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ज़रूरतमंद-an inspirational story In hindi language on need

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पार्किंग में कार पार्क करते हुए मानवी ने अपने दिल में एक अनोखे उत्साह का अनुभव किया. अब तक वह नितीश के साथ हुई अपनी तीखी बातचीत की सारी कड़वाहट अपने मन से झटक चुकी थी.
“घर में कौन-सी कमी है, मैं स्वयं अच्छा-खासा कमाता हूं. बंगला, कार, ज़मीन-जायदाद सब कुछ तो है…. और मैं वादा करता हूं कि तुम्हें कभी किसी चीज़ की कमी नहीं होने दूंगा!” मानवी को नितीश की यह दुहाई एक परंपरागत पति की दुहाई प्रतीत हुई.
उफ! ये पुरुष स्त्री को अपने पैरों पर खड़ी होते हुए देख ही नहीं पाते हैं, मानवी ने सोचा. उसे नितीश की इस अपेक्षा से चिढ़ हुई थी. किन्तु सब पुरुष एक जैसे नहीं होते हैं. अब प्रशांत को ही लो, उसने पहल करते हुए मानवी से कहा था, “भाभी, आप तो वेल-क्वॉलीफाइड हैं, आपको मेरा ऑफ़िस ज्वाइन कर लेना चाहिए.”
प्रशांत के मुंह से अपने लिए ‘वेल-क्वॉलीफाइड’ सुन कर मानवी गद्गद् हो उठी थी. नितीश और सास-ससुर कभी मानवी के विचार से सहमत नहीं हुए, जबकि उन्होंने मानवी को एक पढ़ी-लिखी बहू के रूप में ही चुना था.
विवाह के दो महीने बाद जब नितीश अपने कारोबार में व्यस्त हो गया तो मानवी का दिल एक बार फिर अंगड़ाइयां लेने लगा.
“सुनिए, आप तो अपने कारोबार में डूबे रहते हैं और मैं घर में बैठी-बैठी बोर हो जाती हूं. अगर मैं कहीं नौकरी कर लूं तो…?” उसने दबे स्वर में नितीश से कहा.
“देखो मानवी, मैंने तुम्हें पहले भी समझाया है कि जब हमारे घर में किसी प्रकार की आर्थिक तंगी नहीं है तो फिर तुम्हें नौकरी करने की क्या आवश्यकता है?” नितीश ने शांत भाव से उत्तर दिया.
“प्रश्‍न आर्थिक तंगी या आर्थिक आवश्यकताओं का नहीं है…मैं पढ़ी-लिखी हूं और अपनी पढ़ाई का सदुपयोग करना चाहती हूं… मैं अपने अस्तित्व को महसूस करना चाहती हूं.” मानवी ने झिझकते हुए तर्क दिया.
“ये सब तो तुम बिना नौकरी किए भी कर सकती हो. ओ हां, तुम किसी समाज सेवा संगठन से क्यों नहीं जुड़ जाती?” नितीश ने उसे सलाह देते हुए स्वयं अपनी सलाह पर मुहर भी लगा दी, “हां, ये ठीक रहेगा.”
“नहीं, ये ठीक नहीं रहेगा!”
नितीश के जाने के बाद मानवी मन-ही-मन देर तक कुनमुनाती रही. उसे उखड़ा-उखड़ा देख कर सासू मां ने प्यार से कारण पूछा.
सासू मां की ममता को महसूस करते हुए मानवी ने उनके सामने अपना दिल खोल कर रख दिया.
“मांजी, शादी से पहले मैं नौकरी करती थी और उस समय मुझे लगता था कि मेरा अपना भी कोई व्यक्तित्व है…अब शादी के बाद ऐसा लगता है कि मैं उनकी परछाईं मात्र बन कर रह गई हूं….”
“तो तुम क्या करना चाहती हो?” सासू मां ने पूछा.
“मैं नौकरी करना चाहती हूं.”
“क्या यही एकमात्र रास्ता है? यदि कोई और काम…?”
“नहीं मांजी!” मानवी ने सासू मां की बात काटते हुए कहा, “मैं और कोई काम नहीं करना चाहती हूं.”
