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नचिकेता-a new very short hindi story of Yamraaj and nachiketa

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यमराज संवाद -नचिकेता बाजश्रवा ऋषि के पुत्र थे। उन्होंने यमराज से तीन वर प्राप्त किया था। उन्होंने नचिकेता को ज्ञानोपदेश दिया था। इन दोनों के बीच संवाद पठनीय है। नचिकेता -किस तरह से होता है ब्रह्म का ज्ञान और दर्शन ?मनुष्य के शरीर में दो आँख ,दो नाक के छिद्र ,दो कान ,एक मुहं ,नाभि ब्रह्मरंध ,,गुदा ,एवं शिश्न के रूप में ११ दरवाजे वाले नगर की तरह है जो ब्रह्म की नगरी है। वे मनुष्य के ह्रदय में रहते हैं।इस रहस्य को जानकार जो ध्यान और चिंतन करता है,उसे किसी प्रकार का दुःख नहीं होता। और ऐसे लोग जन्म -मृत्यु के बंधन से मुक्त हो जाते हैं। प्रश्न -क्या आत्मा मरती या मारती है ?–जो लोग ऐसा मानते हैं दरअसल वे आत्मा को नहीं जानते और भटके हुए हैं। क्योंकि ना तो आत्मा मरती है और ना ही किसी को मार सकती है। प्रश्न -क्या ह्रदय में परमात्मा का वास होता है ?-मनुष्य का ह्रदय ब्रह्म को पाने का स्थान माना जाता है। उसका ह्रदय अगूंठे के माप का होता है अपने ह्रदय में भगवान् का वास मानने वाले दूसरों के ह्रदय में भी ब्रह्म इसी तरह विराजमान हैं। इसलिए दूसरों की बुराई या घृणा से दूर ही रहना श्रेष्यकर है। प्रश्न -क्या है आत्मा का स्वरुप ?-शरीर तो नाशवान है पर जीवात्मा का नाश नहीं होता। आत्मा का भोग -विलाश ,अनित्य ,और जड़ शरीर से कोई लेना -देना नहीं है। यह दोष रहित है। इसका ना तो कोई कारण है ,ना कार्य यानि इसका ना कोई जन्म होता है ,ना। मृत्यु। प्रश्न –आत्मा -परमात्मा के ज्ञान को नहीं जाननेवाले को कैसे फल भोगने पड़ते हैं ?–जिस तरह बारिश का पानी एक ही होता है ,और ऊंचाई से नीचे की ऒर का प्रवाह एक जगह नहीं रूक्ता ,कई प्रकार के रूप रंग और गंध में बदलता है उसी तरह एक ही परमात्मा से जन्म लेने वाले देव ,असुर ,और मनुष्य भगवान् को भी अलग -अलग स्वरुप में मानते और पूजा करते हैं।
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और बर्षा -जल की तरह ही सुर -असुर कई योनियों में भटकते रहते हैं। प्रश्न -आत्मा निकलने के बाद शरीर में क्या रह जाता है -?—आत्मा के शरीर छोड़ने के बाद उसके साथ प्राण और इन्द्रिय ज्ञान भी निकल जाता है। मृत शरीर में क्या बांकी रह जाता है ,यह तो दृश्टिगोचर नहीं होता लेकिन वह परब्रह्म उस शरीर में रह जाता है जो प्रत्येक चेतन और जड़ प्राणी में विद्यमान है प्रश्न -मृत्यु के बाद आत्मा को कौन सी योनियाँ मिलती हैं ?—अच्छे और बुरे कार्यों और शास्त्र ,शिक्षा ,गुरु संगति और व्यापार के माध्यम से देखी -सुनी बातों के आधार पर पाप -पुण्य होते हैं। इनके आधार पर ही आत्मा मनुष्य या पशु के रूप में नया जन्म प्राप्त करती है। जो लोग अधिक पाप करते हैं वे अन्य योनियों जैसे पेड़ -पौधों पहाड़ ,तिनकों में जन्म पाते हैं। यमदेव ने नचिकेता को ॐ को पततिक रूप में परब्रह्म का स्वरुप बताया। ओंकार ही परमात्मा का स्वरुप है।

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