Articles Hub

मोह माया मायका-an inspirational hindi story of a girl about her mother home

an inspirational hindi story of a girl about her mother home

an inspirational hindi story of a girl about her mother home,inspirational story in hindi,inspirational story in hindi for students, motivational stories in hindi for employees, best inspirational story in hindi, motivational stories in hindi language
दस-पंद्रह दिन मायके में बिताकर आई नेहा ने आज बड़े ही ख़ुशनुमा मूड में फिर से स्कूल जॉइन किया था. मायके की खट्टी-मीठी स्मृतियों में डूबते-उतराते उसने स्टाफ रूम में प्रवेश किया, तो साथी अध्यापिकाएं उसे इतने दिनों बाद अपने बीच पाकर चहक उठीं.
“ओ हो, साड़ी तो बड़ी ख़ूबसूरत मिली है मायके से! प्योर सिल्क लगती है. क्यों प्राची, ढाई हज़ार से कम की तो क्या होगी?” मधु ने पास बैठी प्राची को कोहनी मारी.
“मेरी नज़रें तो कंगन और पर्स पर ही अटकी हैं. तेरी भाभी की चॉइस अच्छी है.” प्राची ने कहा.
इसके आगे कि कोई और अपनी अपेक्षाओं का पिटारा खोले, नेहा ने बीच में हस्तक्षेप करना ही उचित समझा. “यह साड़ी तो अभी एनीवर्सरी पर तनुज ने दिलवाई थी. और ये कंगन और पर्स मैंने एग्ज़ीबिशन से लिए थे.”
“कुछ भी कहो, आजकल मायके जाना कोई आसान सौदा नहीं रह गया है. जितना मिलता नहीं, उससे ज़्यादा तो देना पड़ जाता है. पिछली बार भतीजे-भतीजी के लिए ब्रांडेड कपड़े ले गई थी. भाभी के लिए इंपोर्टेड कॉस्मेटिक्स, घूमने, बाहर खाने आदि पर भी खुलकर ख़र्च किया और बदले में मिला क्या? एक ठीकठाक-सी साड़ी. अभी तो उसे तैयार करवाने में हज़ार-पांच सौ और ख़र्च हो जाएंगे.” मधु ने आंखें और उंगलियां नचाते हुए बताया, तो नेहा को वितृष्णा-सी होने लगी. अपनी किताबें समेटकर वह स्टाफ रूम से क्लास का बहाना बनाकर निकल ली.
इतने दिनों बाद क्लास लेेकर उसे बहुत अच्छा लगा. अगला पीरियड खाली था, पर उसका स्टाफ रूम में लौटने का मन नहीं हुआ. साथी अध्यापिकाओं की ओछी मानसिकता देखकर उसका मन बुझ-सा गया था. उसके कदम स्वत: ही लाइब्रेरी की ओर उठ गए. वहां के शांत वातावरण में उसके उ़िद्वग्न मन को कुछ राहत मिली. टेबल पर पर्स और हाथ की किताबें रखकर उसने अपना सिर कुर्सी से टिका दिया. मूंदी हुई पलकों के पीछे मायके में कुछ दिन पूर्व बिताया समय साकार हो उठा. कैसे उसे देखते ही मम्मी-पापा के चेहरे खिल उठे थे. मां ने उत्साह से बताया था कि हमेशा धीर-गंभीर और चुप-चुप रहनेवाले पापा पिछले एक घंटे से उसके इंतज़ार में गलियारे में चक्कर काट रहे थे. “बातें कुछ नहीं करनी हैं इन्हें. बातें तो तुझसे मैं ही करूंगी. ये तो तुझे देखकर ही तेरे मन का पूरा एक्सरे अपने दिल में उतार लेते हैं. क्यूं जी, हो गई तसल्ली आपको? ख़ुश है न आपकी लाड़ली?”
