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सौ के छुट्टे- a short story in hindi

a short story in hindi

बात पुरानी है। नितिन बाबू मेरे पडोसी हुआ करते थे। एक दिन मुझे सौ के छुट्टे की आवकश्यता पड़ी। उन दिनों सौ रूपये का महत्व था।
पहली बार उनके यहाँ जा रहा था वह भी छुट्टे लेने के लिए। संकोच लिए उनका दरवाज़ा खटखटाया। नितिन बाबू ने अंदर आने को कहा। अहोभाग्य ,आप हमारे
यहाँ पधारे। निक्की बेटा {अपनी बेटी को }अंकल आये हैं कुछः नाश्ता,चाय। जल्दी से लाओ। मुझे अपने प्रयोजन कहने का वक़्त ही नहीं दे रहे थे। खैर
,मिठाई नमकीन,नमकीन,चाय आदि चला। इधर -उधर की बातें हुईं और चलने वक़्त मैने अपने आने का प्रयोजन बताया। वह मुस्कराये और बोले मेरे पास तो शायद
दस-पंद्रह रूपये ही बचे होंगे ,वैसे भी महीने का अंतिम सप्ताह गुजर रहा है सैलरी वाले का यही हाल होता है। फिर भी मैं अपने आप को सौभाग्यशाली
मानता हूँ की आप मुझे इस योग्य समझे कि मेरे पास सौ के छुट्टे हो सकते हैं। इस विकट मेहमानवाजी और विनोदपूर्ण सफाई सुनकर यह वाक्या मेरे
स्मृति में कैद हो गई । फिर एक दिन उन्होंने कहा की आप की शादी नई -नई हुई है। मेरे तजुर्बा तो यही है की शुरू में ही कुछ गलतियों से बंचे।
फिर उन्होंने अपनी आपबीती सुनाई एक दिन शौकिया उन्होंने बेड की चादर बिछा डाली। फिर क्या था -मैडम जी का फरमान हुआ की चादर की सलवटे ठीक करना
-कपडे रखने नित्य का काम हो गया। -एक सुबह मैडम जी ने फरमान सुनाया की सब्जी ले आना है। .सब्जी ले आया। हिसाब बताया तो बिफर गई। “इतना महंगा।पगला।गए हैं क्या?आप को मोल-मोलई करना भी नहीं आता।” यह सुनकर मन तो खिन्न हो गया। फिर एक दिन घर में सब्जी नहीं थी। पिछले बार का अनुभव सेसीख लेते हुए इस बार सस्ती सब्जी खरीदी। सोचा,इस बार मैडम खुश होंगी -पर है रे किस्मत। सब्जी देख चिल्ला उठी -बाजार का जितना सडी -गली सब्जी थी -उठा लाये ना -सारी सब्जी आपको ही खानी पडेगी । गुस्सा पी गया। और ना जाने कितनी नसीहते -हमेशा मुस्कराने वाला सख्सियत -यही महाशय थे
जिन्होंने अपनी पत्नी के बार -बार रंगीन टी.भी नहीं होने के ताने से अजीज होकर अपनी स्कूटी बेच दी। स्कूटी के पैसे से टी भी खरीद ली मैडम ने
सच्चाई जानी तो माथा ठोंक लिया। आज उन वाक्यों के गुजरे कितने साल हो गए पर नितिन बाबू का सहज ,सरल ,और बिनोदप्रिय ब्यक्तित्व हमेशा याद रहेगा

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