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हाट बाजार-an inspirational story from India Bangladesh border area

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भारत बंगलादेश की सीमा. घने जंगल, ऊंचे ऊंचे वृक्ष, कंटीली झाडि़यां, किनारा तोड़ कर नदियों में समाने को आतुर पोखर और ऊंची नीची पथरीली, गीली धरती. इसी सीमा पर विपरीत परिस्थितियों में अपनीअपनी सीमाओं की रक्षा करते हुए बीएसएफ और बंगलादेश राइफल्स के जवान. सीमा पर बसे लोगों की शक्लसूरत, कदकाठी, रूपरंग और खानपान एक ही था और दोनों तरफ के रहने वालों के एकदूसरे की तरफ दोस्त थे, रिश्तेदार थे और आपसी मेलजोल था.
दोनों ही तरफ के बाशिंदों की एक पैंडिंग मांग थी कि सीमा पर एक हाट हो जहां दोनों ही ओर के छोटेबड़े व्यापारी अपनेअपने माल की खरीदफरोख्त कर सकें. उन का दावा था कि ऐसा हाट बनाने से गैरकानूनी ढंग से चल रही कार्यवाहियां रुक जाएंगी और किसान एवं खरीदारों को सामान की असली कीमत मिलेगी. राजनैतिक स्तर पर वार्त्ताओं के लंबेलंबे कई दौर चले. कई बार लगा कि ऐसा कोई हाट नहीं बन पाएगा और योजना सिर्फ कागजों तक ही सीमित हो कर रह जाएगी. लेकिन अंतत: दोनों सरकारों को जनता की मांग के सामने झुकना ही पड़ा और दोनों सीमाओं के बीच वाले इलाके पर हाट के लिए जगह का चुनाव कर दिया गया. तय यह भी हुआ कि उस जगह पर एक पक्का बाजार बनेगा जहां सीमा के दोनों तरफ के लोग एक छोटी सी प्रक्रिया के बाद आराम से आ जा सकेंगे और जब तक पक्का हाट नहीं बनता तब तक वहीं एक कच्चा बाजार चलता रहेगा.
टैंडर की औपचारिकता के बाद कोलकाता की एक कंपनी ‘शाहिद ऐंड कंपनी’ को काम का ठेका सौंप दिया गया और कंपनी का मालिक शाहिद अपने साथी मिहिर के साथ भारतबंगलादेश सीमा पर तुरुगांव तक पहुंच गया, जहां से बीएसएफ के जवानों की एक टुकड़ी उन्हें वहां ले गई जहां हाटबाजार का निर्माण करना था. जगह देख कर शाहिद और मिहिर दोनों ही चक्कर खा गए.
‘‘क्या बात है बड़े मियां, किस सोच में पड़ गए?’’ शाहिद को यों हैरान देख कर टुकड़ी के कमांडर ने पूछा और फिर उस के मन की बात जान कर खुद ही बोल पड़ा, ‘‘काम मुश्किल जरूर है मगर नामुमकिन नहीं. बस आप को इस उफनती जिंजीराम नदी का ध्यान रखना है और जंगली जानवरों से खुद को बचाना है, जो यदाकदा आप के सामने बिन बुलाए मेहमानों की तरह टपक पड़ेंगे.’’
‘‘मेहमान वे नहीं हम हैं कप्तान साहब. हम उन के इलाके में बिना उन की इजाजत के अपनेआप को उन पर थोप रहे हैं. खैर, वर्क और्डर के मुताबिक यहां 50 दुकानें, एक मीटिंग हौल, एक छोटा सा बैंक काउंटर और एक दफ्तर बनना है,’’ शाहिद ने नक्शे पर नजर गड़ाते हुए कहा.
‘‘बिलकुल ठीक कहा आप ने इंजीनियर साहब. मगर काम शुरू करने से पहले एक जरूरी बात आप को बता दूं,’’ कप्तान मंजीत ने बड़ी संजीदगी से कहा, ‘‘इस इलाके को जहां हम सब खड़े हैं, ‘नो मैन लैंड’ कहते हैं यानी न भारत न बंगलादेश. काफी संवेदनशील जगह है यह. बंगलादेशियों की लाख कोशिशों के बावजूद हम ने यहां उन के गांव बसने नहीं दिए. इसे वैसे ही रखा जैसे अंतर्राष्ट्रीय कानून में उल्लेखित है. इसलिए यहां आप और आप के मजदूर सिर्फ अपने काम से काम रखेंगे और भूल कर भी आगे जाने की कोशिश नहीं करेंगे. बंगलादेशी यों तो हमारे दोस्त हैं, लेकिन कभीकभी दुश्मनों जैसी हरकतें करने से गुरेज नहीं करते हैं. शक ने अभी भी उन के दिमाग से अपना रिश्ता नहीं तोड़ा है. तभी तो इस काम के लिए फौज का महकमा होते हुए भी समझौते के तहत हमें आप जैसे सिविलियंस की सेवाएं लेनी पड़ीं.’’