तब तक भइया-भाभी, भतीजा-भतीजी को भी उसके आने की भनक लग चुकी थी. सबने उसे चारों ओर से घेर उसकी, तनुज की, यशी की कुशलक्षेम पूछना आरंभ किया, तो वह निहाल हो उठी थी. कुछ रिश्तों की ख़ुशबू ख़ुद में ही चंदन जैसी होती है. ज़रा-सा अपनापन घिसने पर ही रिश्ते दिल से महक जाते हैं. एक-एक को उनके साथ न आ पाने की न केवल सफ़ाई देनी पड़ी थी, वरन यह वादा भी करना पड़ा था कि यशी की परीक्षाएं समाप्त होते ही वे तीनों आएंगे और ज़्यादा दिनों के लिए आएंगे.
“वैसे हर बार क्या मैं ही आती रहूंगी? दूरी तो उतनी ही है. कभी तुम लोग भी तो प्रोग्राम बना लिया करो. हमें भी इतनी ही ख़ुशी होगी.” नेहा ने झूठ-मूठ नाराज़गी दर्शाई थी. वैसे इतना प्यार और अपनापन पाकर वह मन ही मन आल्हादित थी.
“सही है बुआ! इस बार राखी पर मैं सबको लेेकर आऊंगा. दादा-दादी को भी.” भतीजे ने जोश में वादा किया था.
सबके साथ मम्मी-पापा के भी अपने घर आने की कल्पना मात्र से ही नेहा को गुदगुदी-सी हो आई थी.
“मैं चाय लेकर आती हूं.” भाभी उठकर जाने को हुईं, तो नेहा ने हाथ पकड़कर उन्हें बैठाना चाहा. “मैंने ट्रेन में पी ली थी. ज़रा भी इच्छा नहीं है. आप बैठो.”
“अरे, ऐसे कैसे? मम्मी-पापाजी तो कब से इंतज़ार कर रहे हैं कि नेहा आएगी, तो उसके साथ ही चाय पीएंगे.”
“ओह! मुझे पता नहीं था. ठीक है, मैं सबके साथ आधा कप ले लूंगी.” नेहा अभिभूत थी.
चाय के साथ भइया ने करारी कचौरियों का पैकेट खोला, तो सबकी लार टपक पड़ी. “ऑफिस से आते हुए मंगू हलवाई से लेकर आया हूं ख़ास तेरे लिए. उसे करारी निकालने को कहा, तो पूछने लगा नेहा बिटिया आई हुई है क्या? मेरे हां कहने पर कहने लगा, सवेरे उसकी पसंद की करारी जलेबियां निकालकर रखूंगा. नाश्ते के लिए ले जाना.”
“अच्छा जी, जलेबियां तो मुझे भी पसंद हैं. कभी मेरे लिए तो जल्दी उठकर नहीं लाए?” चाय लेकर आती भाभी ने इठलाते हुए कहा और साथ ही नेहा को चुपके से इशारा भी कर दिया.
“तुम्हारी शुगर बढ़ी हुई है, थोड़ा कंट्रोल करो.” भइया ने भी नहले पर दहला जड़ दिया, तो पापा बहू के पक्ष में बोल उठे थे.
“इस नालायक को कहती ही क्यूं है बेटी? तेरा जब भी खाने का मन हो मुझसे कहना. मैं मॉर्निंग वॉक से लौटता हुआ ले आऊंगा.”
“बुआ, आप मठरी तो ले ही नहीं रही हो. मैंने बेली हैं.” नन्हीं-सी भतीजी ने ठुनकते हुए आग्रह किया, तो नेहा ने एक साथ दो मठरी उठा ली थी. “अरे, हमें तो पता ही नहीं था कि बिन्नी इत्ती बड़ी हो गई है कि मम्मी को काम में हाथ बंटाने लगी है.” नेहा ने भतीजी को गोद में बैठा लिया था.
“मम्मी को नहीं, दादी को. मठरियां मम्मीजी ने बनाई हैं. ख़ास आपके लिए अपने हाथों से.”
“वो तो ठीक है मां, पर नेहा के हाथ में मठरी का पूरा डिब्बा मत दे देना, वरना याद है न डिब्बा और अचार का मर्तबान सब साफ़.” भइया ने याद दिलाया, तो नेहा झेंप गई. मम्मी हंस-हंसकर सबको बताने लगीं कि कैसे बचपन में नेहा उनके सो जाने पर आस-पड़ोस की सब सहेलियों को बुला लाती थी और वे सब मिलकर सारी मठरियां और अचार चट कर जाती थीं.