“मैं तुम्हारी भावना समझ रही हूं बेटी, लेकिन ज़रा सोचो, क्या तुम्हारा नौकरी करना ऐसा नहीं लगेगा जैसे तुम किसी दूसरे का अधिकार छीन रही हो?” सासू मां ने बड़ा अजीब-सा तर्क दिया.
“इसमें किसी दूसरे का अधिकार छीनने की कौन-सी बात है? आख़िर मैं जो भी नौकरी हासिल करूंगी, वो मुझे मेरी योग्यता के बल पर मिलेगी.” मानवी ने आश्‍चर्यचकित होते हुए कहा.
“खैर, मैं तो यही चाहती हूं कि तुम नौकरी मत करो, लेकिन अगर तुम चाहती ही हो तो कम-से-कम सालभर तो ठहर जाओ, वरना अच्छा नहीं लगेगा कि नई बहू को नौकरी करने जाने दिया जा रहा है.” सासू मां ने मानो हथियार डालते हुए कहा.
“ठीक है मांजी! मैं सालभर ठहर जाऊंगी.” मानवी को भी लगा कि बात बढ़ते-बढ़ते बिगड़ जाए इससे अच्छा है कि सालभर वाली बात मान ली जाए.
“मेरी अच्छी बेटी!” सासू मां ने दुलारते हुए कहा था, “तुझे क्या लगता है कि मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं? मैं समाजशास्त्र में पीएचडी हूं.”
“क्या?” मानवी चकित रह गई थी. उसे नहीं पता था कि उसकी सासू मां उच्च शिक्षा प्राप्त हैं.
“तो फिर आपने नौकरी क्यों नहीं की?” मानवी अपने आश्‍चर्य को छिपा नहीं सकी.
“क्योंकि मैंने यह महसूस किया कि वो काम नहीं करना चाहिए, जिससे किसी का अहित हो!” सासू मां ने गोलमाल-सा जवाब दिया.
“लेकिन इससे किसी का अहित कैसे हो सकता है?” मानवी को बिलकुल भी समझ में नहीं आया.
“अपने इस देश में लाखों ऐसे लोग बेरोज़गार हैं, जिन्हें नौकरी की आवश्यकता है और लाखों ऐसे लोग नौकरी कर रहे हैं, जिनके लिए नौकरी आवश्यकता नहीं केवल एक शग़ल है. यदि ऐसे लोग अपना मन बहलाने या स़िर्फ ख़ुद को साबित करने के लिए नौकरी का रास्ता छोड़कर कोई और रास्ता अपना लें तो उन लोगों की रोज़ी-रोटी की समस्या हल हो सकती है, जिनके लिए नौकरी जीवन-मरण के समान महत्वपूर्ण है.” सासू मां ने दार्शनिक अंदाज़ में कहा.
“लेकिन मांजी!…” मानवी ने उन्हें टोकना चाहा.
“छोड़ो इस बात को. बस, एक प्याला गरमा गरम चाय पिला दो.” सासू मां की बात सुन कर न चाहते हुए भी मानवी को बात वहीं समाप्त कर देनी पड़ी.
देखते-ही-देखते बारह माह व्यतीत हो गए. सासू मां भी रिश्तेदारी में बाहर गई हुई थीं. एक दिन उचित अवसर देख कर मानवी ने नितीश से एक बार फिर अनुरोध किया. जैसे कि उसे आशा थी, नितीश ने उसे समझाना चाहा. किन्तु इस बार मानवी नितीश की एक भी बात सुनने को तैयार नहीं हुई.
यहां तक कि आज इंटरव्यू के लिए निकलते समय भी दोनों के बीच काफ़ी कहा-सुनी हुई. मानवी नितीश के इस व्यवहार को अनदेखा करते हुए इंटरव्यू के लिए निकल पड़ी. मानवी ने कार पार्क की और सीढ़ियां चढ़ती हुई प्रशांत के द़फ़्तर जा पहुंची.
“हैलो मैम? मैं आपके लिए क्या कर सकती हूं?” काउंटर पर बैठी रिसेप्शनिस्ट ने मानवी को टोका.
मानवी सीधे प्रशांत के कक्ष की ओर बढ़ी जा रही थी. रिसेप्शनिस्ट की आवाज़ सुन कर हड़बड़ाकर बोल उठी, “मैं यहां इंटरव्यू के लिए आई हूं.”
“ओह, आपका नाम?”
