल, मांदल और पीतल की थाली से उठती ध्वनि और और एक लय में उनका नृत्य… मानो संसार ठहर गया हो. धापूड़ी भी उनमे एक थी. उसे देखते ही दौड़कर उसके पास आई और उसके कैडर को भूल, उसे हाथ पकड़कर अपने समूह के बीच ले आई. वह भी उनके बेफ़िक्र आलम के बीच सब भूलकर नाचने गाने लगी. बातचीत की तो पता चला इन महिलाओं के पति अपनी मज़दूरी के लिए बाहर हैं और बच्चे आदिवासी हॉस्टल में पढ़ रहें हैं. उनके हंसते-खिलखिलाते, उन्मुक्त चेहरों में जीवन दर्शन छलक रहा था. कोई अवसाद नहीं. हर घटना हर मजबूरी को जीवन का एक सत्य मानकर सहजता से जी लेने का अदम्य उत्साह. नाचते-गाते धापूड़ी से पूछा,‘‘अकेली रहती हो, अच्छा लग जाता है?’’

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वह हंसने लगी और उसकी गुदी हुई ठोड़ी में गड्ढा पड़ गया. ‘‘काय अकेली, सगरा मनक तो हैं. ने कोई खेत बावड़ी नई हमर पास तो महार, आदमी गईल मजूरी वास्ते, पोरया-पोरी के परन के भेजो. अबे बाई जी, कछू पान का लानी कछू तो छोड़णो पड़ीस,’’ सितार फिर बज उठा.
ओह कितना बड़ा दर्शन समझा गई यह लड़की? हम आगे बढ़ना भी चाहते हैं, आकाश छूना भी, लेकिन उस आकाश को छूने में कुछ तो छूटेगा ही, सब कुछ एक साथ कैसे सधेगा? कुछ पाने के लिए कुछ खोना तो पड़ता ही है. कितनी अच्छी बात कह दी. जानती तो वह भी थी, लेकिन इस गवई अनपढ़ महिला के मुंह से सुनकर उसे लगा कि कितनी स्पष्ट है इसकी सोच इसलिए दुखी नहीं है. कैसे सम पर है उसका जीवन राग? क्योंकि एक के पास होने पर दूजे के लिए व्याकुल नहीं है. यहां तो यह हाल है कि बच्चों, पति के साथ रहो तो ऑफ़िस और तमाम तरह की चिंता घेरे रहती है. ऑफ़िस में रहो तो बच्चे, पति के साथ के लिए बिसूरती-सी ज़िंदगी. जमाने के साथ चलना है, आगे बढ़ना है तो इस जीवन राग को साधना पड़ेगा. जब जहां है वहीं होना सिखा दिया इस लड़की ने. सब पूरा पूरा नहीं मिलता तो जितना मिलता है उसे ही पूरा-पूरा जी लो. वाह, क्या दर्शन है? इस सोच से मन तरंगित हो गया. उसने पचरंगी चूनर की तरफ़ देखा तो लजाते चेहरे से धापूड़ी बोली,”पोरया का बापू लाए दईस.”
फिर एक थाली में गरम-गरम दाल पाणिये और ताज़े लहसुन की चटनी परोस उसकी और बढ़ा दी और पूछा,‘‘कड़कनाथ खाईस?’’
‘‘वो क्या होता है ?’’ उसने पूछा.
गॉर्ड बोल पड़ा,‘‘झाबुआ ज़िले का स्पेशल प्रजाति का मुर्गा. यहां का बड़ा फ़ेमस है मैडम.’’
‘‘नहीं, नहीं मै नॉनवेज नहीं लेती,’’ यह कहते हुए उसने थाली की तरफ़ देखा. खाने की ख़ुशबू से भूख भड़क उठी थी. क्या स्वाद है, इस खाने का… अचानक उसे लगा-स्वाद चीज़ों में कहां होता है? स्वाद तो हमारे अंदर ही है. अंदर जब कुछ मरने लगता है तो बाहर के सारे स्वाद बेस्वाद हो जाते हैं. छककर खाना खाया उसने, मानो कब से भूखी हो. फिर उन सब से विदा ले लौट पड़ी. रास्ते से ही विनोद को फ़ोन कर बच्चों को वीकेंड पर लेते आने को कहा, अब पूरा-पूरा जीने के लिए. रेस्ट हॉउस पहुंचने पर भी गाने की स्पष्ट आवाज़ आ रही थी. आश्चर्य हुआ, इतनी दूर से आवाज़ यहां तक? मन के वैज्ञानिक ने जवाब दिया रात में माध्यम के विरल होने पर ध्वनि दूर तक पहुंचती है. अचानक मन का दार्शनिक बोल उठा जीवन का राग भी इतना ही सुंदर है और बेहद क़रीब भी, लेकिन इच्छाओं ने, अवसादों ने, महत्वाकांक्षाओं ने, चिंताओं ने इस माध्यम को सघन कर दिया है इसलिए हम उस सौंदर्य से वंचित रह जाते हैं. सर को हल्का झटका देकर वह-जीवन संगीत सुनो, गुनगुनाती अंदर दाख़िल हो गई. महीनों बाद उसे अपने अंदर की सघनता विरल होती महसूस हुई.

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