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मोहब्बत हुई हमें-a short love story in hindi language of a sweet couple

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“एक कप चाय मिलेगी, अदरक वाली, बड़ी तलब हो रही है. चार दिन हो गए गीता नहीं आई. जैसे तैसे चाय बना रहा हूं पर मन ही नहीं भर रहा है. सुनीति की आज बड़ी याद आ रही है. कहती थी मैं जब चली जाऊंगी तो मेरी बहुत याद आएगी. सचमुच जब तक थी, कभी कदर नहीं की. हमेशा अपने ऑफ़िस दोस्तों में उलझा रहा और देखो अब एक कप चाय भी ठीक से नहीं बन रही है.” ये थे मेरे पड़ोसी श्रीमान पाठक साहब, गीता उनकी महरी और सुनीति उनकी पत्नी का नाम था. बड़े अकड़ू हुआ करते थे अपने ज़माने में सो हमसे ज़्यादा मेलजोल नहीं था. पत्नी के जाने के बाद वो भी घर पर अकेले रहते थे. एक बेटा था, जो लंदन में और बेटी जर्मनी में थी. पति के जाने के बाद मैं भी अकेली हो गई थी. मेरी दो बेटियां शादी के बाद अमेरिका में बस गई थी. बार-बार दोनो फ़ोन करके मुझसे ग्रीनकार्ड के लिए अप्लाई करवाना चाहती थी. मैं ही टालते जा रही थी. यहां ये घर मेरा था, पति की यादें थीं. मेरे ढेर सारे छोटे बड़े पेड़ थे जो पति ने लगाए थे. मैं घंटों अपने आम, जाम, निम्बू और अनार के पेड़ों से बातें करती थी और वे सब भी अपनी पत्तियां हिला हामी भरते. नौकरानी, माली दूधवाला, धोबी इनसे बात करने के बाद ख़ुद के लिए भी समय बच नहीं पाता था. कभी अकेलापन लगा ही नहीं तो किसी साथी या ग्रीनकॉर्ड की ज़रूरत ही महसूस हुई. अब इस कोरोना ने अकेलेपन का एहसास बहुत बुरी तरह से करा दिया था. घर पर महरी धोबी माली का आना तो बंद हुआ ही, इस गरमी उमस में मानो मेरे बच्चे जैसे पेड़ भी मुझसे रूठ गए थे.
पत्तियों का हिलना-झुकना मानो थम सा गया था. ठीक श्रीमान पाठक की तरह मुझ मीरा शुक्ला को भी तलब हो रही थी कि कोई तो मेरा दरवाज़ा खटखटाए. सच मानिए तो उस खड़ूस बूढ़े का आना भी मेरे दिल को ठंडक पहुंचा गया. मैंने भी चहकते हुए जवाब दिया,“अरे आप भी ना, इतनी भूमिका बांधने की क्या ज़रूरत थी? मैं झट से स्पेशल चाय बना कर लाती हूं.’’ मैंने उन्हें अपनी वाली स्पेशल चाय सैंडविच के साथ पिलाई. उस खूसट की आंखों में एक अलग सी चमक आ गई और उसने डबडबाई आंखों से मुझे धन्यवाद देते हुए कहा,“थैंक्स वंडरफ़ुल इतनी अच्छी चाय तो सुनीति भी नहीं बनाती थी. कैसे बनाया, ये लॉकडाउन ख़त्म हो जाए फिर मेरी महरी को भी सिखा दीजिएगा.” मैंने कहा,“मैं क्यों बताऊं, मेरी पेटेंट रेसिपी आप को जब भी तलब हो आइए आप को चाय पिला मुझे ख़ुशी ही होगी. कम से कम इसी बहाने आप आएंगे तो.’’ ये हमारी पहली मुलाक़ात थी, इससे पहले कभी हमारी वन टू वन शायद ही कभी बात भी हुई थी. बेटियां बताती रहती थीं कि पड़ोस वाले अंकल बड़े खड़ूस हैं. अक्सर वे रात को किसी ना किसी पार्टी से अपने दोस्तों वो भी पुरुष के साथ हल्ला करते हुए आती थीं और गेट खोलते ही खड़ूस जी की घूरती आंखें उनकी ख़ुशी आधी कर देतीं. बेटियों को अगर भनक भी पड़ गई कि खड़ूस पड़ोसी घर आया और मेरे हाथ की चाय भी पी गया तो क़हर ही ढा देंगी वो दोनों. लेकिन सच कहूं तो बहुत दिनों के बाद गुनगुनाने को जी चाहा. लॉकडाउन का ये सातवां दिन था और पहला इंसान घर आया.
