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प्रेमांध-A true and emotional hindi love story about the love is blind

प्रेमांध…….
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सही कहा गया है प्रेम अँधा बना देता है, बात दरसल ये है की विवेक बाबू, उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं, उन्होंने अच्छी पढ़ाई की, लेकिन उन्हें नौकरी नहीं मिली, इसलिए वो घर पर ही रहते थे, उनके माँ-बाप को उनकी चिंता थी, किसी ने कहा की शादी करवा दो, जिम्मेदारी होने के बाद जल्दी ही कुछ करने लगेगा,यह बात सुन कर उनकी शादी माँ-बाप ने करवा दी, शादी के बाद वाकई विवेक बाबू को अब घर चलाने का टेंशन होने लगा, इसलिए वह दिल्ली काम ढूंढने आ गए, शुरू में तो छोटी-मोटी नौकरी की लेकिन उसमे उन्हें मन नहीं लगता था, इसलिए कुछ दिन काम करने के बाद वो नौकरी छोड़ देते, आखिर उन्होंने साउथ एक्सटेंशन के एक चौराहा पर छोटी सी दुकान खोली, किस्मत ने साथ दिया और दुकान चल पड़ी,तब तक उन्हें एक बच्चा भी हो गया था, जिसका नाम विनय था, अब वो अपनी पत्नी और बेटा दोनों को दिल्ली ले आये, विनय का दिल्ली के स्कूल में ही एडमिशन करवा दिया, विनय पढ़ने में अच्छा था, वह क्लास में अच्छे अंक लाया करता था, देखते देखते काफी साल बीत गए, अब विवेक बाबू की दुकान उतना अच्छी नहीं चलती थी , खर्चा भी बढ़ गया था, पहले जब शुरू शुरू में दुकान खोला था तो आस पास कोई दुकान नहीं होने की वजह से उनका दुकान पर चहल पहल बनी रहती थी , लेकिन समय के साथ साथ वहां आस पास में काफी दुकान खुल गए थे। उनकी अब सारी आशा उनके बेटे विनय से थी, उन्हें उम्मीद थी की विनय पढ़ लिख कर अच्छे पोस्ट पर जॉब करेगा जिससे उनकी सारी परेशानी खत्म हो जायेगी, अब विनय प्लस टू में पहुंच गया था, जिसे वो पास के इंस्टिट्यूट में ही एडमिशन करवा दिया था , जहाँ वह पढ़ने जाता था, जहाँ उसकी मुलाकात एक लड़की से हुई जिसका नाम आशा था, आशा के पिता अच्छे व्यवसायी थे, उनका पास के ही मार्किट में बड़ा सा दुकान था जो बहुत चलता था, इसलिए आशा पढ़ाई से ज्यादा फैशन पर ध्यान देती थी। जिसके फैशन के चक्कर में विनय पड़ गया, और विनय अब इंस्टिट्यूट से निकलने के बाद ज्यादातर समय आशा के साथ बिताता था, जिसकी वजह से वह पढ़ने में समय नहीं दे पाता था, वक्त के साथ साथ परीक्षा का भी समय आ गया, उसके टीचर,उसके पिता विवेक बाबू सभी उसे पढ़ाई करने को समझा रहे थे, लेकिन वह था की आशा के प्रेम में पड़ कर, पढ़ाई पर समय ही नहीं देता,
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वह परीक्षा में सिर्फ पास अंक ही ला पाया, और किसी तरह इंटर पास कर लिया, वह आगे की पढ़ाई के लिए दिल्ली के कॉलेज में ही एडमिशन ले लिया लेकिन कॉलेज में एडमिशन लेने के बाद भी वह आशा के साथ ही घूमता था, अब विवेक बाबू परेशान रहने लगे, क्योँकि विनय पढ़ने के बजाय घूमने में ज्यादा समय देता था, जिसकी वजह से वह बिलकुल नहीं पढ़ रहा था, वह वाकई प्यार में अँधा हो गया था, इस तरह दो साल और बीत गए, इस दौरान विनय ने अपने पिता विवेक बाबू से काफी पैसा लिया, लेकिन अब विवेक बाबू को समझ आ गया था की उनका बेटा उनके हाथ से निकलता जा रहा है, इसलिए वो विनय को पैसा देना बंद कर दिए, पैसा ना मिलने से विनय खर्च नहीं कर पा रहा था, जिसकी वजह से शुरू शुरू में तो आशा ने खर्च किया, लेकिन बाद में वह नए साथी की तलाश करने लगी और विनय से किनारा करने लगी, आशा का व्यवहार देख कर विनय परेशान रहने लगा, और उसके व्यवहार का कारन उसने अपने पिता को देने लगा, क्योँकि उसके पिता ने पैसा देना बंद कर दिया था जिसकी वजह आशा उससे दूर होने लगी, विनय यह मानने को तैयार नहीं था की आशा उससे प्यार नहीं करती है, अगर प्यार करती तो विनय खर्च नहीं करता फिर भी वह उससे प्यार करती, खैर विनय का ग्रेजुएशन का रिजल्ट आया जिसमे वह मुश्किल से पास हो पाया, अब विवेक बाबू विनय को पढ़ाई के लिए पैसा देना बंद कर दिए और कहा की अब तुम भी दुकान सम्भालो, यह सुन कर विनय का चेहरा देखने लायक हो गया, विवेक बाबू ने साफ़ साफ़ कह दिया की अगर दुकान नहीं संभालोगे तो खाना और रहना दोनों बंद, यह सुन कर विनय को असली जिंदगी का मतलब समझ आने लगा, इधर एक दिन वह दुकान पर बैठा हुआ था तो उसने देखा की आशा किसी और लड़के के साथ घूम रही थी, यह देख कर उसका प्रेमांध खत्म हुआ, और उसने जो गलती कर दी, जो समय बर्बाद कर दिया अब वह वापस नहीं आ सकता था, जिसकी वजह से अब उसे आगे की जिंदगी दुकानदारी करके ही गुजारनी थी, मतलब प्रेमांध होने की वजह से उसने अपना पूरा भविष्य बर्बाद कर लिया

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