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अश्वसेन-a short mythological story from Mahabharata of Arjun and a snake

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खंडन वन में एक महा सर्प रहता था। उसका नाम था अश्वसेन। एक बार वन में आग लगी उस अग्निकांड का निमित्त अर्जुन को ठहराया गया। अग्निकांड में अश्वसेन की माता का देहांत हो गया ,वह बहुत क्रोधित हुआ और अर्जुन से बदला लेने की सोचने लगा। कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत चल रहा था। वह वाण का रूप धरकर कर्ण के तरकश में आ घुसा। शल्य ने अटपटे से वाण को देखा और कर्ण से कहा -महाभाग ,यह वाण कुछ बेतुका सा है। दूसरा वाण चढ़ाओ कर्ण से दर्प से कहा -शल्य ,मैं दुबारा लछ्य नहीं देखता। और एक बार बाण चढ़ा लिया तो उसे वापस तरकश में नहीं रखता। उसने वाण चढ़ाया और लछ्य की तरफ चला दिया। कृष्ण ने इस महा भयंकर वाण को देखा तब रथ के घोड़े को नीचे बिठा दिया। और वाण के प्रहार से अर्जुन का केवल मुकुट ही कटा। अर्जुन के बच जाने से अश्वसेन को बहुत दुःख हुआ। उसने असली स्वरुप में आकर कारण से कहा ,-‘हे महाबली ,अबकी बार मुझे ध्यानपूर्वक छोडो इससे मेरा और तुम्हारा सामान शत्रु अर्जुन निश्चित रूपेण मृत्यु के मुख में चला जाएगा।
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कर्ण ने उससे सारा परिचर पूछा और कहा कि वह महान विषधर महासर्प है। उसने मेरे देश को जलाया है मैं उससे बदला लूंगा। कर्ण ने बड़ा मार्मिक उत्तर दिया ,-‘हे नाग ,मैं अपने ही पुरुषार्थ से विजय पाना चाहता हूँ। द्वेष बुद्धि से छद्म का आश्रय लेकर तुम जिस प्रकार मेरी सहायता करना चाहते हो उसके अपेक्षा मुझे पराजय स्वीकार है। जो होगा उसे मुझे ही भुगतना है ,तुम अपने घर चले जाओ। किसी भी मूल्य पर सफलता पाने के लिए और कुछ भी करने से श्रेष्यकर हारना है। नैतिक मूल्यों का पालन हर हालात में होना चाहिए चाहे उससे अपने स्वार्थ को कितना भी आघात क्यों नहीं लगता हो। ?और चलते -चलते चंद – पंक्तियाँ ,गुजर रही है जिंदगी ऐसे मुकाम से,अपने भी दूर हो जाते हैं ज़रा सी जुकाम से, तमाम कायनात में कातिल बीमारी की हवा हो गई. वक़्त ने कैसा सितम ढाया ,कि दूरियां ही हवा हो गयी। सब्र करो ,लौट आएँगी खुशियाँ, अभी कुछ ग़मों का शोर है, संभल कर रहें अभी इम्तिहानों का दौर है। क्या गजब का वक़्त दिखाया है कुदरत ने , जो बीमार है वह अकेला रहेगा, जो अकेला रहेगा ,वह बीमार नहीं होगा।

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