शाहिद ने अगले दिन से ही अपना काम शुरू कर दिया. लेकिन सप्ताह में 2 दिन काम की गति तब कम हो जाती जब वहां कच्ची दुकानों में दुकानदारों और ग्राहकों का हुजूम इकट्ठा हो जाता. भारतीय दुकानदार जहां कपड़े, मिठाइयां और बांस के बने खिलौने वगैरह बेचते, वहीं बंगलादेशी व्यापारी मछली और अंडे इत्यादि अधिक से अधिक मात्रा मेें ला कर बेचते. लेनदेन दोनों तरफ की करैंसी में होता.
शाहिद ने वहीं पास के गांव में एक छोटा सा घर ले लिया और अपने अच्छे व्यवहार से धीरेधीरे लोगों का दिल जीत लिया. घर के कामकाज के लिए उस ने एक बुजुर्ग महिला मानसी की सेवाएं ली थीं. मानसी दाईमां का काम करती थी. मगर उम्र के तकाजे की वजह से उस ने वह काम बंद कर दिया था. मानसी को शाहिद प्यार से मानसी मां कहता.
एक दिन बरसात ने पूरे इलाके को अपनी आगोश में जकड़ लिया. उस वक्त नदी पूरे उफान पर थी और उस का पानी लकड़ी के बने पुल तक पहुंच रहा था. बंगलादेशी व्यापारियों में चिंता बढ़ती जा रही थी. शाहिद की नजरें बेबस लोगों को देख रही थीं कि अचानक उस की नजरें ठिठक गईं. एक लड़की अपने सामान और पैसों को बरसात के पानी और तेज हवा से बचाने का असफल प्रयास कर रही थी. देखते ही देखते हवा का एक तेज झोंका आया, तो लड़की का संतुलन बिगड़ा और उस के हाथ का थैला और सामान की गठरी छिटक के दूर जा गिरी. शाहिद को न जाने क्या सूझा. उस ने पल भर में उफनते पानी में छलांग लगा दी और इत्तफाक से बिना ज्यादा मशक्कत के दोनों ही चीजें हासिल करने में सफल हो गया.
‘‘ये लीजिए अपना सामान,’’ शाहिद ने सामान लड़की को थमाते हुए कहा.
‘‘जी धन्यवाद,’’ लड़की ने कृतज्ञता प्रकट करते हुए कहा. कुछ देर के इंतजार के बाद बरसात का प्रकोप कम हुआ, तो एकएक कर के सभी बंगलादेशी शुक्र मनाते हुए अपनी सीमा की ओर बढ़ने लगे. लड़की जातेजाते कनखियों से शाहिद को देखती जा रही थी. धीरेधीरे लड़की की नाव शाहिद की आंखों से ओझल होने लगी, लेकिन शाहिद एकटक जाती हुई नौका को तब तक निहारता रहा जब तक मिहिर की कर्कश आवाज ने उस की तंद्रा भंग नहीं कर दी.
उस दिन के बाद हर मंगलवार और शुक्रवार को शाहिद अपना सारा कामकाज छोड़ कर हाट में उस लड़की को ढूंढ़ता रहता. एक दिन वह अपना सामान बेचती हुई दिखी तो तुरंत उस के पास पहुंचा. उस ने नजरें उठा कर देखा तो वह तुरंत उस से बोला, ‘‘आज आप सिंदूर नहीं लाईं. मेरी मानसी मां ने मंगवाया था,’’ ऐसा उस ने बातचीत का सिलसिला शुरू करने के उद्देश्य से कहा था.
‘‘हां, लीजिए न,’’ लड़की ने शर्माते हुए कहा.
‘‘ये लीजिए क्व100. कम हों तो बता दीजिए.’’
‘‘मैं आप से पैसे कैसे ले सकती हूं. आप ने उस दिन मेरी कितनी मदद की थी.’’
‘‘अच्छा तो एक शर्त है. मैं खाने का डब्बा लाया हूं. मेरी मानसी मां ने बड़े प्यार से बनाया है. आप को भी थोड़ा खाना होगा.’’
‘‘खाना तो हम भी घर से लाए हैं,’’ लड़की ने हौले से कहा.
‘‘ठीक है. फिर हमारी मां का बनाया खाना आप खाइए और आप का लाया खाना मैं खाऊंगा,’’ शाहिद ने प्रसन्न होते हुए कहा.
‘‘ये क्या कर रही हो रुखसार?’’ एक भारीभरकम आवाज ने दोनों को खाना खाते देख कर टोका, ‘‘किस के साथ मिलजुल रही हो? जानती नहीं यह उस तरफ का है. जल्दी से खाना खत्म कर बाकी बचा माल बेचो. मुझ से इतना माल ढोने की उम्मीद मत करना.’’
‘‘माल तो तुम्हें ही ढोना पड़ेगा जमाल भाईजान. अब मैं तो उठाने से रही.’’