“मानवी”
“हूं! आप कृपया उधर सोफे पर प्रतीक्षा कीजिए. आपकी बारी आने पर आपको सूचित कर दिया जाएगा.” रिसेप्शनिस्ट ने मधुर स्वर में मानवी से कहा.
“ठीक है.” मानवी को यह आशा नहीं थी कि उसे अन्य लोगों की भांति अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी पड़ेगी.
सोफे पर बैठते ही मानवी का ध्यान गया उस सहमी-परेशान लड़की पर गया, जो सोफे के दूसरे छोर पर बैठी हुई थी. उसने साधारण-सा सलवार-कुर्ता पहन रखा था. उसने अपने दोनों हाथों में अपनी फ़ाइल को कुछ इस तरह थाम रखा था जैसे वह उसकी सबसे क़ीमती चीज़ हो.
“आप भी इंटरव्यू देने आई हैं?” मानवी ने उस लड़की के निकट सरकते हुए पूछा.
“जी!” लड़की ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया.
“मैंने समाजशास्त्र में डॉक्टरेट किया है.” मानवी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा.
“मैंने भी.” फिर संक्षिप्त उत्तर मिला.
“आपने इसके पहले भी कहीं जॉब किया है?” मानवी ने पूछा.
“जी हां, वर्ल्ड बैंक और यूनीसेफ के प्रोजेक्ट्स में काम कर चुकी हूं.” लड़की ने सहजता से उत्तर दिया.
“ओह! तो फिर इस नौकरी के लिए क्यों?” मानवी ने पूछा.
“वो दोनों अस्थाई नौकरियां थीं.” लड़की मानवी का आशय समझ गई.
“आप शादीशुदा हैं?” मानवी ने अचानक व्यक्तिगत प्रश्‍न पूछ डाला.
“नहीं.” लड़की ने कहा.
“ओह! फिर तो आप शादी होते ही ये नौकरी छोड़ देंगी या फिर आपके ससुरालवाले आपसे नौकरी छुड़वा देंगे.”
“हुंह! मेरी शादी होगी भी या नहीं, ये तो मुझे पता नहीं है, लेकिन इतना ज़रूर पता है कि मैं अपने बूढ़े, असहाय माता-पिता का इकलौता सहारा हूं और इसलिए आज मुझे इस नौकरी की अत्यंत आवश्यकता है.” लड़की के स्वर में व्यंग और पीड़ा का मिला-जुला भाव था.
“आपके भाई-बहन?” मानवी ने पूछना चाहा.
“हैं, लेकिन नहीं के समान. वे सब अपना-अपना घर बसा कर हमसे मुंह मोड़ चुके हैं, लेकिन मैं किसी भी क़ीमत पर अपने माता-पिता को नहीं छोडूंगी. किसी भी क़ीमत पर नहीं!” लड़की भावुक हो उठी.
मानवी समझ नहीं पा रही थी कि उस लड़की को कैसे दिलासा दे. उसी समय लड़की का नाम पुकारा गया.
“कुमारी श्‍वेता!”
लड़की अपना नाम सुन कर उठ खड़ी हुई और अपनी फ़ाइल को लिए उस कक्ष में चली गई, जहां इंटरव्यू चल रहा था.
पांच मिनट बाद श्‍वेता बाहर आई. उसका चेहरा खिला हुआ था. शायद उसका इंटरव्यू सफल रहा था. वह काफ़ी हद तक आश्‍वस्त थी कि यह नौकरी अब उसे मिल ही जाएगी.

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अब मानवी को भीतर जाने का संकेत किया गया. मानवी ने अपनी रेशमी साड़ी का पल्ला करीने से संभाला और कक्ष में जा पहुंची.
“आइए मानवीजी! प्लीज़ बैठिए.” प्रशांत चहककर बोला. प्रशांत की बगलवाली कुर्सियों पर दो और व्यक्ति बैठे हुए थे. मेज़ के सामने रखी कुर्सी पर मानवी जा बैठी.
“आप लोग पूछिए भाई, इनसे जो कुछ पूछना हो.” प्रशांत हंसता हुआ बोला.
“आप ही शुरू करिए.” पहला व्यक्ति चापलूसीभरे अंदाज में बोला.