इसके बाद ये रोज़ का सिलसिला हो गया. खाना बनाने वाली महरी के कारण मेरी सारी क्रिएटिव रेसिपी को जैसे पाला मार गया था, पुनः जीवित हो उठीं. मेरे अंदर की मीरा मानो फिर से जाग उठी. बरसों से धूल लगे कोने में पड़े हारमोनियम को उसकी मालकिन ने हाथ लगाया. एक दिन सुबह हारमोनियम बजा ‘मधुबन में राधिका नाची रे’ गा रही थी. पूरी तरह गाने में खोई हुई थी कि लगा सर पर एक पानी की बूंद गिरी. मैं तो घर के अंदर थी ,फिर….ये बूंद कहां से, कहीं छत तो नहीं टपक रही. गाना बंद कर ऊपर देख भी नहीं कि आवाज़ आई. ‘‘मीरा तुम सचमुच मीरा हो, कितना हुनर है तुममें सर्वगुण सम्पन्न… काश… मैं तुम्हारा श्याम बन पाता.’’ मेरे पीछे श्रीमान पाठक खड़े थे और निरंतर अश्रुधारा के साथ. मैं अवाक्… शुक्ला जी कभी दफ़्तर तो कभी दोस्त कभी बेटियों की पढ़ाई फिर दामाद खुजाई में हमेशा इतने व्यस्त रहे कि ना कभी मेरा गाना सुनने की फ़ुरसत थी उनके पास ना ही उन्होंने निकालने की कोशिश की. मुझे खाना बनाने से भी मना करते. एक दिन तो बहुत डांटा और कहा,‘नौकरानी से बनवाओ, क्या ज़रूरत है? बेटियों पे ध्यान दो, उन्हें पढ़ाओ-लिखाओ आत्मनिर्भर बनाओ. तुम्हारा ये हारमोनियम ताले में बंद करो. मैं नहीं चाहता बेटियां पढ़ाई छोड़ गाने नाचने वाली बन जाएं.’ उस दिन सारी रात रोते रही, कॉलेज की ऑलराउंडर मीरा का ऐसा हाल था. बाबूजी तो चाहते थे मैं भी पढ़ लिख कुछ करूं. मां ने बी.एस.सी. के बाद पढ़ने पर रोक लगा शादी करवा दी. बी.एस.सी. में सारी यूनिवर्सिटी में दूसरे नम्बर पर थी़, वहीं शुक्ला जी आई.आई.टी के इंजीनियर थे. मेरे सारे अचीवमेंट धरे के धरे रह गए. बेटियां भी सक्सेसफ़ुल बाप की चमची बन गईं. पढ़ाती मैं थी, क्लास में फ़र्स्ट आने पर सब शुक्ला जी की तारीफ़ करते थे. शायद मैं सबकी ज़रूरत थी लेकिन उससे ज़्यादा कभी मुझे मान नहीं मिला. मैं चाहती थी बेटियां स्कूल में ड्रामे, गाने की प्रतियोगिता में भाग लें लेकिन बेटियां ड्रामे और गाने वालों को लूज़र्स बुलातीं. ठीक अपने पापा की तरह शौक़िया लॉन टेनिस, टेबल टेनिस, चेस खेलतीं. उनके शौक़ों में मैं पूरी तरह शून्य थी, सो हंसी का पात्र बनती. ये तीनों मुझे चिढ़ाते हुए गर्मियों में स्विमिंग के लिए क्लब जाते और मैं उनके आने के बाद का नाश्ता कभी ख़ुद कभी नौकरानी से तैयार करवाती. जहां मुझे हींग जीरे के आलू, मटर की कचौड़ी और अरबी के कटलेट पसंद थे तो इन तीनों की चिकन में जान बसती थी. मुझे ब्राह्मण परिवार में पैदा होने से चिकन अण्डे से एक अलग सी बू आती लेकिन शुक्ला जी ने अपने हॉस्टल के दिनों में दोस्तों के साथ नॉनवेज खाना सीखा और वो उन्हें बड़ा अच्छा लगता. बेटियों ने पता नहीं कैसे बिना मेरे सिखाए पैदाइशी ये आदतें विरासत में पाई थीं. यही हाल मीठे का था. मुझे बालूशाही, मालपुआ, रबड़ी पसंद थे, तो पति और बेटियां ब्राउनी़, केक, पुडिंग और आइसक्रीम के शौक़ीन थे. विवाह के बाद शुक्ला जी के दिल में समाने की लिए बेकिंग क्लासेस जॉइन की, सहेलियों से आइसक्रीम बनाना सीखा पर श्रीमान जी को मज़ा ही नहीं आया. बेटियां भी कहती,“मम्मा रहने दो आप सिर्फ़ रोटी चावल बना दो बाक़ी सब्ज़ी और डेज़र्ट हम बाहर से ऑर्डर कर देंगे.’’ मुझे खौली उबली अदरक वाली चाय तो पति श्री डीकॉक्स की लीफ़ टी पीना पसंद करते थे.
हम औरतों को ईश्वर से ग़ज़ब की शक्ति दी है हम बिना शिकायत हर परिस्थिति में अपने को ढाल लेते हैं और कभी ख़ुद से भी इसकी शिकायत नहीं करते. ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ. कब शुक्ला जी की छाया बन गई पता ही नहीं चला. वट सावित्री, तीज और करवाचौथ करने लगी. अच्छा हुआ बेटियां अपने बाप पर गई हैं और अपने परिवारों में फिफ़्टी-फिफ़्टी वाली फ़िलासफ़ी चलाती हैं. दोनों दामाद बराबरी से काम करते हैं चाहे वो बच्चों को स्कूल भेजने का हो या किचन का. मुझे दोनो दामादों ने मेरी बेटियों से ज़्यादा सम्मान दिया है. मैं जब भी अमेरिका गई बड़े दामाद अगर मेरे लिए अदरक वाली चाय बनाते थे तो छोटे ने मुझे मेरी पसंद की पूरी भाजी ख़ुद बना कर खिलाई. मुझे लेकर हमेशा इंडियन रेस्टोरेंट जाते ताकि मैं परेशान ना हो जाऊं. दोनों की ही कोशिश रहती कि घर पर शाकाहारी खाना बने. मैंने बेटियों के घरों में मालपूए, गुलाब जामुन बनाए. मेरे दो नाती हैं और दोनों मुझे सेक्सी ग्रैनी कह अपने दोस्तों से मिलवाते हैं. मेरी बड़ी बेटी मुझसे बीस और छोटी बेटी बाईस साल छोटी है. ज़िंदगी से कोई शिकायत तो ना थी पर मेरा वज़ूद हमेशा मिसेज़ शुक्ला का रहा. मेरे अंदर की मीरा का क़त्ल तो मेरे विवाह के दिन ही शुक्ला जी ने कर दिया था. बरसों बाद जाने अनजाने मैंने अपने अंदर की मीरा को
जगाने की कोशिश की.
“अरे पाठक साहेब आप…! कब से पीछे खड़े हैं. मुझे पता ही नहीं चला और आप रो क्यों रहे हैं?” उन्होंने तुरंत जवाब दिया,“ना, ना आप मुझे पाठक साहेब ना पुकारें. मां बाप का रखा अच्छा सा नाम है मेरा हरीश. आप मुझे हरी कह पुकार सकती हैं और रही रोने की बात तो ये ख़ुशी के आंसू हैं. बरसों बाद इतनी मीठी दिल को छू लेने वाली आवाज़ सुनी. अरे आप दूरदर्शन रेडियो में गाती क्यों नहीं. बहुत ही अच्छी आवाज़ है.’’