शाम को हूटर बजते ही सभी व्यापारी अपनाअपना माल समेटने लगे और देखते ही देखते सब की गठरियां तैयार हो गईं. रुखसार ने बड़े सलीके से गठरियां बांधीं और अपने भाई की राह देखने लगी. थोड़ी देर में एकएक कर के सभी जाने लगे. लेकिन जमाल का कहीं पता न था. तभी दूर खड़ा शाहिद रुखसार की परेशानी भांपते हुए करीब आया और बोला, ‘‘अगर जमाल नहीं आया तो कोई बात नहीं आप का सामान नाव में मैं रखवा देता हूं, आप परेशान न हों.’’
रुखसार ने सामान पर एक नजर डाली और बोली, ‘‘परेशानी इधर की नहीं इंजीनियर बाबू उधर की है. हमारा घर जिंजीराम नदी के किनारे से 2-3 मील के फासले पर है. कोई कुली या ठेले वाला वहां नहीं मिलता, जो हमारी मदद करे.’’
‘‘एक उपाय है रुखसारजी, आप को अगर हम पर विश्वास हो तो यह सामान आप हमारे क्वार्टर में रखवा दें. शुक्रवार को आइएगा तो ले लीजिएगा.’’
उस रोज के बाद सामान रखने का जो सिलसिला शुरू हुआ, उस के साथ ही शुरुआत हुई उस रिश्ते की जिस ने न सीमा देखी न राष्ट्रीयता. रुखसार और शाहिद एक ऐसी दुनिया में प्रवेश कर चुके थे, जिस में दूर तक सिर्फ अंधेरा ही नजर आता था. शाहिद का बदला रूप और रंगढंग गांव वालों से छिप न सका. मानसी मां ने तो बस एक ही जिद कर रखी थी कि किसी भी तरीके से शाहिद रुखसार को घर ले आए. शाहिद कई दिन तक टालमटोल करता रहा और एक दिन रुखसार से मानसी मां की इच्छा कह दी.
संतरियों से बच कर और सब की आंखों में धूल झोंक कर शाहिद एक दिन रुखसार को घर ले आया. मानसी से मिलवाने के बाद शाहिद रुखसार को वापस ले कर जा ही रहा था कि मिहिर ने आ कर यह खबर दी कि बंगलादेशी गार्ड्स की एक टुकड़ी किसी खास मकसद से कोनेकोने में फैल गई है और बीएसएफ के सिपाहियों के साथ मिल कर किसी आतंकवादी दल की तलाश में जुट गई है. शाहिद असमंजस में पड़ गया. सब ने राय दी कि ऐसे बिगड़े माहौल में रुखसार को ले जाना खतरे से खाली न होगा. अंधेरा बढ़ता जा रहा था और सन्नाटा सारे इलाके में पसर गया था. रुखसार का दिल घबराहट के मारे बैठा जा रहा था, लेकिन उसे अपने प्यार पर पूरा विश्वास था. शाहिद का साथ पाने के लिए वह किसी भी मुसीबत का सामना करने के लिए तैयार थी. बीचबीच में सिपाहियों के बूट की आवाज सन्नाटे को चीर कर गांव वालों के कानों को भेद रही थी. ऐसा लग रहा था कि हर घर की तलाशी ली जा रही हो.
‘‘रुखसार आप के घर में रह सकती है, मगर तभी जब उस का निकाह आप के साथ अभी हो जाए,’’ सभी गांव वालों की यह राय थी. शाहिद के समझानेबुझाने का किसी पर कोई असर नहीं हो रहा था. न ही कोई रुखसार को अपने घर में रखने को तैयार था. मानसी का घर भी 2 गांव छोड़ कर था. लिहाजा वहां भी पहुंचना उन परिस्थितियों में नामुमकिन था. शाहिद बिना समय गंवाए किसी फैसले तक पहुंचना चाहता था. उस ने एक नजर रुखसार पर डाली, जो बुत बनी खड़ी थी. उसे भरोसा था कि शाहिद जो भी करेगा ठीक ही करेगा. अंतत: वही हुआ जो सब ने एक सुर में कहा था, काजी ने दोनों का निकाह करवाया. इस शादी में न बरात थी, न घोड़ी, न बैंड न बाजा बस दिलों का मिलन था.
मानसी ने दिल से कई तरह के पकवान बनाए, जो गांव वालों ने मिलजुल कर मगर छिप कर ऐसे खाए मानो अंधरे में अपराध की किसी घटना को अंजाम दे रहे हों. 4 दिन बाद जब रुखसार की रुखसत का वक्त आया तो उस की आंखों से आंसू बह रहे थे. रुखसार ने रुंधे गले से कहा, ‘‘तुम कहीं मुझे बीच राह में छोड़ तो नहीं दोगे? मैं अनाथ हूं. आगेपीछे मेरा एक चचेरा भाई जमाल है या फिर पड़ोसी. बस इतनी सी है मेरी दुनिया.’’ ‘‘कुदरत को शायद हमें मिलाना ही था और शायद उसे यही तरीका मंजूर होगा. अब तुम हाट में जा कर अपने लोगों में यों घुलमिल जाओ मानो तुम आज ही उन के साथ आई हो. किसी को पता नहीं चलना चाहिए कि तुम 4 दिन यहां रही हो,’’ शाहिद उस से बोला.
