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बुद्धिमान काज़ी-A wise Kazi a new short hindi inspirational story written by ruskin bond

बुद्धिमान काज़ी -रस्किन बांड
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एक राजा अपने दरबार में बैठा था। उनके पीछे ज्ञानी काज़ी बैठा था। वे दोनों आपस में बातें कर रहे थे तभी एक कौवा उड़ते हुए वहाँ आया और जोरों से काँव काँव करने लगा। कौवा लगातार काँव -काँव करता रहा और हर कोई उसकी इस गुस्ताखी से अचंभित थे। राजा ने गुस्से में हुक्म दिया ,इस पक्षी को यहां से तुरत निकालो आदेश मिलते ही उस कौवे को महल से तुरत भगा दिया गया। किन्तु पांच मिनट भी नहीं बीते थे कि कौवा फिर काँव -काँव करते हुये वहीँ आ गया। कुपित राजा ने कौवे को गोली मारने का आदेश दिया। किन्तु काज़ी ने उन्हें रोकते हुये कहा -‘अभी नहीं महाराज। शायद आपके बांकी प्रजा की तरह ही यह कौवा आपके सामने अपनी फ़रियाद लेकर आया है। बहुत अच्छा ,राजा ने कहा और एक सिपाही को नियुक्त कर दिया कि आखिर यह कौवा चाहता क्या है ? जैसे ही सिपाही बाहर निकला कौवा भी उड़कर बाहर आया और और सिपाही के आगे -आगे उड़ता चला गया। वह एक चिनार के पेड़ तक ले गया और वहाँ पहुंचकर अपने घोंसले में बैठ गया। जो उस डाली पर टिका था जिसे एक लकड़हारा काट रहा था। कौवा अभी भी जोरों से काँव -काँव की आवाज़ लगा रहा था। सिपाही को सारी स्थिति समझते में ज्यादे देर नहीं लगी ,और उस आदमी को डाली काटने से रोकने का हुक्म दिया। कौवे ने अब शोर मचाना बंद कर दिया था। ‘क्या तुमने डाल काटने के पहले उस पर पक्षी को घोंसला नहीं देखा था ?’ मेरे लिए पक्षी के घोंसले का क्या महत्व है भला ?उसने बेअदबी से जवाब दिया ,शायद तुमसे थोड़ा सा अधिक कीमती।
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सिपाही ने उस आदमी के इस गुस्ताखी पर उसे गिरफ्तार कर लिया और राजा के पास ले गया। और सारी बातें बताई। राजा ने क़ाज़ी से पूछा -‘इस आदमी को इसकी गुस्ताखी के लिए क्या दंड मिलना चाहिए ?’बुद्धिमान काज़ी ने कहा -‘महाराज ,कुत्ते तो कभी -कभी भौंकते हैं मगर इस आदमी को पता होना चाहिए कि सिपाही अपना खुद का हुक्म नहीं चला रहा बल्कि राज्य के आदेश का पालन कर रहा है। तो शायद इसने गुस्ताखी की ही नहीं होती। शायद अब यह आदमी पछता रहा है। इसको दंड स्वरुप कुछ बेंत लगाए जा सकते हैं। आदेशानुसार लकड़हारे के तलवे पर पांच बेंत लगाए गए और उसे छोड़ दिया गया। हालाँकि यह दंड उतना कठोर नहीं था पर उसे अपने अपने घर तक पहुँचाने में पुरे रास्ते उछल -उछल कर चलना पड़ा था।

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