मैं ज़ोर ज़ोर से हंसने लगी “आप भी ना… अच्छा मज़ाक़ करते हैं. मैं और रेडियो बाप रे! बरसों बाद तो गाने की कोशिश की है वो भी ये सोच कि मैं पूरी दुनिया में अकेली इंसान हूं. सड़के ख़ाली हैं, गर्मी है, कर्फ़्यू में परिंदे भी पर नहीं मार रहे हैं. आप तो भूत हैं, पता नहीं कहां से टपक पड़ें.’’ “अरे तुम कहो तो चला जाऊं. रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरा मोल. तुम हीरा हो नायाब, ख़ुद की क़दर अब तो करो.’’
पाठक जी के मुंह से अपनी प्रशंसा और तुम सम्बोधन ने मेरे ग़ालों को शर्म से लाल कर दिया. दोनों कान भी लाल हो रहे थे.
पाठक जी ठहाका लगानेऔर कहा,“अरे यार तुम तो ग़ज़ब का शर्माती हो, पूरी की पूरी लाल हो गई हो. अब से तुम्हें लाली बुलाएंगे.’’
बाप रे! पहले तुम फिर यार और अब लाली. पहली बार पूरी ज़िंदगी में किसी ने ऐसे सराहा था. छोटे दामाद सिएटल में रहते हैं और थोड़ा बहुत गा भी लेते हैं. मैं जब उनके घर गई थी. नाती के बर्थडे में दामाद गा रहे थे, पीछे से मैंने भी गुनगुना दिया. दामाद ने कहा,“मम्मी जी सुपर! आप तो बड़ा अच्छा गाती हैं.” मेरे धन्यवाद देने के पहले ठीक अपने बाप की तरह बेटी ने आंखें दिखाई और धीरे से मेरे कान मे फुसफ़ुसाई “बड़ा शौक़ है ना गाने का मुझे शर्मिंदा ना करें माताराम. आप तो चले जाओगे, बेटू और ये मेरी खिंचाई सालों करते रहेंगे.”
आज बरसों बाद चहकने को जी चाह रहा था. लगा मानो कॉलेज की हार्टथ्रॉब मीरा वापस लौट आई हो. सारी उम्र लकी लेडी यानी हैन्सम इंटेलिजेंट कमाऊ पति की पत्नी और दो होनहार बेटियों की मां की ज़िंदगी जीती रही. सिर्फ़ लक… मेरे अंदर की मीरा को देखने की कभी किसी ने कोशिश ही नहीं की. मां बाप को शुक्ला जी में आदर्श दामाद और भाई को पांच अंकों की मोटी तनख़्वाह, बड़ी कोठी लग्ज़री कार वाले जीजा जी ही दिखे. बेटियों ने थोड़ा बहुत मुझे समझा वो भी घर छोड़ने के बाद. अब जब अपने अपने बेटे को पाल रहीं हैं तो मां का महत्व उनकी समझ में आ रहा था. आज इन पाठक जी को मेरा गाना, खाना यहां तक की शर्माना भी बहुत रास आ रहा था. उन्होंने ज़िद कर पास बैठ मुझसे मेरे
बचपन में ही सीखे दो गाने सुने दाद दी. उसके बाद तो जैसे ऐटम बम की तरह मानो धमाका हुआ, मुझसे हारमोनियम ले पाठक जी ने मानो मुकेश के गानो की झड़ी ही लगा दी. पहला गाना ‘चंदन सा बदन चंचल चितवन’ गाते गाते तो टकटकी लगा कर लगातार मुझे देखे जा रहे थे. मेरे सारे बदन में ज़िंदगी में पहली बार सिहरन सी हो रही थी, लगा मानो मेरी जवानी फिर से वापस आ गई हो. कॉलेज में इतने दीवाने थे कि किसी एक ने दिल में कूक जगाई ही नहीं. उन्नीस साल में शादी हो गई तो मेरे यौवन के स्वामी को मैं से ही फ़ुरसत नहीं मिली और जो भी दैहिक मिलाप थे वो उनकी ज़रूरत के हिसाब से थे, मैं और मेरी दीवानगी कहीं थी ही नहीं. फिर बेटियां मेरे जीवन में आयीं और मैं मदर मेरी बन गई. आज पाठक जी ने मेरे अछूते एहसास को जगा दिया. मैंने गरम गरम पकोड़े और चाय बनाई. पाठक जी के जाने के बाद पहली बार ज़िंदगी में पतिदेव के बाथरूम में बने बाथटब में पानी भर ठीक ‘पड़ोसन ‘की सायरा बानो की तरह ‘भई बद्दूर भई बद्दूर’ गाते हुए दोनो टांगों को हिलाते हुए नहाया. ख़ुद से भी शर्म आ रही थी, एक नई ज़िंदगी जो शुरू हुई थी. सब कुछ पहली बार दिल के दरवाज़े पर दस्तक, ख़ुद को प्यार करना और ख़ुद ही लाल हो जाना. सचमुच प्यार कितना अच्छा एहसास है. लॉक डाउन के इस दौर में मैं ख़ुद और पाठक जी में इतना उलझ गई थी कि अपनी बेटियों और उनके बच्चों की दुनिया से आज़ाद सी हो गई थे. पहले मैं बार बार फ़ोन करती तो एक बार वो लोग उठा मुझे झिड़क देते कि वो बिज़ी रहते हैं, वीक एंड में ख़ुद फ़ोन करेंगे. मैं चुप रह जाती, अब वो लोग भी वर्क फ्रॉम होम कर रहे थे. अब वो बार-बार फ़ोन करते मैं नहीं उठा पाती. क्या एक स्त्री के लिए प्रेम मातृत्व से भी बढ़कर होता है.