रुखसार फुरती से चल कर हाट तक पहुंच गई और अपनी झोंपड़ीनुमा दुकान पर जा कर ही दम लिया. मिहिर ने पहले ही वहां सामान रख दिया था. रुखसार ने सामान सजाना शुरू किया और स्वयं को संयत रखने का प्रयत्न कर ही रही थी कि किसी के आने की आहट ने उसे चौंका दिया. देखा तो सामने जमाल था. वह बोला, ‘‘मैं जानता हूं कि तुम 4 दिन कहां थीं. तुम भूल गई हो रुखसार कि तुम एक बंगलादेशी हो और वह एक हिंदुस्तानी. कैसे तुम उस के प्यार के चक्कर में पड़ गईं? अपनेआप को संभालो रुखसार. अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है. वापस लौट चलो.’’
‘‘मैं बहुत दूर निकल आई हूं जमाल. अब तो सिर्फ मौत ही मुझे उस से जुदा कर सकती है. सिर्फ मौत,’’ रुखसार का जवाब था.
शाहिद अपने प्रोजैक्ट की प्रगति के बारे में कप्तान मंजीत और दिल्ली से आए मंत्रालय के अफसरों से मीटिंग कर के घर लौटा तो परेशान था. मंत्रालय ने 1 साल से ज्यादा समयसीमा बढ़ाने की अर्जी नामंजूर कर दी थी. मानसी ने शाहिद को परेशान देख कर सवाल दागे तो उसे बताना ही पड़ा, ‘‘लगता है मां कि अब दिनरात काम करना पड़ेगा, रोशनी का पूरा इंतजाम होने के बाद हो सकता है मैं रात को भी वहीं रहूं.’’
‘‘क्या ऐसा नहीं हो सकता कि रुखसार भी मेरे साथ वहीं रह जाए, उसी जगह?’’
शाहिद मानसी मां की मासूमियत पर मुसकरा दिया, ‘‘कोशिश करूंगा कि रुखसार को भारत की नागरिकता जल्दी ही मिल जाए.’’ शाहिद सारी रात सो नहीं पाया. अगले दिन उसे काम के सिलसिले में पैसों व अन्य साजोसामान के इंतजाम के लिए शिलौंग, अगरतला और कोलकाता जाना था. सारे रास्ते वह रुखसार के बारे में ही सोचता रहा. उस ने कभी सोचा भी नहीं था कि जिंदगी उसे कभी ऐसे मुकाम पर भी ला कर खड़ा कर देगी.
शाहिद जब वापस लौटा तो इलाका फिर बरसात की गिरफ्त में था. जीरो लाइन की तरफ जाते हुए उसे रास्ते में कप्तान मंजीत मिल गए और बोले, ‘‘क्या बात है शाहिद, आजकल तू कम ही नजर आता है,’’ काम की वजह है या कोई और चक्कर है? ‘‘आप भी सरदारजी खिंचाई करने का कोई मौका हाथ से गंवाते नहीं हो. एक तो उबड़खाबड़ जमीन, उस पर भयानक जंगल, जंगली जानवरों का खौफ, कयामत ढाती बरसात और उड़ाने को तैयार हवाएं, ऐसे हालात में रह कर भी आप देश की रक्षा करते हो, यह काबिलेतारिफ है.’’
‘‘एक काम कर शाहिद, यहां कोई चंगी सी कुड़ी देख कर उस से ब्याह कर ले. खबर है कि ऐसे और भी कई छोटेबड़े हाटबाजार खुलने वाले हैं. फिर तो बड़े आराम से जिंदगी गुजरेगी यहां.’’ शाहिद कप्तान की बात पर झेंप गया.
‘‘हां, शाहिद एक बात और. खबर है कि इस बौर्डर के रास्ते पाकिस्तानी आईएसआई भारत में आतंकवादी गतिविधियां करने की फिराक में है, इसलिए सावधान रहना. और कोई ऐसीवैसी बात नजर आए तो फौरन खबर देना,’’ मंजीत ने जाते जाते कहा.
शाहिद जब हाट पहुंचा तो उस ने रुखसार को बेकरारी से इंतजार करते हुए पाया. चाह कर भी वे दोनों वहां मिल नहीं पाए. दफ्तर में जब मिले तो रुखसार को एहसास हो गया कि शाहिद की तबीयत बहुत खराब है. बड़ी मुश्किल से दोनों शाहिद के छोटे से घर में पहुंचे और वहां रुखसार ने उसे जबरदस्ती दवा खिला कर सुला दिया. शाहिद की जब आंख खुली तो बहुत देर हो चुकी थी. आखिरी नाव भी जा चुकी थी और दोनों ही तरफ के लोग अपनीअपनी सीमाओं की तरफ जा चुके थे. अंधेरे और सन्नाटे ने पूरा इलाका घेर लिया था. मिहिर को आता देख रुखसार की जान में जान आई. रुखसार ने जमाल से हुई सारी बात मिहिर को बताई. रुखसार की घबराहट भांप कर मिहिर भी सोच में पड़ गया. उस पर दोनों तरफ ही गार्ड किसी वजह से ज्यादा ही सख्ती दिखा रहे थे. ऐसे में रुखसार का वहां से निकलना बहुत मुश्किल था. लिहाजा वहां रहने के अलावा रुखसार के पास कोई चारा नहीं था.
