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मुस्कुराहट-An inspirational story of smile in hindi

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टन (एक)…टन (दो)…टन(तिन)…टन(चार)…टन(पांच)..,
स्टेशन पर ट्रेन के आने से पहले बजने वाली इन घंटियों को गिनना मेरी पुरानी आदत थी| ना जाने क्यों, पर इन घंटियों को सुनकर इस भागदौड़ भरी ज़िन्दगी में मुझे अपने जिंदा होने का प्रमाण मिलता था| आज भी इसी अहसास के बिच में आगरा से दिल्ली तक का यह सफ़र पूरा कर रहा था| खैर, ट्रेन स्टेशन पर आ चुकी थी और ट्रेन में जल्दी चढ़कर पूरी सिट पर अपना कब्ज़ा ज़माने की पुरानी प्रथा को लोग आज भी पूरा कर रहे थे| लगभग २ मिनट में ही खचाखच भरा पूरा प्लेटफार्म ट्रेन में सवार हो चूका था| में भी अब रेलवे की उस पुरानी बेंच से उठा जो मुझे हर स्टेशन पर मिल जाती और अनायास ही मुझे अपनी ओर खीच लेती थी|
जैसा की मेने सोचा ही था, मेरी बर्थ पर पहले से एक महाशय जागते हुए गहरी नींद में सो रहे थे| मेने अपने हाथ से उन्हें हल्के से हिलाकर बिलकुल वैसे ही उठाने की कोशिश की जैसे सुबह-सुबह कोई माँ अपने बच्चे को उठाती है…हालाकिं, उन्होंने भी मेरा पूरा साथ देते हुए छोटे बच्चे की ही तरह नींद के आगोश में अपने पैरों को थोडा सा समेट कर बिना उन्हें परेशान किये चुपचाप वहां बैठ जाने का इशारा किया|
खैर, भारतीय होने की परंपरा का निर्वाहन सफलता पूर्वक हो चूका था, इसीलिए मैंने थोड़ी कड़क आवाज़ में कहा…
“भाईसाहब यह मेरी सिट है….”
पहली आवाज़ में ही गहरी नींद से उठकर उन्होंने मुझे गुस्से से इस कदर देखा जैसे बस आज मेरी ज़िन्दगी का आखरी दिन हो और अपना कम्बल लेकर ऊपर की बर्थ पर चढ़ गए|
ऐसा मेरे साथ अक्सर ही होता था, इसलिए मुस्कुराकर में अपनी बर्थ पर बैठ गया और हमेशा की तरह नॉवेल पढने लग गया, जो मेने अभी-अभी स्टेशन के बुक स्टाल से खरीदी थी|
ट्रेन को स्टेशन छोड़े लगभग बीस मिनट हो चुके थे और अब तक में अपनी नावेल के लगभग आठ पन्ने पढ़ चूका था| तभी मेरी नज़र सामने के कंपाउंड में बेठी एक लड़की पर पड़ी| हल्के पीले रंग का सूट पहने वह मुझे कुछ परेशान सी दिखी| उसके चहरे को देखकर लग रहा था जैसे वह थोड़ी सी घबराहट में है| ऐसा लग रहा था जैसे वह बिना टिकट यात्रा कर रही हो, बार-बार पीछे मुड़कर वह टीटी के ना आ जाने सोच रही थी| शायद सोच रही थी, कि टीटी को थोड़े बहुत पैसे देकर कुछ निपटारा कर लेगी| सामान के नाम पर उसकी गौद में महज एक छोटा सा बेग था| फिर थोड़ी देर बाद वह खिड़की की और हाथ रखकर सो गई और में भी अपनी नॉवेल पढने में व्यस्त हो गया|
लगभग आधे घंटे बाद टीटी ने उसको उठाया और पुछा, “कहाँ जाना है बेटी”
अंकल, दिल्ली तक जाना है (उसने घबराहट और मासूमियत भरे लहजे में कहा)
टिकट है…(टीटी ने पुछा)
हाँ अंकल, जनरल का है…लैकिन वहां चढ़ नहीं पाई इसलिए यहाँ आकर बैठ गई!