अब पाठक जी भी मेरे लिए हरी और तुम हो गए थे. सुबह-सुबह मैं नहा धो कर तैयार हो जाती, वो आते, हम मिलकर चाय नाश्ता बनाते, खाते, गाते और दिन भर मेरे साथ रह रात वो चले जाते. हमारे शौक़ एक से थे, उन्हें भी पेड़ पौधे अच्छे लगते पर गर्मी और लॉकडाउन की वजह से हम बाहर कम ही बैठते. हरी मुझसे दस साल बड़े थे पर पता नहीं उनके साथ कभी लगता ही नहीं था कि किसी बड़े के साथ हूं. हम दोनों ही वापस अपने यूथ में चले गए थे. एक दिन मैं किचन में बड़े ध्यान से नीचे गैस की तरफ़ देखते हुए हरी के लिए मटर की कचौड़ी बना रही थी, अचानक पीछे से दो हाथों ने मेरी आंखों को बंद कर दिया. मैं ऊपर से नीचे तक सिहर गई,पूरे बदन में रोमांच होने लगा. मुझे लगा मानो मैं स्वर्ग पहुंच गई हूं मैं उत्तेजित हो आवाज़ें लगाने लगी. हरी ने मुझे कस कर बांहों में भर लिया और माथे पर एक चुम्बन भी दिया. पता नहीं क्यों ऐसा लगा कि कायनात यहीं रुक जाए. फिर ना जाने किस अपराध बोध ने घेर लिया और झटके से मैंने ख़ुद को उनसे अलग किया. हरी भी नज़रें झुकाए हुए चुपचाप बैठे रहे, किसी तरह मटर कचौड़ी गटकी और चले गए. सारे दिन बिस्तर पर अलट-पलट करती रही और हर तरफ़ हरी की बांहों में ख़ुद को घेरे पाया. बेटियों के फ़ोन आते रहे और मैंने फ़ोन नहीं उठाया. सारे बदन में पूरे दिन अजब-सी अकड़न रही और मन किसी और दुनिया में था मानो मेरा यौवन पहली बार किसी ने भंग किया हो. अंदर से तो मैं गुनगुना रही थी पर थोड़ी डरी सी भी. मन की कस्तूरी से जोड़ने वाला बार बार सामने आ खड़ा हो रहा था. बेटियां मेरे फ़ोन ना उठाने पर घबरा गईं और उन्होंने शुक्ला जी पुराने दोस्त पांडे जी को फ़ोन किया. पांडे जी ने हमारे सोसायटी का नम्बर निकाल सेक्रेटरी को फ़ोन किया और मेरे घर जा मेरा हाल पूछने की गुज़ारिश की. सेक्रेटरी ने हमारे पड़ोसी हरीश पाठक को फ़ोन किया. हरी घबराते हुए
मेरे घर पहुंच कंटिन्यूस कॉल बेल बजाने लगे. मैं तो दूसरी दुनिया में थी. मैंने कॉलबेल की आवाज़ भी नहीं सुनी. वे दौड़ कर मेरे बेड रूम की खिड़की तक आए और ज़ोर-ज़ोर से बाहर से खिड़की खटखटाने लगे. मैं एकदम घबराकर उठी और उन्हें देख बाहर का दरवाज़ा खोला. हरी ने मेरे कान सच में उमेठें और ज़ोर से फटकार लगाई,“आर यू मैड? पागल हो क्या? सबको परेशान कर के रखा है. बेटियां लगातार फ़ोन किए जा रही हैं, शुक्ला जी के दोस्तों ने भी कई बार कॉल किया. बहरी हो गई हो क्या?”
मैं बिना कुछ सोचे-समझे झट हरी से लिपट गई और चिल्ला चिल्लाकर रोने लगी,“हां मैं पागल हो गई हूं बहरी हूं कुछ नहीं सुझता मुझे, क्यों? क्यों? तुम मेरी ज़िंदगी में आए. इस सूखे को क्यों किया गीला अपने प्यार से.’’मैं लगातार रोती रही और मेरे आंसुओं से हरी की शर्ट पूरी भीग गई. हरी बड़ी देर तक मेरे बालों में उंगलिया फेरते रहे. मेरा फ़ोन ले मेरी बड़ी बेटी दिव्या को वेडियो कॉल लगाया. वो तो अपनी मेमने सी मां के बेड रूम में खूसट अंकल को देख डर सी गई,“व्हाट हैप्पेंड मॉम? आप ठीक तो हो! सब कुछ लॉकडाउन और आप हमारे फ़ोन ही नहीं उठा रही हो. थैंक्स अंकल सॉरी आप को तंग किया प्लीज़ आप तो बग़ल में रहते हैं. रोज़ एक बार मॉम को देख लिया करें प्लीज़ अंकल.”
हरी ने बिल्कुल बाप की तरह आश्वस्त किया,“अरे नहीं बेटा डोंट वरी, आई एम हियर, आइ विल डेफ़िनेटली टेक केयर ऑफ़ हर. मेरा नम्बर आपसे शेयर कर देता हूं. मुझे फ़ोन कर लेना अगर आपकी मां फ़ोन ना उठाएं तो.’’
उसके बाद दोनों दामाद, नातियों और यहां तक कि शुक्ला जी के दोस्तों से भी बात कराई. मैं वीडियो कॉन्फ़्रेन्स कॉल पर बात कर रही थी और थोड़ी देर की लिए मुझे प्राइवेसी देने के लिये हरी बाहर चले गए तभी छोटी बेटी फुसफुसाई,“ये खड़ूस मॉम के रूम में क्या कर रहा है? मॉम बी केयर फ़ुल, ही इज़ वेरी डेंजरस. दी याद है कैसे घूरता था हमें! मुझे तो मॉम की चिंता हो रही है.’’ बड़ी ने छोटी को डांटा,“चुप चुप अंकल बोल इन्हीं ने तो मॉम को हमारे लिए ढूंढ़ निकाला. भूल गई हम कितने परेशान थे सुबह से. मॉम बी रेस्पोन्सिबल, ऐसी हरक़त नो रिपिटेशन. छोटू अब ये अंकल रोज़ तुझे मॉम के पास मिलेंगे. आई ओन्ली हैव आस्क्ड हिम टू कम टू मॉम्स प्लेस एवरी डे. मॉम तो ना पता नहीं कब बड़ी होंगी पहले पापा थे इनकी केयर के लिए. कितनी बार कहा यहां आ जाओ, ग्रीन कार्ड ले लो, हम भी निश्चिंत रहेंगे. पर ना जी ना मैं भली मेरा घर भला. यहां तुम्हारे पापा की यादें बसी हैं. बड़ी आई पापा वाली, पापा जब स्मार्ट बनाना चाहते थे तब साड़ी वाली लम्बी चुटिया वाली अम्मा बनी हुई थी. जैसे पापा की बड़ी चिंता हो.”