रुखसार रात को वहीं रुक गई और हाटबाजार के अगले पड़ाव तक वहीं रही. 4 दिन बाद जब बाजार में गई तो जमाल गुस्से से लालपीला हो रहा था, ‘‘तुम आखिर चाहती क्या हो? क्यों अपने साथ मेरी जिंदगी भी खतरे में डाल रही हो. अगर इश्क किया है तो या तुम भारत जाओ या उसे बंगलादेश ले जाओ. यों चूहेबिल्ली का खेल बंद करो.’’ ‘‘जमाल तुम जानते हो कि यह मुमकिन नहीं है. शाहिद कोशिश कर रहा है, लेकिन इस में समय कितना लगेगा यह हमें भी नहीं पता. पता नहीं ऐसा हो भी पाएगा या नहीं.’’
‘‘तो तब तक तुम…’’ जमाल कुछ सोचने लगा. फिर बोला, ‘‘मेरी राय है कि यहीं रहो. जब तक तुम्हें भारत की नागरिकता नहीं मिल जाती यहां तुम पूरी तरह से महफूज हो. बस तुम्हें इन चारदीवारी में रहना होगा. मैं सब से कह दूंगा कि तुम चटगांव में किसी कारखाने में काम कर रही हो.’’
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‘‘लेकिन…’’ रुखसार कुछ कहना चाह रही थी मगर जमाल ने उसे इशारे से रोक दिया और कहा, ‘‘देखो रुखसार, यह थोड़े दिनों की ही परेशानी है. कप्तान साहब और अन्य गांव वालों की मदद से तुम्हें जल्दी ही भारत की नागरिकता मिल जाएगी. फिर सब ठीक हो जाएगा.’’
समय अपनी गति से बढ़ता गया और हाटबाजार का काम भी अपनी गति से बढ़ता गया. सरकार काम में हो रही प्रगति से संतुष्ट थी और इंसपैक्शन के दौरान सरकार ने काम में आ रही बाधाओं के मद्देनजर 6 महीने की अवधि और बढ़ा दी. उधर रुखसार को मानो एकाकी जीवन जीने की आदत सी पड़ गई थी. कभीकभी जमाल स्टोर में सामान लेने व रखने आता, तो वह उत्कंठा से गांव का हालचाल पूछती. इस के अलावा तो वह बिलकुल तनहा थी. शाहिद के आने से उस के होंठों पर मुसकान फैल जाती. शाहिद रुखसार को देखता तो उसे बहुत दुख होता. कई बार उसे आत्मग्लानि भी होती. उसे लगता कि जो कुछ भी हुआ सब का कुसूरवार वही है. एक दिन उस के चेहरे के भाव देख कर रुखसार ने उस से कहा, ‘‘तुम खुद को दोषी क्यों मानते हो? यही हमारा जीवन है, यही हमारी नियति है.’’
‘‘लेकिन सारा दिन तुम अकेली वक्त गुजारती हो. यह जिंदगी मैं ने दी है तुम्हें. मैं बता नहीं सकता कि मुझे कैसा लगता है. मैं कभी भी खुद को माफ नहीं कर पाऊंगा.’’
‘‘तुम खुद को बिलकुल कुसूरवार मत समझो. यह फैसला सिर्फ तुम्हारा ही नहीं था. मैं भी इस में बराबर की हिस्सेदार थी. और मैं अकेली कहां हूं? दिन भर मूर्तियां बनाती हूं, उन्हें सजाती हूं, संवारती हूं, जिस से मानसी मां को 4 पैसे मिल जाते हैं.’’ फिर कुछ सोच कर धीरे से बोली, ‘‘क्या हुआ मेरी भारत की नागरिकता का?’’
‘‘मैं कोशिश कर रहा हूं, लेकिन सरकारें अभी बहुत सख्त हो गई हैं. थोड़ा इंतजार करना पड़ सकता है.’’
‘‘मैं तो इंतजार कर सकती हूं, शायद तुम भी कर सकते हो मगर वह जो आने वाला मेहमान है उस के बारे में सोचती हूं तो रूह कांप जाती है कि क्या होगा उस का?’’
एक रात सायंसायं करती हवा और हिंसक पशुओं की तरह झूमते पेड़ों की कर्कश आवाज से रुखसार की घबराहट से आंख खुली. शाहिद अभी नहीं आया था, लेकिन एक साया स्टोर की तरफ जा रहा था. रुखसार का दिल बैठ गया. चीख मानो हलक में ही अटक गई. धीरेधीरे साया कुछ साफ हुआ…वह जमाल था.
‘‘तुम…तुम इस वक्त यहां क्या कर रहे हो?’’ रुखसार की आवाज में तल्खी थी.
‘‘कुछ नहीं… तुम सो जाओ, मैं कुछ सामान रख कर चला जाऊंगा.’’
‘‘मगर आज तो कोई हाट नहीं था. क्या सामान रखने आए हो तुम?’’ रुखसार की आवाज और सख्त हो गई थी.