“देखिए, मेरी तो ये भाभी लगती हैं, इसलिए मैं तो इनसे यही पूछ सकता हूं कि आज आप डिनर में क्या पकानेवाली हैं?” प्रशांत हो-हो करके हंस पड़ा. वे दोनों व्यक्ति भी सुर-में-सुर मिलाकर हंसने लगे.
मानवी को यह सब बड़ा अजीब लगा.
“आप लोग यदि मुझसे कुछ पूछेंगे नहीं, तो मुझे नौकरी कैसे देंगे?” मानवी ने पूछ ही लिया.
“नौकरी तो आपके लिए ही है. क्या मैं आपकी योग्यता नहीं जानता हूं?” प्रशांत ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया.
“और वो लड़की श्‍वेता, जिसका इंटरव्यू अभी मुझसे पहले हुआ?” मानवी ने पूछा.
“हां, वो भी बहुत योग्य है, लेकिन उसका नंबर आपके बाद आता है.” प्रशांत लापरवाही से बोला.
“ओह, यानी मैं नौकरी पक्की समझूं?” मानवी ने ख़ुश होकर पूछा.
“हंड्रेड परसेंट पक्की!” प्रशांत ने कहा. “और अब आप हमें मिठाई खिलाइए!”
“ज़रूर खिलाऊंगी, लेकिन पहले नितीशजी का मुंह मीठा कराऊंगी.” मानवी ने कहा.
मानवी प्रशांत के द़फ़्तर से निकलकर नितीश से मिलने चल पड़ी. उसने रास्ते में गाड़ी रोक कर नितीश के पसंद की मिठाई ख़रीदी. वह ख़ुश थी. वह अपने मन में एक अनोखी शांति का अनुभव कर रही थी. उसे अपना मन बहुत हल्का लग रहा था. एकदम तनावरहित.
“अरे तुम! तुम तो आज इंटरव्यू देने गई थी.” नितीश मानवी को अपने सामने पाकर चौंक उठा.
“ये लो मुंह मीठा करो!” कहते हुए मानवी ने मिठाई का एक टुकड़ा नितीश के मुंह की ओर बढ़ाते हुए कहा.
“ओह, बधाई! नौकरी मुबारक़ हो!” नितीश ने संयत स्वर में कहा.
“ये मिठाई नौकरी मिलने की नहीं, बल्कि नौकरी छोड़ने की है श्रीमानजी!” मानवी ने मुस्कुराते हुए कहा.
“क्या मतलब?” नितीश चौंका उठा.
“हां! आज मुझे आपकी और मांजी की बातों का मतलब समझ में आ गया.”
“कैसा मतलब?”
“यही कि नौकरी ज़रूरतमंद को ही करना चाहिए, टाइमपास करनेवालों को नहीं. मात्र चंद साड़ियों या अपनी फ़िज़ूल जेबख़र्ची के लिए नहीं या फिर स़िर्फ यह दिखाने के लिए भी नहीं कि नौकरी करने में ही स्त्री की स्वतंत्रता निहित है. ऐसा करनेवाली औरतें न जाने कितने ज़रूरतमंदों का अधिकार छीन लेती हैं. यह मैं आज समझ गई हूं.” मानवी उत्साहित स्वर में बोलती चली गई. उसने नितीश को श्‍वेता के बारे में बताया और अपने इंटरव्यू के बारे में भी, साथ ही यह भी बताया कि उसने रास्ते में ही प्रशांत को फ़ोन करके स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि यदि वह सच्चे अर्थों में संबंध निभाना चाहता है तो उसके बदले उस लड़की को नौकरी दे दे, जो उससे ज़्यादा योग्य है और जिसे इस नौकरी की सबसे अधिक ज़रूरत है. प्रशांत भी मानवी के इस आग्रह को सुनकर गदगद हो उठा.
“आज तक मुझे तुमसे प्यार था, लेकिन आज तुम पर बहुत गर्व महसूस हो रहा है!” कहते हुए नितीश ने मानवी को अपनी बांहों में भर लिया.
“अच्छा-अच्छा, अब आप अपना काम करिए, मैं चली घर.”
“घर पर अकेली बोर तो नहीं होगी?” नितीश ने संदेहभरे स्वर में पूछा.
“नहीं! अब कभी नहीं!” मानवी ने दृढ़ताभरे स्वर में उत्तर दिया और प्रफुल्लित मन से अपने घर की ओर चल दी.

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