हंसी-मज़ाक और बातों की फुलझड़ियों ने चाय नाश्ते का मज़ा दुगुना कर दिया था. भाभी ट्रे समेटकर जाने लगीं, तो नेहा ने साथ लाए तरह-तरह के खाखरे और चिक्की के पैकेट्स निकालकर भाभी को पकड़ा दिए. वे बोल उठीं, “अरे, इतने सारे!”
“मिठाई तो आजकल कोई खाता नहीं है. ये सबको पसंद है तो ये ही ले आई.” कहते हुए नेहा ने दोनों बच्चों को उनकी मनपसंद बड़ी-बड़ी चॉकलेट पकड़ाई, तो वे भी ख़ुशी से उछलते-कूदते बाहर खेलने भाग गए.
“पापा, ये आपके लिए स्टिक! सुबह आप वॉक पर जाते हैं, तो मम्मी को चिंता बनी रहती है, कहीं कुत्ते पीछे न पड़ जाएं.” नेहा ने अपने पिटारे में से अगला आइटम कलात्मक छड़ी निकालते हुए कहा.
“अरे वाह, यह तो बड़ी सुंदर है. मूठ तो देखो कैसी चमक रही है!” पापा ने हाथ में छड़ी पकड़कर अदा से घुमाई, तो भावविभोर नेहा खिल उठी.
“और मम्मी, ये वो ओर्थो चप्पल, मैंने आपको फोन पर बताया था न! इन्हें पहनकर चलने से आपकी एड़ियों में दर्द नहीं होगा.”
“काफ़ी महंगी लगती हैं.” चप्पलों को हाथ में लेेकर उलट-पुलटकर देखती मम्मी के हाथ से नेहा ने चप्पलें खींच लीं और ज़मीन पर पटक दी. “ये पांव में पहनने के लिए हैं. पहनकर, चलकर दिखाओ. आरामदायक है या नहीं?”
“टन टन टन…” अगले पीरियड की घंटी बजी, तो नेहा की चेतना लौटी. फ़टाफ़ट अपना पर्स और पुस्तकें संभालती वह अपनी कक्षा की ओर बढ़ चली. हिंदी व्याकरण का क्लास था. इस विषय पर तो उसकी वैसे ही गहरी पकड़ थी. नेहा को याद आया उस दिन वह रसोई में भाभी का हाथ बंटाने गई, तो भाभी ने उसके हाथ कसकर थाम लिए थे.
“नहीं दीदी, ये सब मैं कर लूंगी. आपसे एक दूसरा बहुत ज़रूरी काम है. आपके भतीजे की परीक्षाएं समीप हैं. और सब विषय तो मैं और आपके भइया उसे तैयार करवा देंगे, बस हिंदी, वो भी विशेषकर व्याकरण यदि आप उसे यहां रहते तैयार करवा देंगी, तो हम निश्‍चिंत हो जाएंगे.”
“हां-हां क्यों नहीं! वो भी करवा दूंगी. अभी खाना तो बनवाने दो.” पर भाभी ने एक न सुनी थी. दोनों बच्चों को कमरे में नेहा के सुपुर्द करके ही रसोई में लौटी थीं. नेहा ने भी उन्हें निराश नहीं किया था. दोनों बच्चों की ख़ूब अच्छी तैयारी करवा दी थी.