बड़ी बेटी बोलती जा रही थी और मैं रोते जा रही थी. उनके खड़ूस अंकल बेडरूम के दरवाज़े के बाहर से ही देख रहे थे, वो बेचारे तो वीडियो में आना ही नहीं चाहते थे. डर था फिर बेटियां ये ना कह दें कि खड़डूस बूढ़ा अभी तक यहां क्यों है? हमारी बातें ख़त्म होते ही हरी ने मुझे समझाया कि,“हमारे कई रूप होते हैं जहां तुम मेरी मीरा हो वहीं उनकी मम्मा. हर रोल बखूबी निभाओ मीरा.’’
बहुत देर वो मेरे साथ मेरा हाथ पकड़े मेरे बालों को सहलाते हुए वे मेरे साथ बैठे रहे. मैं मंत्रमुग्ध सी उनकी सारी बातें सुनती रही. उसके बाद ये ना ख़त्म होने वाला सिलसिला चलता रहा. इतना महफ़ूज़ तो मैंने कभी बाबूजी के कंधों में भी अपने आप को नहीं किया था जितना सिर्फ़ हरी के घर आने पर ख़ुद को किया. लॉकडाउन था, किसी के देखने सुनने का भी डर नहीं था. मेरे घर हमेशा मेरे साथ रहने वाले वॉचमैन पर लगभग मेरे पितातुल्य रामू काका लॉकडाउन के पहले दो दिनो के लिए अपने गांव गए और वहीं फंस गए. महरी और माली नहीं आ सकते थे, लगभग यही हाल हरी के घर का था. अब तो लगभग हम पूरा दिन एक साथ बिताते. हरी खाना बनाने, बरतन और किचन साफ़ करने में मेरी मदद करते. उसके बाद दोनो साथ मेरे बगीचे की मरम्मत करते. गर्मी होने के बावजूद मेरे पेड़ फिर चमकने लगे थे. हरी पूरे पौधों को पानी देते. मेरा बगीचा अब हमारा बगीचा बन गया था. इन इक्कीस दिनो में मैंने पूरा जीवन जी लिया था. मैं पचपन और हरी पैंसठ के थे, लेकिन प्यार ने दोनों को इतना फ़िट कर दिया था कि दिन भर रसोई, बाग़वानी घर सफ़ाई के बाद हम थकते भी नहीं थे. हरी ने अपना किचन और सारा घर बंद कर दिया था. केवल रात अपने कमरे में सोने के लिए जाते थे. शादी से पहले ऐसे ही जीवन की ही तो
मैंने कल्पना की थी. मैं अकेले से भी बातें करती, बड़बड़ाती, हरी टोकते,“अरे मैडम अकेले अकेले क्या बड़बड़ाती रहती हो? हमें भी शामिल करो अपनी गुफ़्तगू में, हम भी तो जाने क्या चल रहा है हमारी मीरा के मन में?”

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मैं लजा जाती इस उम्र में भी. सरकार ने लॉकडाउन बढ़ा दिया सभी अकेलेपन से दुखी हम दोनो ख़ुश. रामू काका बड़े परेशान, गांव से फ़ोन किया,“कैसी हो बिटिया? तुम्हारी बड़ी चिंता है, क्या करे ससुरी पुलीस बाहर निकलते ही डंडा मारती है.” रामू काका तो मेरे पितातुल्य थे, मैंने भी चहकते हुए जवाब दिया,“कोई बात नहीं काका, आप घबराइए नहीं, न ही परेशान होईए. यहां हरी हैं ना मेरा ध्यान देने के लिए. काका हमारा बगीचा फिर हरा भरा हो गया है. हरी सभी पौधों को पानी देते हैं, सूखी हुई डाल और पत्तियों को कैंची से काटते भी हैं बीच-बीच में.’’ मेरी बात को बीच में काटते हुए रामू काका ने पूछा,“ये हरी कौन है बिटिया?”
मैं तो घबरा गई डर गई ठीक वैसे ही जैसे कभी कॉलेज के किसी लड़के से बात करते देख भाई ने घर पर अदालत बिठाई हो. मैंने भी वापस उन्हीं दिनों की मीरा बन हंसते हुए जवाब दिया,“क्या काका आप भी नहीं समझे हरी यानी कृष्ण, आपकी मीरा के कृष्ण.’’ रामू काका के तो जैसे जान में जान आई. प्यार से बोले,“बहुते मज़ाक़ करती हो बिटिया, एक पल को तो हम डर ही गए जहां सरकार सब बंद करे रखे है और तुम हरी को पाले बैठे हो. साहेब को गए दो साल हो गए पहली बार तुम्हारी हंसी सुनी है. दिल बहुत ठंडा हुआ बिटिया तुम्हारी ख़ातिर, रात दिन तुम्हारे बारे में सोचते रहते थे. ये हरी हमाई बिटिया की रक्षा करें.’’
रामू चाचा को इस तरह उल्लू बना मैं ख़ूब हंसी. मेरी हंसी सुन हरी अंदर आए उन्हें मेरे हंसने का कारण पता चलते ही वे भी खिलखिला कर हंसे. उन्होंने मुझे अपनी बांहों में लेते हुए ज़ोर-ज़ोर से उदघोषणा की,“मीरे आप परेशान ना हों. ये हरी तुम्हारी राणा से रक्षा करेंगे.” हम दोनों उस दिन ख़ूब हंसे.