जमाल ने भी लगभग उसी अंदाज में जवाब दिया, ‘‘तुम चुपचाप यहां अपने दिन गुजारो. समझ लो यह मेरी खामोशी की कीमत है. मैं जब चाहूं बिना रोकटोक के यहां आ जा सकता हूं. अगर तुम ने कोई चालाकी दिखाने की कोशिश की तो, भयानक अंजाम के लिए तैयार रहना.’’
रुखसार को काटो तो खून नहीं, ‘‘जमाल, तो इसलिए तुम ने मुझे यहां रहने के लिए उकसाया था और मैं अनाड़ी नादान अब तक यह समझ रही थी कि मेरा भाई अपना प्यार मुझ पर उड़ेल रहा है. तुम ने मेरी हालत का, मेरे भरोसे का गलत फायदा उठाने की कोशिश की है. लेकिन मैं तुम्हारे मंसूबे कामयाब नहीं होने दूंगी. मेरे लिए दोनों मुल्क मेरे अपने हैं. तुम जानते हो मैं अगर कोई फैसला करती हूं तो अंजाम का सामना करने को तैयार रहती हूं.’’
‘‘तुम तो नाहक ही परेशान हो रही हो,’’ जमाल ने पैतरा बदला.
‘‘मैं कल सुबह सारा सामान यहां से ले जाऊंगा. तुम बेफिक्र हो कर सो जाओ.’’
‘‘इसी में तुम्हारी भलाई है और मेरी भी,’’ रुखसार ने धीरे से कहा.
रुखसार की आंखों में नींद का नाम न था. आने वाली विपत्तियों के बारे में सोचसोच कर वह परेशान हो रही थी. किसी अनिष्ट की आशंका से भयभीत रुखसार को थोड़ा चैन तब मिला जब उस ने शाहिद को आते देखा. आते ही वह बोला, ‘‘मानसी मां यहां आने की जिद पकड़े बैठी हैं और अगर वे यहां आती हैं तो खतरा और बढ़ जाएगा. बीएसएफ वाले तो शायद फिर भी मान जाएं मगर बंगलादेशी गार्ड्स मौके को हाथ से जाने नहीं देंगे. मगर और कोई उपाय भी नहीं नजर आ रहा. ऐसी परिस्थिति में अगर सरेंडर भी करते हैं, तो भी समस्या का कोई हल नहीं निकलेगा, बल्कि जेल की सलाखों के पीछे एक गुमनाम मौत मरना होगा.’’
इसी उधेड़बुन में रात बीत गई और इसी तरह कई दिन और कई रातें बीत गईं. कुदरत मेहरबान थी कि मानसी की उपस्थिति का अभी तक किसी को आभास नहीं हुआ. काम की गहमागहमी में सब कुछ छिपा रह गया. कहते हैं, जब हालात विपरीत हों तो कुरदत को भी हालात के शिकार लोगों पर तरस आ ही जाता है. बच्चे का जन्म समय से पहले हो गया था. इस के बावजूद बच्चा स्वस्थ और सुंदर हुआ था. मानसी ने सारा इंतजाम और व्यवस्थाएं धीरेधीरे कर ली थीं ताकि ऐन मौके पर किसी चीज के लिए परेशानी न हो और मन ही मन दुआ कर रही थी की कुदरत का रहम बना रहे और सब कुछ ठीकठाक हो जाए.
दिन भर तो काम के शोर में बच्चे के रोने की आवाज दब जाती मगर रात के सन्नाटे में यह काम मुश्किल हो जाता. शाहिद और रुखसार ने यह फैसला किया की किसी भी तरीके से गैरकानूनी ढंग से ही सही शिलौंग या अगरतला से होती हुई दिल्ली की तरफ चली जाएगी और अवैध रूप से रह रहे बंगलादेशियों की भीड़ का एक हिस्सा बन जाएगी. लेकिन तभी वह हुआ जिस का रुखसार को डर था. जमाल ने धीरेधीरे अपनी गतिविधियां और भी तेज कर ली थीं और रुखसार को समझ में आ रहा था कि जमाल किसी बड़े गैरकानूनी गिरोह के लिए काम कर रहा है.
‘‘क्या है इस गट्ठर में?’’ रुखसार ने एक दिन सामान उतरवाते हुए जमाल से सख्ती से पूछा, तो जमाल की त्योरियां चढ़ गईं.
‘‘सूखी मछलियां हैं. तुम तो शाकाहारी हो. नहीं तो तुम्हारे लिए 5-10 छोड़ देता.’’
‘‘मैं खाती नहीं पर इतना तो जानती हूं की सूखी मछलियां इतनी भारी नहीं होतीं कि उन का गट्ठर आदमियों से भी मुश्किल से उठे.’’
‘‘हां इस में कुछ और भी है. लेकिन जो भी है वह भारत को अंदर तक खोखला कर देगा और इसलाम को मजबूत.’’