और भी प्रेरक कहना पढ़ना ना भूलें==>
बदलाव की एक प्रेरक कहानी
चालक भेड़िये और खरगोश की प्रेरक कहानी
कोयल और मोर की प्रेरणादायक कहानी
an inspirational hindi story of a girl about her mother home,inspirational story in hindi,inspirational story in hindi for students, motivational stories in hindi for employees, best inspirational story in hindi, motivational stories in hindi language
‘आज घर लौटकर बात करती हूं कैसी हुई दोनों की परीक्षाएं?’ तेज़ी से क्लास की ओर कदम बढ़ाती नेहा के दिमाग़ में विचारों का आदान-प्रदान भी तेज़ी से चल रहा था. शाम को घर लौटते हुए सास-ससुर की दवाइयां भी लेनी हैं. नेहा ने पर्स खोलकर चेक किया. ‘हूं… दोनों की दवा की पर्चियां तो सवेरे याद से रख ली थीं. तनुज तो व्यस्तता के मारे कभी पर्चियां रखना भूल जाते थे, तो कभी लाना. अब तो यह ज़िम्मेदारी उसी ने संभाल ली है, तभी तो उस दिन मायके में भी वह मम्मी-पापा के साथ जाकर उनके सारे रेग्युलर टेस्ट करवा लाई थी. साथ ही महीने भर की दवाइयां भी ले आई थी.
‘भइया तो हर बार करवाते ही हैं. मैं वहीं थी, फ्री थी, तो साथ चली गई.’
इतनी छोटी-सी मदद को भी सारे घरवालों ने सिर-आंखों पर लेेकर उसे आसमां पर बैठा दिया था. याद करते हुए नेहा की आंखें नम हो उठीं, जिन्हें चुपके से पोंछते हुए वह कक्षा में दाख़िल हो गई थी.
शाम को नेहा सास-ससुर की दवाइयां लेकर घर पहुंची, तो पाया दोनों किसी गहन चर्चा में मशगूल थे.
“रितु आ रही है, चुन्नू को लेकर. दामादजी को तो अभी छुट्टी है नहीं.”
“अरे वाह रितु आ रही है! यह तो बहुत ख़ुशी की बात है.” नेहा उत्साहित हो उठी. हम उम्र रितु उसकी ननद कम सहेली ज़्यादा थी.
“उसका जन्मदिन भी है. सोच रहे हैं सबसे बढ़िया महंगे होटल में पार्टी रखें. यहां उसके जो ससुरालवाले हैं, उन्हें बुला लेंगे. कुछ अपने इधर के हो जाएंगे. तुम और तनुज जाकर उसके लिए अच्छी महंगी साड़ी ख़रीद लाओ. दामादजी और चुन्नू के भी बढ़िया कपड़े ले आना. रितु को लेने तो आएंगे ही, तब दे देंगे. तब हमेशा की तरह ससुरालवालों के लिए साथ मिठाई, मेेवे वगैरह भी दे देंगे. सबको पता तो चले उसका मायका कितना समृद्ध है. सुनिएजी, आप तो आज ही बैंक से 20-30 हज़ार निकाल लाइए.” सास की बात समाप्त हुई, तो नेहा के सम्मुख ननद का उदास चेहरा घूम गया. पिछली बार उसने अपने दिल की बात सहेली समान भाभी के सम्मुख खोलकर रख दी थी.
“भाभी, माना मम्मी-पापा आप सब समर्थ हैं. बहुत बड़ा दिल है आप सबका, पर मुझे हर बार आकर आप लोगों का इतना ख़र्चा करवाना अच्छा नहीं लगता. एक संकोच-सा घेरे रहता है हर समय. लगता है, सब पर बोझ बन गई हूं.”
“ऐसा नहीं सोचते पगली. सब तुम्हें बहुत प्यार करते हैं.” नेहा ने उसे प्यार से समझाया था.
लेकिन आज नेहा को वह समझाइश अपर्याप्त लग रही थी. उसे मायके में बिताया अपना ख़ुशगवार समय याद आ रहा था. भइया उस दिन उसे उसकी मनपसंद ड्रेस दिलवाने बुटिक ले गए थे. वापसी में उन्होंने एक लंबा रास्ता पकड़ लिया, तो नेहा टोक बैठी थी, “इधर से क्यों?”
“इधर से तेरा स्कूल आएगा. मुझे लगा तुझे पुरानी यादें ताज़ा करना अच्छा लगेगा.”
सच में स्कूल के सामने पहुंचते ही नेहा की बांछें खिल गई थीं. “अरे यह तो काफ़ी बदल गया है… वो कृष्णा मैम जा रही दिखती हैं. ये अभी तक यहां पढ़ाती हैं?” नेहा उचक-उचककर खिड़की से देखने लगी, तो भइया ने कार रोक दी थी.