लेकिन सदियों से ये सुनते आए हैं प्यार को ख़ुद की ही नज़र लग जाती है. हीर रांझा, लैला मजनू और ना जाने कौन-कौन कहां अपने प्यार में मिल पाए थे. इसलिए इतने प्यारे पलों से डर भी लगने लगा था. शायद जो ना मिल पाए वही प्यार है, अगर मैं डरती तो हरी मुझे डांट लगाते. हरी के बेटे रवि का दोस्त से आया था पर अब तक लॉक डाउन की वजह से अपने अंकल से मिलने भी नहीं आ पाया था. रवि ने अपने पापा के लिए लंदन से कुछ सामान भिजवाया था. लॉक डाउन में थोड़ी ढील होने पर उसने आने की इच्छा जताई. मैंने हरी से मना भी किया कि बाहर से आया है. पता नहीं क्यों हरी के अंदर कहां से शुक्ला जी की आत्मा समा गई और मुझे डांटने लगे,“तुम भी ना मीरा इतनी नेगेटिव क्यों हो? नए रिश्ते बनते हैं तो पुराने रिश्ते थोड़े ही ना टूट जाते हैं. अरे वो लॉकडाउन के पहले आया है मज़े से घर पर है.
पूरब ने कुछ सामान भेजा है. बेटा है मेरा, सामान में उसकी ख़ुशबू होगी. बेटे से मिले साल हो गया. सामान में बेटी द्वारा भेजी स्टारबग की बहुत सारी मेरी फ़ेवरेट कॉफ़ी के पैकेट और रेड वाइन और ना जाने कितनी यादें हैं. एक तुम ही तो नहीं हो ना मेरी ज़िंदगी में. रोज़ रात को अशिता मुझसे पूछती है कि कॉफ़ी ट्राई की या नहीं? यही हाल पूरब का भी है. बहुत ढूंढ़-ढूंढ़ कर बाप के लिए व्हिस्की और वाइन भिजवाई है. मैंने तो कभी मना नहीं किया बेटियों से बात करने के लिए जिनके लिए मैं एक खूसट बूढ़ा हूं. रवि पूरब का दोस्त है, तीन हफ़्तों से ज़्यादा हो गया है उसे आए.’’
पता नहीं क्यों मन बड़ा आहत हुआ उस दिन लगा मर्द मर्द होता है. पहली बार कोरोना के दौरान शुक्ला जी की याद आई क्योंकि पाठक जी में मुझे आज शुक्ला जी दिखे. उस दिन छोटी बेटी का खूसट बूढ़ा बोलना उन्होंने सुन लिया था लेकिन आज उसका उदाहरण देने का कोई औचित्य नहीं था. दूसरे दिन उन्होंने अपने बेटे के दोस्त को अपने घर ही बुलाया शायद मुझसे नज़दीकियों का भी एहसास अपने बेटे तक नहीं पहुंचने देना चाहते थे, क्योंकि शायद मेरा वज़ूद भी उनके बेटे के लिए खूसट बुढ़िया से ज़्यादा ना रहा हो. वो लड़का भी अपने घर से उनके लिए अपनी मां के हाथ का बना खाना बनवा कर लाया था.
दोनों ने ना केवल साथ खाना खाया बल्कि घंटों बातें की. बेटे के दोस्त ने अपने पाठक अंकल का पूरा घर साफ़ भी किया. मैं बार-बार घर का दरवाज़ा खोल अपने हरी का इंतज़ार करती रही लेकिन सिर्फ़ बाजू वाले घर से आते ठहाकों के अलावा कुछ हाथ ना आया. शाम बड़ी डर तक वीडियो कॉल में बेटियों से बात करती रही. छोटी ने फिर छेड़ा कि,“खूसट बूढ़ा कहां है?” मैंने उसे डांट लगाई कि अंकल ने उस दिन उसका दिया टाइटल सुन लिया था शायद इसीलिए नहीं आ रहे हैं, लेकिन मैंने अपनी दोनों बेटियों से दिल लगाकर बातें की. हरी को जलाने के लिए ड्रॉइंग रूम में ही बैठ ज़ोर-ज़ोर से ठहाकों का जवाब ठहाकों से दिया.
दूसरे दिन हरी आए लेकिन मैंने पता नहीं क्यों उन्हें श्रीमान पाठक से आगे नहीं बढ़ने दिया. प्यार हो या प्यार की चोट हो हर उम्र में एक सा ही रिऐक्शन होता है. उन्होंने भी मेरे ड्रॉइंग रूम से मेरे वीडियो कॉल के ठहाके सुने थे. उन्हें मेरे अंदर की कमीनी मीरा का ज़रा सा भी अन्दाज़ ना था. उन्होंने पूछा,“कल कोई आया था क्या? बहुत हंसने की आवाज़ें आ रहीं थीं.’’ मैंने अपना कमीनापन जारी रखा,“हां शुक्ला जी के पुराने मित्र हैं, अरे पांडे जी हरेंद्र आपको उस दिन जिन्होंने फ़ोन किया था. हालचाल पूछने आये थे. वो भी घर पर बोर हो रहे थे, मैंने ही बुलाया था उन्हें.”
हरी ने बड़ी तल्ख़ी से जवाब दिया,“मुझे बड़ा कह रही थी किसी को घर पर ना बुलाओ सोशल डिसटेंसिंग अब?’’
मेरी आत्मा को उनकी जलन और तल्ख़ी ने बड़ा शांत किया और उतनी ही बेतल्ख़ी से मैंने उनके दिल पर डंडा मारा. “अरे वो कौन सा लंदन से तशरीफ़ ला रहे थे. अपनी ही कॉलोनी में दो सड़क छोड़ रहते हैं वो.”
माहौल की गर्मी वो नहीं सहन कर पा रहे थे, इससे किसी तरह से चाय पी और चलते बने. मैंने दूसरी शाम भी ठीक उसी तरह ठहाके लागते हुए बेटियों से बातें की. छोटी ने फिर पकड़ा और पूछा,“मॉम आर यू आल राइट? कुछ ज़्यादा और बेवजह नहीं हंस रही हैं आप. सब ठीक हैं ना!’’