‘‘चुप रहो,’’ रुखसार गरजी, ‘‘इसलाम इतना कमजोर नहीं कि वह पाकिस्तान का बाजू थामे. पाकिस्तान एक कुंठित मुल्क है. भारत से मिल रही लगातार हार से परेशान हो कर वह यह सब कर रहा है. मगर तुम तो एक बंगलादेशी हो. भूल गए कि भारत के हम पर कितने एहसान हैं. पाकिस्तान के दबाव में आ कर एहसान फरामोश बंगलादेशियों की भीड़ में अपनेआप को शामिल मत करो मेरे भाई. आज अगर हम जिंदा हैं तो इन्हीं हिंदुस्तानियों की बदौलत वरना पाकिस्तान ने तो हमें गुमनामी के गर्त में धकेलने में कोई कमी नहीं रखी थी.’’
जमाल ने रुखसार की पूरी बात नहीं सुनी. वह अंधेरे की आड़ में गायब हो गया. शाहिद लौटा तो रुखसार ने उसे सारी बात विस्तार से बता दी.
‘‘मैं जमाल का नापाक इरादा पूरा नहीं होने दूंगा. अपने सुखचैन के लिए मैं अपने मुल्क से गद्दारी नहीं करूंगा. मैं कप्तान मंजीत को सब कुछ सचसच बता दूंगा. भले ही इस का अंजाम कुछ भी क्यों न हो,’’ शाहिद ने मानो पक्का फैसला कर लिया और जीरो लाइन के करीब पोस्ट की तरफ चल पड़ा.
‘‘साहब तो कहीं फौरवर्ड एरिया में गए हैं,’’ संतरी ने बताया.
‘‘अच्छा कप्तान साहब आएं तो कहना मैं आया था. कोई जरूरी काम है. मैं सुबह फिर आऊंगा.’’
पौ फटते ही शाहिद फिर मंजीत से मिलने के लिए निकला, तो सामने से आती बीएसएफ और बंगलादेशी गार्ड्स की संयुक्त टुकड़ी को अपनी ओर आते हुए देख कर ठिठक गया. अनिष्ट की आशंका को इनसान की परेशानी पर पसीने के रूप में आने से ठंडी और बर्फीली हवा भी नहीं रोक सकती. शाहिद चाह कर भी पसीना पोंछ नहीं पाया.
‘‘हमें तुम्हारे स्टोर की तलाशी लेनी है. इन्हें शक है कि इस जगह का इस्तेमाल आईएसआई के एजेंट अपने उन हथियारों को रखने के लिए करते हैं, जो भारत में गड़बड़ी के इरादे से भेजे जाते हैं,’’ मंजीत ने बंगलादेशी कप्तान की ओर इशारा करते हुए कहा.
शाहिद को काटो तो खून नहीं, ‘‘यह एक लंबी कहानी है कप्तान साहब. मैं कल रात को सब सच बयां करने के लिए आप की पोस्ट पर गया था. मगर आप वहां नहीं थे. यह सारा सामान रुखसार के भाई जमाल का है.’’
‘‘रुखसार कौन, वही बंगलादेशी लड़की न, जिसे आप ने डूबने से बचाया था? उस का आप से क्या रिश्ता है?’’ मंजीत ने सवाल दागा.
‘‘मैं बताती हूं,’’ रुखसार ने बाहर निकल कर आत्मविश्वास के साथ कहना शुरू किया, ‘‘यह अमन है मेरा बच्चा. यह यहीं इसी बियाबान जंगल में पैदा हुआ है. मैं शाहिद की ब्याहता हूं, हमारा बाकायदा निकाह हुआ है.’’
कप्तान मंजीत और बंगलादेशी गार्ड दोनों हतप्रभ हो कर एकदूसरे का मुंह देखने लगे.
‘‘क्या तुम दोनों नहीं जानते कि तुम मुख्तलिफ मुल्कों के बाशिंदे हो और जो तुम ने किया वह गैरकानूनी है,’’ मंजीत बोले.
‘‘शादी के अलावा हम ने कोई भी काम गैरकानूनी नहीं किया है,’’ शाहिद ने आहिस्ता से कहा, ‘‘हम ने सिर्फ प्यार किया है. इस के अलावा कोई गुनाह नहीं किया है. न हम ने कोई कानून तोड़ा है, न कोई गद्दारी की है.’’
‘‘इस का फैसला कानून करेगा,’’ मंजीत ने कहा फिर शाहिद को अपनी जीप में बैठा लिया. बंगलादेशी गार्ड ने बच्चा रुखसार की गोद से छीन लिया और उस को जीप में धकेल दिया. जीप जब चलने को हुई तो रुखसार चीख उठी, ‘‘मेरा बच्चा…’’
रुखसार की चीख का बंगला गार्ड पर कोई असर नहीं हुआ. वह बोला, ‘‘तुम्हारा बच्चा न इंडियन है न बंगलादेशी, इसलिए वह कहीं और रहेगा. और तुम बंगलादेश की जेल में सड़ोगी और तुम्हारा खाविंद हिंदुस्तानी जेल में हवा खाएगा.’’