ठीक है बेटा, लेकिन 300 रुपाए पेनाल्टी लगेगी (टीटी ने कहा)
लेकिन अंकल मेरे पास तो 100 रूपए ही हें…(लड़की की आँखे अब थोड़ी सी भीग चुकी थी)
ये तो गलत बात है बेटा, पेनाल्टी तो भरना ही पड़ेगी…(टीटी ने कहा)
सॉरी अंकल, में अलगे स्टेशन पर जनरल डिब्बे में चली जाउंगी…मेरे पास सच में 100 रूपए ही है, कुछ परेशानी आ गई इसलिए जल्दबाजी में घर से निकल आई और ज्यादा पैसे रखना भूल गई (बोलते-बोलते वह रोने लगी)
टीटी को उस पर दया आ गई और उसने 100 रूपए का चालान बनाकर उसे दिल्ली तक के सफ़र की अनुमति दे दी|
टीटी के जाते ही उसने आसूं पोंछें और इधर-उधर देखा, कि कहीं कोई उसे देख कर हंस तो नहीं रहा| फिर उसने अपने बेग से मोबाइल निकला और किसी को फोन किया कि ज़ल्दबाज़ी में वह पैसे रखना भूल गई और अब उसके पास बिल्कुल पैसे नहीं है…कैसे भी करके दिल्ली स्टेशन पर उसे कुछ पैसे भिजवा दे नहीं तो वह समय पर गाँव नहीं पहुँच पाएगी|
इतना सबकुछ सुनने और समझने के बाद मेरे मन में एक ही बात बार-बार आ रही थी, कि हो ना हो यह लड़की किसी ना किसी मुसीबत में जरुर है| ना जाने क्यों उसकी मासूमियत देखकर में उसकी और खीचा चला जा रहा था|मन कर रहा था, कि उसके पास जाकर इंसानियत के नाते उसकी मदद करू और कहूँ की तुम परेशान मत हो और रो मत…लेकिन एक अजनबी के लिए इस तरह से सोचना और उसके पास जाकर उससे बात करना भी अजीब था| उसके चहरे से एसा लग रहा था जैसे उसने सुबह से कुछ खाया पिया भी ना हो और अब तो उसके पास पैसे भी नहीं थे| इतना सोचकर मेरे मन में फिर से विचारों का उथल-पुथल शुरू हो गया था|
बहुत देर तक उसे इस तरह परेशानी में देखने के बाद में कुछ उपाय सोचने लगा जिस से उसकी मदद भी कर पाऊँ और उसकी पहचान में भी ना आऊ!
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बहुत देर तक सोचने के बाद, जिस नॉवेल को में पढ़ रहा था उसके आखरी पन्ने पर मेने लिखा “बहुत देर तक तुम्हें परेशानी में देख रहा हूँ, पैसे ना होने की बात जो तुमने फोन पर किसी को बताई वह भी मेने सुनी| में जनता हूँ की किसी अजनबी तो इस तरह पैसे भेजना अजीब है और शायद तुम्हारी नज़र में गलत भी होगा| लेकिन तुम्हें इस तरह परेशान देखकर मुझे बैचेनी हो रही है, इसलिए इस किताब के साथ 800 रुपाए तुम्हें भेज रहा हूँ|तुम्हें कोई अहसान ना लगे इसलिए निचे अपना एड्रेस भी लिख रहा हूँ! जब तुम्हें सही लगे तुम मुझे यह पैसे वापस भी भेज सकती हो वैसे में नहीं चाहूँगा की तुम मुझे यह पैसे वापस करो| “एक अजनबी हमसफ़र”
एक चाय वाले के हाथों मेने वह किताब उस लड़की को देने को कहा और चाय वाले को उस लड़की को मेरे बारे में बताने को मना किया| किताब और उसमें रखे पैसे मिलते ही लड़की ने मुड़कर इधर उधर देखा लेकिन तब तक में अपनी बर्थ पर कम्बल ओढ़ कर सो गया था| उसे ट्रेन के उस डिब्बे की भीड़ में कोई भी नहीं दिखा जो उसकी और देख रहा हो|
थोड़ी देर बाद कम्बल का एक कोना थोडा सा हटाकर मैंने उसकी और देखा, पैसे पाकर अब उसके चहरे पर एक चमक आ चुकी थी और सुर्ख पड़े होटों पर एक मुस्कराहट थी| उस दिन उसकी वह मुस्कराहट देखकर ऐसा लगा जैसे कई सालों से मुझे बस इसी मुस्कराहट का इंतज़ार था|उसके चहरे की मुस्कराहट ने मेरे दिल उसके हाथों में थमा दिया| थोड़ी-थोड़ी देर में, में चादर का कोना हटा कर उसकी और देखकर में सांसे ले रहा था| पता ही नहीं चला कब मेरी आँख लग गई|
जब नींद से जगा तब तक दिल्ली स्टेशन आ चूका था| मैंने उस सिट की तरफ देखा तो वह लड़की जा चुकी थी लेकिन सिट पर वही कागज पड़ा था जिस पर मैंने कुछ लिखा था| मैंने जल्दी से उतरकर वह कागज़ उठा लिया|
कागज़ की दूसरी और उसने लिखा था….
Thank You,
मेरे अजनबी हमसफ़र…आपका यह अहसान में ज़िन्दगी भर नहीं भूलूंगी| मेरी माँ आज मुझे छोड़कर चली गई है, घर में मेरे अलावा कोई भी नहीं है इसलिए आनन-फानन में घर जा रही हूँ….आज आपके दिए इन पैसों से में अपनी माँ को शमशान जाने से पहले एक बार देख पाऊँगी| बीमारी की वजह से माँ को ज्यादा वक़्त तक घर में भी नहीं रखा जा सकता आज आपकी वजह से में सही वक़्त पर घर पहुँच पाऊँगी|आज से में आपकी कर्जदार हूँ, जल्द ही आपके पैसे लोटा दूंगी|
उस दिन से उसकी वह नम आँखे और मुस्कराहट मेरे जीने की वजह बन गई…..हर रोज़ पोस्टमेन का इंतजार करता और उससे पूछता शायद किसी दिन उसका कोई ख़त आ जाए|
आज दो साल बाद एक ख़त मिला, लिखा था “आपका कर्ज मैं अदा करना चाहती हूँ, लेकिन ख़त के ज़रिए नहीं….आपसे मिलकर! निचे मिलने की जगह का पता लिखा था और आखिर में लिखा था….“तुम्हारी अजनबी हमसफ़र…..”
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