मैंने उसे डांट लगाई,“अजीब बात है चुप रहूं तो चुप क्यों हो? अब हंसने पर भी मनाही.”
पूरे समय मुझे महसूस हुआ कि हरी मेरे घर के बाहर ही टहल रहे थे. उनकी खोजी आंखें मेरे घर की खिड़की को फाड़ अंदर देखने की पुरज़ोर कोशिश में थीं. छी मुझे ख़ुद से भी शर्म आ रही थी, पता नहीं क्यों मैं भी टीनएजर की एक चोट खाई नागिन की तरह बिहेव कर रही थी. शाम को एक बार हरी का फ़ोन आया पर जान बूझकर मैंने नहीं उठाया. जो सारे नखरे लटके झटके जवानी में नहीं कर पायी अब कर रही थी. सो इममेच्योर लेकिन फिर दिल के हाथों मजबूर. ख़ुद से ख़ुद की शिकायत की, किसी से शेयर भी नहीं कर सकती थी.
मैं यही प्रक्रिया चार दिनों तक दोहराती रही और हरी ने भी मुझसे बेरुख़ी बनाई रखी. पांचवें दिन तो मैं हरी के लिए बैचेन हो रही थी लेकिन मैंने तो हरी को जलाने की ठानी थी. मैंने सुबह शाम ख़ूब हॉर्मोनियम बजा कर गाना गाया. हर शाम हंस-हंस कर बेटियों से बातें की. वो दोनों भी मेरे इस बदलाव से बड़ी ख़ुश थी. इस तरह एक हफ़्ता बीत गया, मैं तो प्यार में जलाने के खुमार में डूबी हुई थी. अचानक एक शाम मेरे फ़ोन की घंटी बजी, वो फ़ोन हरी के बेटे का लंदन से था कि उसके पापा तीन दिनों से फ़ोन नहीं उठा पा रहे हैं. उसे भी मेरा नम्बर हमारी कालोनी के सेक्रेटरी ने दिया था. बेचारा बच्चा बार-बार प्लीज़-प्लीज़ कह अपने पापा को देखने की गुज़ारिश कर रहा था. मैं तो आत्मग्लानि से कांपने लगी, मुझे बीच में तीन-चार बार हरी के फ़ोन भी आए पर मैंने जानबूझ कर नहीं उठाया. मैं खूसट बुढ़िया प्यार नफ़रत और ईर्ष्या का खेल जो खेल रही थी. मैं दौड़ कर हरी के घर गई, बहुत दरवाज़ा खटखटाने के बाद भी उन्होंने दरवाज़ा नहीं खोला. मैं पागलों की तरह दौड़ते हुए हरी के बग़ल वाले यानी श्रीवास्तव साहेब के घर पहुंच गई. मुझे इस तरह देख पूरा श्रीवास्तव परिवार हैरान हो गया. शुक्ला साहेब पूरी कालोनी में अपना ऐसा दबदबा बना गए थे कि उनकी बीबी सड़क पर वो भी नाइट ड्रेस में. ख़ैर उन्होंने और पड़ोसियों को इकठ्ठा किया और सबने मिल दरवाजा तोड़ा तो सब सन्न रह गए. हरी अपने बाथरूम में अपने ही मल से सने नीचे गिरे पड़े थे. लोग उन्हें छूना भी नहीं चाह रहे थे, कोरोना का समय जो चल रहा था. मैंने आगे बढ़ उनके माथे को छुआ जो तप रहा था. कोई मदद को आगे नहीं आया सबके लिए वो खूसट बूढ़े ही थे फिर कोविड का डर भी था. नारी शक्ति का अन्दाज़ लगाना भी कठिन है. पता नहीं कहां से हिम्मत जुटा अकेले ही उन्हें उठा पूरा साफ़ किया और बिस्तर तक खींच लाई. पहली बार अपने हरी का घर बेड रूम देखा. अकेले रहते हुए भी बिलकुल व्यवस्थित. ग़नीमत कपड़े गीले नहीं थे इससे कपड़े बदलने की ज़रूरत नहीं थी. बेचारे तेज़ बुखार से बेहोश से थे. बिस्तर पर लिटा सर पर ठंडे पानी की पट्टियां लगाने से हरी ने बीच में आंखें खोल मुझे देखा तो उनके चेहरे पर एक फीकी हंसी आई.
पड़ोसियों के फ़ोन करने पर कोविड के लिए तैयार की गई टीम के डॉक्टर और नर्सेंस अंतरिक्ष यात्रियों की तरह कपड़े पहने आए मुझे दूर रहने कह मुझ पर बहुत सारा सेनेटाइज़र डाला और मेरे हरी को अपने साथ देवदूत की तरह सफ़ेद यान में बिठा कर ले गए. बाहर ऐसा माहौल था कि बुख़ार वाला मरीज़ और कहीं जा ही नहीं सकता था. मैंने उन्हें उनके बेटे का नम्बर दे दिया था.
हरी को अस्पताल भिजवाने के बाद मैं इतना रोई जितना शायद बाबूजी के गुज़र जाने के बाद भी शायद नहीं रोई थी. शाम को बेटियों के बदले हरी के बेटे पूरब से बड़ी देर बात की, उसने अपनी बहन अशिता को भी कॉन्फ्रेंस वीडियो कॉल में ले लिया था. दोनों पर मुझे बड़ा प्यार आया. बेचारे… इतने दूर, करें तो क्या करें सिवाय थैंकयू आंटी के. मैंने मां की तरह दोनों को ढाढ़स बंधाया. रात को जब बेटियों को बताया तो दोनों चिल्लाने लगीं “आप भी ना, क्या ज़रूरत थी खूसट बूढ़े को छूने की. मॉम आपकी समझ तो हमारे बच्चों से भी कम है. अब रो रो कर आंखें सूजा ली हैं. ऐसा भी क्या रिश्ता था उसका हमसे जो आपने जान जोखिम में डाल दी. सारी कालोनी वाले आपकी मंद बुद्धि का मज़ाक बना रहे हैं. श्रीवास्तव अंकल ने पांडे अंकल को फ़ोन किया था और पांडे अंकल ने हमें. वो तो कोरोना और अपनी उम्र की वजह से आपसे मिलने भी नहीं आए. ख़ैर हमारी मां तो सोलह साल की हैं खूसट बूढ़े की टट्टी साफ़ करने वाली आया. इतनी भी क्या जल्दी थी? थोड़ा रुक जातीं कोविड टीम उन्हें क्लीन कर देती मेरी मदर टेरेसा.’’ मैं चुप रही, अपने अंदर के तूफ़ान का मैं किसी को पता भी नहीं चलने देना चाहती थी नहीं तो मदर टेरेसा से कुलटा बन जाती.
