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102 नॉट आउट का रिव्यु- bollywood news in hindi the

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हम एक से बढ़कर एक Bollywood जगत की खबरें प्रकाशित करते हैं। पेश है इसी कड़ी में आज हम “102 नॉट आउट का रिव्यु” bollywood news in hindi the. आशा है ये आपको पसंद आएगी

ऐसी बात नहीं है की आज कल बॉलीवुड में सिर्फ टेक्नोलॉजी या अंग प्रदर्शन ही दिखाया जाता है.आज के भी युग में भी बेहरतीन फिल्मे बनते हैं. शायद उसी कड़ी में एक फिल्म आयी है,102 नॉट आउट. इस फिल्म में 60 की उम्र पार कर चुके दो कलाकारों को केंद्र में रखकर बनाई गयी है .लीक से हैट कर बनी फिल्मो के अपने अलग ही दर्शक होते हैं.हाल ही में रिलीज हुईं हिचकी, अक्टूबर, बियॉन्ड द क्लाउड्स जैसी कई फिल्में हैं जिन्होंने प्रचलित फॉर्म्‍युला फिल्मों के बने-बनाए खांचे को तोड़कर कॉन्टेंट प्रधान फिल्मों का जलवा दिखाया.निर्देशक उमेश शुक्ला की ‘102 नॉट आउट’ उसी शृंखला की फिल्म है, सौम्य जोशी के लिखे गुजराती लोकप्रिय नाटक पर आधारित यह फिल्म बुजुर्गों के एकाकीपन की त्रासदी को दर्शाती है.आपको बता दे की इस फिल्म के दो मुख्य कलाकार अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर है. वो भी दौर था जब इन दोनों ने एक साथ काम करते हुए एक से बढ़कर एक हिट फिल्मे दी हैं. देखना है की परदे पर एक साथ फिर से वापसी करने वाले इन दोनों की जोड़ी वाली फिल्म 102 नॉट आउट क्या धमाल मचती है.वैसे आपको बता दे की अभी तक फिल्म ने 30 करोड़ की कमाई कर ली है, और इस वीक में रिलीज हुई आलिया की फिल्म राज़ी ने इस फिल्म की कमाई पर कोई प्रभाव नहीं डाला है.मतलब फिल्म ने धमाल मचा दिया है.
फिल्म की कहानी कुछ इस तरह है की 75 साल का बाबूलाल वखारिया (ऋषि कपूर) घड़ी की सुइयों के हिसाब से चलने वाला सनकी बूढ़ा है. उसकी नीरस जिंदगी में डॉक्टर से मिलने के अलावा अगर कोई खुशी और उत्तेजना का कारण है तो वह है उसका एनआरआई बेटा और उसका परिवार है. हालांकि, अपने बेटे और उसके परिवार से वह पिछले 17 वर्षों से नहीं मिला है. बेटा हर साल मिलने का वादा करके ऐन वक्त में उसे गच्चा दे जाता है.

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वहीं, दूसरी ओर बाबूलाल का 102 वर्षीय पिता दत्तात्रेय वखारिया (अमिताभ बच्चन) उसके विपरीत जिंदगी से भरपूर ऐसा वृद्ध है जिसे आप 102 साल का जवान भी कह सकते हैं. एक दिन अचानक दत्तात्रेय अपने झक्की बेटे बाबूलाल के सामने शर्तों का पिटारा रखते हुए कहता है कि अगर उसने ये शर्तें पूरी नहीं कीं तो वह उसे वृद्धाश्रम भेज देगा. असल में दत्तात्रेय, धमकी देकर और शर्तों को पूरा करवाकर बाबूलाल की जीवनशैली और सोच को बदलना चाहता है. अब 102 साल की उम्र में वह अपने 75 वर्षीय बेटे को क्यों बदलना चाहता है, इसके पीछे एक बहुत बड़ा राज है. इस राज का पता लगाने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी.
आपको बता दे की, डायरेक्‍टर उमेश शुक्ला इससे पहले भी गुजराती नाटक पर आधारित ‘ओह माय गॉड’ बना चुके हैं. इस बार भी उन्होंने वही राह चुनी है,और फिल्म के जरिए उमेश ने विदेश में रहने वाले एनआरआई बच्चों के लिए तड़पते माता-पिता को बहुत ही स्ट्रॉन्ग मेसेज दिया है. हालांकि, फिल्म का फर्स्ट हाफ धीमा है और घटनाक्रम में पुनरावृत्ति का अहसास होता है. अन्य सहयोगी किरदारों की कमी खलती है लेकिन सेकंड हाफ में फिल्म गति पकड़ती है और क्लाइमेक्स आपको जज्बाती करने के साथ-साथ एक ऐसी जीत का अहसास करवाता है मानो उस भावनात्मक लड़ाई में अगर किरदार शिकार हो जाता तो आप बहुत कुछ हार जाते. ऊपर के कहानी को पढ़ कर आपको इतना समझ में तो आ गया होगा की कहानी का क्लाइमेक्स तगड़ा होगा.
अगर फिल्म में अभिनय की बात करें तो एक बात साफ हो जाती है कि बिग बी को सदी का महानायक क्यों कहा जाता है,वो इस फिल्म में दत्तात्रेय की भूमिका को देख कर अहसास हो ही जाएगा, वैसे इस फिल्म में वह आपको लुभाते हैं, चौंकाते हैं, अचंभित करते हैं और आप उनकी भूमिका के प्रवाह में उनकी भावनात्मक अभिव्यक्ति के साथ खोते हुए रहते हैं. उन्होंने किरदार की नब्ज को इस सही अंदाज में पकड़ा है कि आप उस किरदार को अपने साथ महसूस करने लगते हैं. वहीं, तकरीबन 27 साल बाद ऋषि कपूर भी बिग बी के साथ पर्दे पर नजर आए हैं और उनके 75 वर्षीय बेटे बाबूलाल को वह बेहद सहजता और संयम से जी गए हैं. बाप-बेटे की यह जोड़ी आपको अपनी रिश्तेदारी या आस-पड़ोस के किसी दादा-चाचा से जोड़ देती है. दो बूढ़े पिता-पुत्र के बीच की चुटीली और मजेदार रस्साकशी आपको बांधे रखती है. अभिनय के मामले में तीसरे किरदार जिमित त्रिवेदी ने भी लाजवाब अभिनय किया है. उन्होंने कहीं भी यह महसूस नहीं होने दिया कि वह अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर जैसे दिग्गजों के साथ अभिनय कर रहे हैं.कुल मिला कर सभी ने अच्छा एक्टिंग किया है वैसे अमिताभ और ऋषि कपूर की एक्टिंग की बात ना ही करे तो अच्छा होगा, क्योँकि वो लाजवाब एक्टर हैं सभी जानते हैं , लेकिन साथी कलाकार ने भी अच्छा साथ दिया है. अमिताभ और ऋषि ने एक साथ काम करके फिर पुराने दिनों की याद ताजा करवा दी है.
अगर फिल्म के संगीत की बात करे तो संगीत हल्का-फुल्का है, संगीतकार सलीम-सुलेमान संगीत पक्ष को सबल बना सकते थे. ‘बच्चे की जान’ और ‘कुल्फी’ अपना रंग नहीं जमा पाए. जॉर्ज जोसफ का बैकग्राउंड स्कोर ठीक-ठाक रहा है.कुल मिला कर फिल्म परिवार के साथ देखा जा सकता है, या यूँ भी कह सकते हैं की बहुत दिनों के बाद कोई ऐसी फिल्म आयी है जो पूरी तरह परिवारिक है.
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