“जा मिल आ मैम से. मैं यहीं गाड़ी में बैठा कुछ फोन कॉल्स निबटा लेता हूं.”
नेहा को तो मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई थी. अचानक ही उसके पर निकल आए थे. उड़ते हुए वह अगले ही पल अपनी मैम के सम्मुख थी. वे भी उसे देखकर हैरान रह गईं. बातों का सिलसिला शुरू हुआ, तो स्कूल की घंटी बजने के साथ ही थमा. नेहा ने स्कूल के बाहर खड़े अपने चिर-परिचित दीनू काका से भी दुआ-सलाम करके दो कुल्फियां लीं और भइया की ओर बढ़ आई थी. “देखो न भइया, दीनू काका कुल्फी के पैसे नहीं ले रहे.”
“चिंता न कर, मैं फिर कभी दे दूंगा.”
यही नहीं, लौटते में भइया ने उसे उसकी सहेली के घर ड्रॉप कर दिया था. “फोन कर देना, लेने आ जाऊंगा.”
दो घंटे बाद नेहा घर लौटी थी, तो उसका हंसता-खिलखिलाता चेहरा बता रहा था कि वह अपना बचपन फिर से जी आई है. और यहां नादान साथी अध्यापिकाएं पूछ रही हैं ‘मायके से लौटी है, क्या लाई दिखा?’
अब भाई-भाभी के स्नेह को कोई कैसे दिखा सकता है? मम्मी-पापा के लाड़ को कोई कैसे तौल सकता है? दिनभर बुआ… बुआ करनेवाले बच्चों का प्यार कैसे मापा जा सकता है? प्यार को यदि पैसे से तौलेंगे, तो उसका रंग हल्का नहीं पड़ जाएगा? ज़िंदगी के बैंक में जब प्यार का बैलेंस कम हो जाता है, तो हंसी-ख़ुशी के चेक भी बाउंस होने लगते हैं. हर बेटी की तरह उसकी तो एक ही दुआ है कि स्नेहिल धागों की यह चादर उसके सिर पर हमेशा बनी रहे. यहां आकर वह फिर से अपना बचपन जीए, भूल जाए लंबी ज़िंदगी की थकान और फिर से तरोताज़ा होकर लौटे अपने आशियाने में.प्यारी ननदरानी रितु का जन्मदिन वह अनूठे स्नेहिल अंदाज़ में मनाएगी. सोचते हुए नेहा के चेहरे पर भेद भरी मुस्कान पसर गई थी. मम्मीजी, पापाजी और तनुज से पूछ-पूछकर वह चुपके-चुपके रितु की सहेलियों की सूची तैयार करने लगी. उसे खाने में जो-जो पसंद है, वह मम्मीजी के साथ मिलकर तैयार करेगी. यशी ने उस ख़ास दिन घर को सजाने की ज़िम्मेदारी ख़ुशी-ख़ुशी ओढ़ ली थी. चुन्नू को बहलाने के लिए वह सहेली का डॉगी भी लाने वाली थी.
‘अपनेपन की यह भीनी-भीनी ख़ुशबू रितु को हर अपराधबोध से उबार स्नेहरस में सरोबार कर बार-बार मायके का रुख करने पर मजबूर कर देगी.’ सोचते हुए नेहा सूची को कार्यरूप देने में जुट गई.

मैं आशा करता हूँ की आपको ये story आपको अच्छी लगी होगी। कृपया इसे अपने दोस्तों और रिश्तेदारों के साथ फेसबुक और व्हाट्स ऍप पर ज्यादा से ज्यादा शेयर करें। धन्यवाद्। ऐसी ही और कहानियों के लिए देसिकहानियाँ वेबसाइट पर घंटी का चिन्ह दबा कर सब्सक्राइब करें।

Tags-an inspirational hindi story of a girl about her mother home,inspirational story in hindi,inspirational story in hindi for students, motivational stories in hindi for employees, best inspirational story in hindi, motivational stories in hindi language

80%
Awesome
  • Design
loading...
You might also like