‘‘यह अन्याय है, एक मासूम पर जुल्म है. हमारे जुर्म की सजा इसे क्यों दी जा रही है? यह कहां रहेगा किस के पास रहेगा? अगर बच्चा दोनों मुल्कों के बीच की धरती में पैदा हुआ है तो क्या वह इनसान नहीं है?’’ रुखसार चीखती जा रही थी और जीप उसी रफ्तार से बढ़ती जा रही थी.
कप्तान मंजीत ने शाहिद के कंधे पर हाथ रखा और कहा, ‘‘तुम बेफिक्र रहो. मैं तुरंत रैडक्रौस को वायरलैस भिजवा कर उन की नर्स को बुलवाता हूं और बाकी इंतजाम करवाता हूं.’’
शाहिद को भारतीय जेल में डाल दिया गया और रुखसार बंगलादेश की जेल की सलाखों के पीछे पहुंचा दी गई. ‘नो मैन लैंड’ में जन्मा मासूम अमन रैडक्रौस के हवाले कर दिया गया और मीडिया के कैमरों की मेहरबानी से दोनों ओर की सीमा पर अमन को दूर से देखने वालों का तांता लग गया. वह समाचार, नेताओं और एनजीओ के सदस्यों के लिए चाय के प्याले पर चलने वाली बहस का एक मुद्दा भी बन गया. टीआरपी बढ़ाने के लिए इस विषय पर टीवी चैनलों में होड़ सी लग गई और अमन को इंसाफ दिलाने की मुहिम हर शहर, हर गांव तक पहुंच गई.
यह बात कि अमन नाम का एक बच्चा दोनों सरहदों के बीच जन्म लेने के जुर्म की सजा पा रहा है और दोनों देशों के बीच अपनी पहचान ढूंढ़ रहा है, दोनों देशों की सरकारों के कानों तक भी पहुंच चुकी थी. नन्हा अमन रैडक्रौस की नर्सों से इठलाते हुए कभी भारत की सीमा की ओर मुंह कर लेता, तो कभी बंगलादेश की सरहद की तरफ इशारा कर देता मानो अपने वजूद की तलाश कर रहा हो या याचना कर रहा हो कि मेरा कुसूर क्या है? जमाल में शायद कुछ इंसानियत जिंदा रह गई थी. उस ने ऐसा बयान दिया कि रुखसार पर कोई आंच नहीं आई. उधर कप्तान मंजीत और गांव वालों ने शाहिद को बचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी. सजा के तौर पर शाहिद का ठेका रद्द कर दिया गया और हाटबाजार का काम रोक दिया गया.
धीरेधीरे बेबस शाहिद, रुखसार और अमन का मामला अंतर्राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया और कोलकाता एवं ढाका दोनों के न्यायालयों में याचिकाएं दायर हो गईं. दोनों ही देशों के मानवाधिकार आयोग भी सक्रिय हो गए. दोनों ही न्यायालयों ने सख्त रवैया अपनाते हुए लगभग एकजैसा फैसला सुनाया कि अमन के बालिग होने तक उसे रैडक्रौस के संरक्षण में रखा जाए. उस के बाद ही मामला फिर सुना जाए. शाहिद और रुखसार टूट गए. लगा वक्त ठहर गया है और इस गहरी भयानक काली रात का कोई अंत नहीं है. लेकिन तभी आशा की एक किरण से ऐसा प्रकाश फूटा जिस ने तीनों की जिंदगी को पूर्णतया रोशन कर दिया. हताशा और बेबसी की लहरों के बीच कुदरत ने अपना करतब दिखाया और उफनती लहरों के शांत होने की उम्मीद जाग उठी.
भारत और बंगलादेश की सीमा पर कुछ गांवों की अदलाबदली का मामला दसियों सालों से निलंबित था. सरकारें बदलती गईं मगर इस प्रक्रिया की कोई शुरुआत नहीं हो पाई. नियति ने मानो इस मामले को शाहिद, रुखसार और अमन के लिए ही बचा कर रखा हुआ था. दोनों सरकारों ने नई अंतर्राष्ट्रीय सीमा रेखाएं तय कीं और अदलाबदली किए जाने वाले इलाकों को चिहिन्त किया. इसी समझौते के अंतर्गत जिंजराम नदी के मुहाने के कई बंगलादेशी गांव भारत में शामिल हो गए और वहां के नागरिकों को यह अख्तियार और विकल्प दिया गया कि वे भारत अथवा बंगलादेश की नागरिकता का स्वेच्छा से चुनाव करें.
वह दिन किसी मेले से कम नहीं था. रैडक्रौस ने भारतीय और बंगलादेशी अधिकारियों की उपस्थिति में अमन को रुखसार की गोद में डाल दिया. जिस की आंखों से आंसू अविरल और अनवरत बहते जा रहे थे. रुखसार और शाहिद के अलावा न सिर्फ मानसी मां, बल्कि पूरे गांव वाले भी अपने आंसू छिपा नहीं पा रहे थे और सब के हाथ स्वत: ही आशीर्वाद स्वरूप उठ गए थे. दूर कहीं से नगाड़ों के बजने की आवाज पूरे वातावरण में गूंज रही थी. देशों की राजनीति से बिछड़ा प्यार फिर मिल रहा था.

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