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भिखारी-an inspirational story from the life of a beggar

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भिखारी – मोपांसा -पंद्रह साल की उम्र में एक हाईवे पर उसकी दोनों टांगें कुचल गई थी। तब से वह घिसता ,चलता भीख माँगता -फिरता था। एक पादरी को वह निःसहाय अवस्था में मिला था उसने उसका नाम रखा था ,’निकोलस टूसेंट ‘एक बार की बात है एवारी ने अपने मुर्गीखाने से सटी एक खोह में उसे सोने की इज़ाज़त दे दी। उसे एक -आध रोटी का टुकड़ा और गिलास भर सेव की मदिरा मिल जाया करती थी। गाँव के लोग उसे कुछः नहीं देते थे। पिछले चालीस बर्षों से उसे इसी हालात में देखकर हर कोई तंग आ चुका था। वह इन सरहदों को पार नहीं कर सकता था। क्योंकि उसे भीख मांगने के अलावे उसके पास कोई अन्य चारा भी तो नहीं था। उस पार की भी कोई दुनिया है वह नहीं जानता था। वह खुद से कभी कोई सवाल नहीं करता हालांकि लोग उसे ताना देते कि यही लंगड़ाते घूमने के वजय वह दूसरे गाँव क्यों नहीं जाता ? वह कोई उत्तर नहीं देता। निरीह प्राणी को तो हज़ारों चीज़ों से डर लगता है। उसे पुलिस से कभी कोई दिक्कत नहीं आयी थी। लेकिन वह उनसे बचकर रहता . शायद यह प्रवृति उसे अपने अनजान माता -पिता से मिली थी। उसका कोई ठिकाना भी तो नहीं था। वह खेत के जानवरों की तरह अपनी जिंदगी गुजार रहा था। वह किसी को प्यार भी तो नहीं कर सकता था ना ही उसे कोई प्यार करता था। क्योंकि वह बेपरवाह हिकारत का शिकार था।
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वह दो दिनों से कुछ भी नहीं खाया था। उसे कोई कुछ भी नहीं देता था। घर की औरतें जब भी उसे आता देखती तब चिल्लाने लगती। हैट दरवाजे पर ,”निकालो यहां से ‘उसे सुनाई देती और वह चुपचाप आगे बढ़ जाता। औरतें आपस में कहती ,-‘इस हरामखोर को हम पुरे साल भर तो खिलाते नहीं रह सकते। पर उसे खाने की तो जरूरत पड़ती ही थी. वह भूखा इतना था कि एक कदम भी चलना दूभर था। दिसंबर का महीना था। वह अपने आप को घसीटते हुए चला जा रहा था। भूख उसके अंग -अंग में कुलबला रही थी। उसे हर दरवाज़े पर गालियां मिलती। उसे अपने अकथनीय पीड़ा को समझने की भी शक्ति नहीं बची थी। काले रंग की कुछ मुर्गियां इधर -उधर भाग रही थी। घंटा यानी उसने सोचा कि क्यों नहीं एक मुर्गी को ही पकाकर खा लिया जाए उसने एक मुर्गी को पत्थर से माँरकर गिरा दिया। जैसे ही उसने उस काली चिड़ियाँ को उठाना चाहा ,उसके पीठ पर एक जोरदार प्रहार पड़ा। वह किसान षिकेट था जिसने उसपर जोरदार प्रहार किया था। उसपर लात -घूंसे पड़ने लगे। उसे गोदाम में बंद कर पुलिस को बुलाया गया। पुलिस आयी ,घंटा उठ भी नहीं पाया। सार्जेंट ने उसे चलने को कहा। लोग उसपर रास्ते में फब्बतियाँ कस रहे थे। वह टाउन जेल में डाल दिया गया। पुलिस को यह भी ख़याल नहीं आया कि उसे खाने की भी जरूरत हो सकती है। उसे अगले दिन तक के लिए अकेले बंद कर दिया गया था। जब अगले सुबह वे उसकी पड़ताल करने गए तब वह फर्श पर मृत पाया गया। कैसी बिडम्बना है जीवन की ?

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