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Do adbhut Nayi choti motivational kahaniyan Hindi language me

1.
(संत व्यंकटेश ने बताया ईश्वर और इंसान का फर्क)
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एक बार संत व्यंकटेश अपने शिष्य के साथ बीहड़ वन से गुजर रहे थे। तभी उनके ध्यान का वक्त हुआ। वे दोनों ध्यान के लिए बैठे ही थे कि उनको एक शेर की गर्जना सुनाई दी। दोनों ने देखा कि शेर उनकी तरफ ही आ रहा है। शिष्य शेर को देखकर इतना घबरा गया कि वह जान बचाने के लिए एक पेड़ पर चढ़़ गया, किंतु संत व्यंकटेश खामोशी से ध्यान लगाते रहे। शेर वहां आया और चुपचाप आगे निकल गया।
शेर जब चला गया तो शिष्य पेड़ पर से उतरा और दोनों आगे बढ़े। थोड़ी देर बाद जब संत व्यंकटेश को मच्छर ने काटा तो उसको मानने के लिए उन्होंने अपने गाल पर चपत लगाई। यह देखकर शिष्य बोला, ‘गुरुदेव क्षमा करें मेरे मन में एक शंका है उसका समाधान करे। अभी थोड़ी देर पहले जब एक शेर आपके समीप आया तो आप बिलकुल नहीं घबराए, किंतु एक मच्छर के काटने पर आपको गुस्सा आ गया।’
संत व्यंकटेश ने जवाब दिया, ‘तुम ठीक कहते हो, लेकिन तुम भूल रहे हो, जब मैं ईश्वर के साथ में था। इसलिए मुझे डर नहीं लगा और न गुस्सा आया, जबकि मच्छर के काटते वक्त मैं एक इंसान के साथ था। यही वजह है कि जब शेर मेरे पास आया तो मुझे उसकी खबर तक नहीं हुई, जबकि मच्छर के काटने पर मैं बुरी तरह बौखला गया और उसको मारने के लिए मैने अपने ही गाल पर चपत लगा दी। ईश्वर और इंसान के साथ रहने में यही तो फर्क है। इंसान का साथ दुनियादारी सीखाता है, जबकि ईश्वर का साथ दुनिया से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। इसके बावजूद दुनिया में इंसानों की संगति करना पड़ती है। क्योंकि उसके बिना काम नहीं चल सकता है। इसलिए आदमी को ईश्वर की आराधना में समय बीताना चाहिए।

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(देशसेवा के लिए संत ने त्यागे गेरुआ वस्त्र)
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महात्मा गांधी के आश्रम में एक प्रसिद्ध संन्यासी आए। आश्रम के वातावरण, बापू के कार्यक्रम और उनके विचारों से वह संत बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने वहां ठहरने का निश्चय कर लिया। संत को आश्रम में मेहमान की तरह रखा गया। एक दिन संत बापू से मिले और प्रार्थना करते हुए बोले, ‘महात्मा गांधीजी मैं भी आपके आश्रम में रहकर अपना जीवन बिताना चाहता हूं। इस जीवन का सदुपयोग राष्ट्रहित में हो तो यह मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी।’
महात्मा गांधी ने उनकी बातें सुनकर कहा, ‘यह मेरे लिए बड़ी प्रसन्नता की बात है। आप जैसे विरक्त संत के लिए ही आश्रम होते हैं, किंतु यहां रहने से पहले आपको इन गेरुआ वस्त्रों का त्याग करना पड़ेगा।’ गांधीजी की बातें सुनकर संत को मन ही मन काफी क्रोध आया। अपने क्रोध पर संयम रखते हुए उन्होंने गांधीजी से कहा, ‘महात्माजी! यह कैसे हो सकता है, मैं संन्यासी जो हूं।’
‘आप अपने संन्यास को कभी न छोड़े, इसमें दिनोदिन प्रगति करें। मैने तो आपको गेरुए वस्त्र छोड़ने के लिए कहा है। उनको छोड़े बिना सेवा नहीं हो सकती है।’
बापू ने उनको समझाते हुए कहा स्वामीजी, ‘इन गेरुए वस्त्रों को देखते ही हमारे देशवासी इन वस्त्रों को पहनने वालों की ही सेवा पूजा शुरू कर देते हैं। इन वस्त्रों की वजह से लोग आपकी सेवा को स्वीकार नहीं करेंगे। जो वस्तु हमारे सेवाकाल में बाधा डाले उसको छोड़ देना चाहिए। फिर संन्यास तो मानसिक वस्तु है। पोशाक छोड़ने से संन्यास नहीं जाता है। गेरुए वस्त्र पहनने से आपको सेवा का अवसर कौन देगा?’ गांधीजी की बात सुनकर संत ने तुरंत वस्त्र त्याग दिए।
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