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एक लकड़हारा देवी-A short hindi story with a good moral for kids

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एक गांव में एक लकड़हारा रहता था। वह रोज अपनी पत्नी के संग जंगल जाते और लकड़ियां काटते और
उसे बाजार में बेचकर अपने तथा दो बच्चों का ललन- पोषण कर रहे थे। बमुश्किल दो वक़्त का खाना जुटा पाते एक साल १५ दिनों तक लगातार रुक-रूककर बारिश होती रही। आर्थिक अ भाव में वे घर की मरम्म्त तक नहीं करवा पाते लिहाजा उनका घर पानी से भर जाता। लगातार बारिश होने के कारण वे जंगल से लकड़ियां भी नहीं काट पाटा। भुखमरी की स्थिति उत्त्पन हो गई थी।पड़ोस से – मांग कर किसी तरह अपनी और बच्चों की जीवन बचा रहे थे। बाढ़ के बाद महामारी फैली औरउनका एक बेटा मर गया। वह अपने बेटे के खोने के बाद एकदम टूट सा गया. वक माँ आदिशक्ति की आराधना करने अपनी पत्नी के साथ हिमालय की ओर चल पड़ा। अपने एकमात्र जीवित बेटे को धर्मशाला में रख आया। हिमालय की कंदराओं में कठोर तपस्या की माँ ने खुश होकर दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा। वह ब्यक्ति इतना भावुक हुआ की उसके आँखों से बरबस आंसू बाह निकले।
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कुछ लोग पूरी जिंदगी आराम की जिंदगी जी लेते हैं और कुछ लोग अपनी पेट की आग बुझाने में साड़ी जिंदगी खपा देते है। सारे दुःखों की जड़ मानव ी पेट ही है उसने कहा की -हे माँ इस संसार में सारे लोगों की क्षुधा मिटा दो। माँ ने तथास्तु कहा। फिर क्या था जगत के सारे लोग खुशहाल रहने लगे.उन्हें भूख नहीं लगती। वे हमेशा मौज-मस्ती में समय गुजारने लगे। वे ईश्वर को भी भूल चुके थे। उनकी आराधना भी नहीं कर रहे थे। लिहाजा आमोद- प्रमोद में दुबे तथा नशे की हालात में लोगों ने उत्त्पात मचाना शुरू कर दिया। सबों ने काम करना बंद कर दिया तब जाकर उस ब्यक्ति को महसूस हुआ की उसने बहुत ही गलत वरदान मांग लिया है। वह फिर माँ के दरबार में हाजिर हुआ और वरदान वापस मांगने की गुहार लगाई। देवी मान ने समझाया। -‘इस सृस्टि में हर इंसान का अपना -अपना भाग्य होता है। प्रारब्ध को कौन बदल सकता है। दुनिया में हर इंसान सुखी या दुखी नहीं हो सकता। समानता की कोशिश करना मूर्खता है। हर मनुष्य को अपने कर्मों के अनुरूप ही फलाफल मिलता है। सुख -दुःख तो जीवन की दिशाएँ हैं। सुख के बाद दुःख और दुःख के बाद सुख। जो जितना अच्छा कर्म करेगा उतना अच्छा फल पायेगा।

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