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अपनापन-Affinity a new romantic love Story in hindi language

अपनापन…..
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कहा जाता है, हर पांच कोस पर भाषा बदल जाती है, और भारत में तो कई भाषायें बोली जाती हैं, कहीं कहीं तो इन भाषाओ की वजह से कई बार समस्याएं भी उत्पन होती है, लेकिन फिर भी एक जगह से इंसान दूसरे जगह जाता ही है, और कुछ लोग मदद भी करते हैं, कुछ ऐसा ही संजीव और पंकज के साथ भी हुआ, वो दोनों गोरखपुर के रहने वाले थे और उनकी भाषा भोजपुरी थी, हालाँकि उन दोनों को हिंदी आती थी, लेकिन हिंदी में भी भोजपुरी का मिश्रण झलकता था, दोनों प्लस टू पास करने के बाद आगे की पढ़ाई के लिए बैंगलोर चले गए, जहाँ मूल रूप से कन्नडा बोली जाती थी, शुरू शुरू में तो उन दोनों को कुछ समझ में नहीं आता था, हाँ यह जरूर था की वहां भी कुछ लोग हिंदी बोलते थे जिनसे वो दोनों अपना काम चला लेते थे, लेकिन बैंगलोर के कुछ हिस्सों में खास कर जहाँ वो दोनों रहते थे, कन्नडा ही बोली जाती थी, जिनसे उन दोनों को बहुत मुशिकलों का समाना करना पड़ता था, वो दोनों जिस कॉलेज में पढ़ते थे वहां भी सभी कन्नडा, तमिल, तेलगु और मलयालयम ज्यादा बोली जाती थी, हाँ यह जरूर था की कुछ स्टूडेंट हिंदी भी बोल लेते थे, जिनसे उन दोनों की दोस्ती हो गयी थी, लेकिन भोजपुरी बोलने वाला वहां कोई नहीं था, इसलिए दोनों एक साथ ही रहा करते थे, वो दोनों आपस में हमेशा भोजपुरी में ही बातें किया करते थे, जिनकी वजह से वहां के लोग कुछ समझ नहीं पाते थे, खैर दोनों एक ही जगह थे और दोनों बैंगलोर में किसी को जानते नहीं थे, इसलिए दोनों आपस में ही बातें किया करते थे। एक बार दोनों को बैंगलोर में पुस्तक मेला लगा होने का बात पता चली , तो दोनों शाम को घूमने का मन बना लिया, दोनों शाम को घूमने के लिए चले गए, जब दोनों पुस्तक मेला पहुंचे तो वहां बहुत भीड़ थी, सभी स्टूडेंट्स किताबो के अलग अलग स्टाल में लगे किताब को देख रहे थे, पढ़ रहे थे, दोनों भी स्टाल में लगे किताबें उल्टा कर पढ़ रहे थे, तभी पास खड़ी लड़की को देख कर पंकज ने संजीव से कहा, लड़की कितनी सुन्दर है, काश ऐसी लड़की ज़िन्दगी में होती, तो मजा आ जाता !
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यह सुन कर संजीव ने लड़की की तरफ देखा वाकई लड़की बहुत सुन्दर थी, उसका दिल भी उस पर आ गया था, लेकिन पहले पंकज ने उस लड़की को देखा और उसके बारे में कहा, इसलिए वह अपने दिल के भाव दिल में ही रख लिया, अब पंकज ने संजीव से कहा की कुछ ऐसा हो जाए की लड़की भी मेरी तरफ देखने लगे तो बात बन जाए, यह सुन कर संजीव लड़की के स्टाल पर चला गया, लड़की मम्मी के साथ आयी थी, और उसकी मम्मी भोजपुरी में अपनी बेटी से कुछ कहा, भोजपुरी सुन कर संजीव का दिल ख़ुशी से झूम उठा, क्योँकि वह समझ चूका था की इस भीड़ भाड़ में भी वह लड़की उसके तरफ जरूर ध्यान देगी, वह वापस पंकज के पास आया, और पंकज से पूछा, तुम क्या कह रहे थे? पंकज ने कहा, काश ! यह लड़की हमारी तरफ देखे तो बात बन जाए, संजीव ने कहा की लड़की हमारी तरफ जरूर देखेगी, पंकज ने कहा, इतने देर से तो नहीं देख रही है फिर अचानक कैसे देखेगी? संजीव ने कहा देखेगी तो देखेगी, इस पर पंकज ने संजीव से शर्त लगा लिया, संजीव ने कहा ठीक है, लड़की को मैं देखने पर मजबूर कर दूंगा, अब वह पंकज को साथ ले कर जिस स्टाल पर लड़की खड़ी थी , वहां ले गया, और उसकी मम्मी के पास खड़ा हो कर एक किताब देखने लगा, वह हिंदी की किताब थी, शायद कोई ग्रंथ थी, लड़की के माँ के हाथ में भी वही किताब थी, संजीव ने लड़की की माँ से भोजपुरी में ग्रन्थ के बारे में कुछ कहा, यह सुन कर लड़की की माँ संजीव को गौर से देखने लगी, और उससे उसके शहर के बारे में पूछा, संजीव ने कहा की वह गोरखपुर का रहने वाला है, यहाँ पढ़ाई कर रहा है, लड़की ने भी भोजपुरी सुना तो वह भी संजीव की तरफ देखने लगी थी, अब तो पंकज यही शर्त हार गया, उसकी समझ में नहीं आ रहा था की अचानक यह कैसे हो गया की लड़की संजीव की तरफ देखने लगी, संजीव ने पंकज को पास बुला कर लड़की की मम्मी से मिलवाया तो लड़की की मम्मी ने भी अपनी बेटी से दोनों को मिलवाया, लड़की का नाम आकांक्षा था, फिर तो आकांक्षा लगातार दोनों को देखे जा रही थी, जहाँ संजीव आकांक्षा की मम्मी से बात कर रहा था वहीँ पंकज को आकांक्षा से बात करने को कह रहा था, लेकिन पंकज बात ही नहीं कर पाया, और संजीव को ही बात करने को कहा, लेकिन संजीव ने ऐसा नहीं किया, क्योँकि उसे मालूम था की अगर वह बात करेगा तो कहीं ना कहीं पंकज को धोखा देगा इसलिए वह पंकज को वहां से ले कर यह कहते हुए निकल गया की तुम शर्त हार गए हो, चलो अब पार्टी दो, लेकिन पंकज यह समझ नहीं पाया की आखिर संजीव ने ऐसा क्या किया की लड़की और उसकी माँ तुरंत बात करने लगी,संजीव को मालूम था की यह भाषा का अपनापन था ना की उसका.

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