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कर्मों का फल-a short hindi story of shri krishna and sudama

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एक बार सुदामा बर्षों बाद द्वारका पहुंचे। कृष्ण उनके मित्र थे। हालांकि सुदामा निर्धन थे फिर भी कृष्णा उनके साथ स्नेहभरा मित्रता रखते थे। दोनों समुद्र तात पर लहरों का आनंद ले रहे थे। सहसा सुदामा ने कृष्ण से पूछा -सूना है की लोगों को उनके कर्मों का फल तुम देते हो। नहीं ‘वस्तुतः कर्मों के फल तो प्रकृति के नियम देते हैं। यह तो विज्ञान की बाते हैं। हर चीज निश्चित होता है। यह कदापि नहीं होता की आप कुछ और अपेक्षा कर रहे हैं और हो कुछ और जाए उदारहण के रूप में अगर एक गेंद को दीवार पर मारा जाये तो गेंद वापस आ जाती है उतनी ही जोर से। ‘सुदामा ने बीच में टोका,’किन्तु कर्म सिद्धांत में ऐसा नहीं होता। ‘मैं जिसकी भलाई करता हूँ वही मेरे साथ बुरा करने लगता है ”अच्छा ,कृष्ण ने कहा-गेंद को रेट के ढेर पर मारो तो क्या गेंद लौट कर आती है?”नहीं ,सुदामा ने कहा’.क्यों रेट गेंद को वापस नहीं भेजती। क्यों कीचड़ पर फेकने पर कीचड़ को उछा लती है ?’इसलिए हे मित्र तुम्हे यह निश्चित करना होगा की जिस व्यक्ति से तुम संपर्क में हो या व्यवहार में हो ,वह दीवार है ,रेत है या कीचड़ है। हम सत्य और सरल चीजों को छोड़कर उलझन भरे सिद्धांतों को बिना सोचे -समझे स्वीकार कर लेते हैं। सुदामा ने कहा -कहाँ मिलता है कर्मों का फल काम कोई करता है और फल और किसी को मिल जाता है। किसान बेचारा हल जोतता है ,बीज बोता है ,पटवन करता है फिर भी बेचारा गरीब का गरीब है। कृष्ण ने कहा-कोई अगर चर्चा को फैलाता है तो कैसे निष्कर्ष पर पहुँच सकता है। ?’भगवान् सबको कर्म का फल देते हैं।

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प्रकृति का नियन नहीं कहता की किसान खेत में हल चलाएगा तो आकाश से बर्षा होने लगेगी। फल तो तभी मिलेगा जब कर्म होगा। फल में आसक्ति ना हो और अकर्मसे प्रीति ना हो। .फल में आसक्ति ना होने का अर्थ है कि तुम नौकरी करो किन्तु वेतन ना लो। निष्काम कर्म के अर्थ को समझना होगा। एक व्यक्ति की शिकायत थी कि वह ६ घंटे पूजा करता है ,मोहल्ले में मंदिर भी बनवा दिया है भीड़ भी भगवान् उसकी बात नहीं मानते कृष्णबोले ,’भगवान् हमारा स्वामी है, सेवक नहीं फिर जो हम आदेश करें उसे वो पूरा कर दे। इसलिए हे मित्र ,कर्म का फल तो प्रकृति के नियम के अनुसार ही मिलेगा। कृष्णा उत्कट प्रेमी है तो अद्भूबूत वैरागी। वह ऐसे योद्धा हैं जो युद्ध नहीं लड़ते पर जीत कि इबारत लिखते हैं।
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