उनके बेटे का रोज़ सुबह शाम मेरे पास फ़ोन आता, बेचारे… पर तो दोहरी गाज गिरी थी. उसकी इकलौती बहन भी वहां जर्मनी में कोरोना से जूझ रही थी. जिस माल से अपने पापा की कॉफ़ी पैक करायी थी, पैक करने वाला बॉय कोरोना पोज़िटिव था. ज़िद्दी वायरस इतने दिनों तक पैक्ड पैकेट में भी ज़िंदा रहा, जो सिर्फ़ हरी ने छुआ था, क्योंकि भेजने वाला बेटा और लाने वाला दोस्त बिलकुल ठीक थे. हॉस्पिटल में पूरब हरी से बात करता फिर मुझे फ़ोन करता. मुझे भी बेसब्री से उसके फ़ोन का इंतज़ार रहता. उसे मेरी भी बड़ी चिंता थी और उसके कहने पर मैं हरी के घर गई, उसे अस्पताल पहुंचाया इसके लिए वो मेरा आजन्म आभारी रहेगा, ऐसा बार-बार बोलता और रोता था. मुझे उसमें मानो अपना बेटा दिख रहा था.
दोनों बाप बेटों ने चाहे थोड़े दिनो के लिए ही मेरे जीवन में पूर्णता जो ला दी थी. बेटियां तो जब फ़ोन करती पता नहीं क्यों हरी को कभी खूसट तो कभी कमीना तो ना जाने कौन-कौन सी अंग्रेज़ी की गालियां देतीं. मुझे बेसब्री से हर शाम पूरब के वीडियो कॉल का इंतज़ार रहता. वो मुझे अपना पूरा घर दिखाता, कभी किचन में बनाई अपनी डिश. शायद हरी ने मेरा ज़िक्र उससे कई बार किया था, क्योंकि उसे मेरी अदरक की चाय, मटर की कचौड़ी, मूंग दाल का हलवा सब पता था. उसके पापा का ध्यान रखने का शुक्रिया अदा करता. बेचारा… बिना मां का बेटा, हरी की पत्नी की बच्चे छोटे थे तभी कैन्सर से मर गई थी. हरी उनके लिए मां बाप दोनों थे, इसका पता मुझे अब बेटे से बातें कर पता चल रहा था.
हरी को अस्पताल गए पंद्रह दिन हो गए थे. मैं बहुत अकेला महसूस करती थी, कुछ हद तक पूरब शाम को बात कर ये अकेलापन दूर करने की कोशिश करता था. कालोनी में लोग थोड़ा बाहर निकल वॉक भी करने लगे थे, पर मैं तो अछूत कन्या बन गई थी क्योंकि मैंने एक कोविड पॉज़िटिव को छुआ जो था. मेरा एक कोविड टेस्ट नेगेटिव आया था. पूरब ने मुझे बताया कि हरी में भी सुधार हो रहा है. मुझे हर शाम पूरब के फ़ोन का इंतज़ार रहता. पूरे घर बगीचे में हरी की यादें थीं. मेरे साथ पूरा घर फिर से अपने हरी को पाने की लिए बैचेन था़. काश…, ज़िंदगी इतनी सरल होती. शाम को वीडियो कॉल आया, पूरब का होगा सोच मैं बाथरूम में रही कि फिर करेगा. आकर फ़ोन देखा तो यहां का ही लोकल नम्बर था. मेरे वापस कॉल करने पर दूसरी तरफ़ किसी ने भी नहीं उठाया. फिर पूरब फ़ोन आया, उसकी आंखें लाल थीं, उसने मुझे अस्पताल के साथ कॉन्फ़रेंस कॉल में लिया. उस तरफ़ वही डॉक्टर था जो हरी को लेकर गया था,“अरे आंटी कहां थीं आप? हरीश जी आपसे बात करना चाहते थे. बेचारे कल से आप से बात करने के लिए बैचेन थे. आपने इनकी सेवा जो की थी ख़ुद की परवाह किए बिना.’’ फिर उस डॉक्टर ने कैमरा हरी की तरफ़ घुमाया. हरी को वेंटिलेटर से कनेक्ट कर दिया गया था. आंखे पथराई-सी थीं, मानो बहुत कुछ कहना चाहती हों. मैंने बहुत मुश्क़िल से अपने आपको रोका. अस्पताल से कनेक्शन कट गया. पूरब कहने लगा,“आपसे पापा बहुत बात करना चाहते थ. वेंटिलेटर पर डालने से पहले मीरा मीरा पुकार रहे थे. आपका नाम मीरा है क्या आंटी? क्योंकि मेरी मॉम का नाम तो सुनीति और दादी का नाम सुधा था. मैं आज सच में अनाथ हो गया. सुबह दीदी को हाथ हिलाकर विदा किया और अब पापा.” वो दहाड़े मार कर रो रहा था और मैं संज्ञा शून्य सी हो गई थी. मेरा सब कुछ लुट गया और मैं खुल कर किसी के सामने रो भी नहीं सकती थी. वो आंटी-आंटी पुकारता रहा और फ़ोन कट गया. कोरोना से शुरू हुई मेरी ये छोटी सी लव स्टोरी कोरोना में ही ख़त्म हो गई.

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