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भिखारी-an inspirational story of a begger in hindi language

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भिखारी -अंतोन चेखोव -ओ साहब जी,एक भूखे पर दया कीजिए तीन दिनों से भूखा हूँ जेब में एक पैसा भी नहीं है। पुरे आठ सालों तक गाँव के स्कूल में मास्टर रहा। बड़े लोगों की बदमाशी से मेरी नौकरी चली गई। जुल्म का शिकार बना हूँ। बैरिस्टर ने भिखारी ने को देखा। उन्हें लगा की इस आदमी को पहले भी कही देखा है। ‘मुझे नौकरी मिलनेवाली है। पर जाने के लिए पैसे नहीं हैं। कृपया मदद कीजिये वैसे भीख मांगना शर्म की बात है पर क्या करूँ ,मज़बूर हूँ। बैरिस्टर ने कहा -‘सुनिए ,तीन दिन पहले मैंने आपको सदोवाया की सड़कों पर देखा था। आप ही थे ना ?आपने मुझसे कहा था कि आप मास्टर नहीं बल्कि छात्र हैं जिसे कॉलेज से निकाल दिया गया है। नहीं ,यह गलत है। भिखारी बुदबुदाया। बैरीस्टर साहब का चेहरा गुस्से से तमतमा गया। कितने नीच हो तुम भूखे हो ,गरीब हो ,यह ठीक है पर इतने बेशर्मी से झूठ क्यों बोलते हो ? बेरीस्टर साहब क्रोध से आग बबूला हो उठे। फिर उस भिखारी ने दिल पर हाथ रखकर बोला ,-‘साहब ,मैं सचमुच झूठ बोल रहा था। बिना झूठ बोले कोई भीख नहीं देता। सच बोलो तो भूखे मरो आप सही हैं पर मैं क्या करूँ ? काम करना चाहिए पर तुम तो निकम्मे हो। शराबी हो भीख मांगने और झूठ बोलने के अलावे तुम्हे और कुछ आता नहीं। पर कौन सा काम करूँ ,कौन मुझे नौकरी देगा ?मुझे तो कुछ आता भी नहीं -भिखारी ने कहा। एकदम बकवास लकड़ी फाड़ोगे ?आप चाहें तो मैं जरूर करूंगा। उन्होंने उसे लकड़ी फाड़ने को दे दिया। वह शराब पीने के कारण कमजोर हो चुका था। भिखारी ने बर्फ में साणे एक लकड़ी का कुंडा अपनी तरफ खींचा और कुल्हाड़ी से एक वार किया। उन्होंने उसकी नाकामी के वावजूद पचास कोपेक दिए। अगले महीने पहली तारीख को वह फिर आ गया। शराब में मदमस्त होने के बाद भी उसने कुछ काम कर ही दिए और हर बार बीस -चालीस कोपेक कमा ही लेता था। एक दिन बेरिस्टर साहब ने पूछा -लगता है तुम्हे मेरी बातों का असर पड़ा है। तुम पढ़ना लिखना जानते हो ?तो यह पात्र लेकर मेरे दोस्त के घर चले जाना। कागजातों की नक़ल करने की नौकरी है। शराब पीकर भूल मत जाना। वह पात्र लेकर गया तो सही पर उस दिन के बाद कभी नहीं आया। दो साल बीत गए।
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एक दिन वही आदमी थिएटर के पास मिला और उसने बताया कि वह नोटेरी के यहां काम करता है। बहुत ख़ुशी की बात है कि अब तुम अपनी मिहनत की कमाई से जीवन का निर्वाह कर रहे हो। मैं आपका आभारी हूँ पर सच आपकी ओल्गा ने ही मुझे बचाया है। वह कैसे ,उन्होंने पूछा। साहब जी जब भी मैं आपके यहां लकड़ी फाड़ने आता था ,वह मुझे कोसती रहती पर वह मेरा काम कर देती। मैंने एक भी लकड़ी नहीं फाड़ी सब उसने ही मेरे बदले किया। उसकी वजह से ही मैं सुधर गया। मैं उसे कभी नहीं भूलूंगा हाँ साहबजी अब मुझे जाना होगा ,नाटक शुरू होने की घंटी बज रही है। वह अपना सर झुकाकर अपनी सीट की तरफ बढ़ गया।

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