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राजपूत कैदी-Escaping prisoner a new short inspirational story in hindi language

राजपूत कैदी-Escaping prisoner a new short inspirational story in hindi language
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धर्म सिंह राजपुताना की सेना में एक अफसर था। एक दिन माता की पत्री आई कि मै बूढी हो चुकी हूँ ,मरने से पहले एक बार तुम्हे देखना चाहती हूँ . तुम्हारे वास्ते मैंने एक सुन्दर कन्या खोज राखी है पसंद आये तो उससे विवाह कर लेना। उसने सेनापति से छुट्टी । ली और घर के लिए चल पड़ा। उस समय राजपूतों और मरहठों में युद्ध चल रहा था। रास्ते में हमेशा भय बना रहता था। गरमी की रात थी। सिपाही बाहर आ गए और सबने सड़क की राह ली। धरमसिंघ घोड़े पर सव्वर होकर आगे चल रहा था। सोलह मील का सफर था। दोपहर हो चुका था पर रास्ता आधा भी नहीं कटा था। कभी गाडी का पहिया निकल जाता तो कभी घोड़ा ही अड़ जाता। धरमसिंघ ने सोचा ,घोड़ा मेरे पास है क्यों नहीं मै तेज़ निकल जाऊं ? वह यह सोच ही रहा था में बेदी डालकर कि चरण सिंह बन्दूक हाथ में लिए आया और बोला -आओ आगे चलें .बस बिछुड़ मत जाना। दोनों की बंदूकें भरी हुई थी दोनों चल दिए। डर था कि कहीं मरहठे उन्हें पकड़ ना लें। घोड़ा अभी पहाड़ी के छोटी पर पहुंचा भी नहीं था कि सौ कदम आगे तीस मरहठे दिखाई पड़े। वे उसकी तरफ लपके। धर्म सिंह बेतहाशा नीचे उतरा और चरण सिंह को पुकारने लगा। धरम सिंह को लगा कि बचने के आसार नहीं है। सामने मरहठा थे। आगे निकालो ,मरना अच्छा है कैद होना ठीक नहीं। पीछे से गोली चली धरम सिंह का घोड़ा घायल होकर गिर पड़ा। और उसके साथ ही वह भी गिर पड़ा। मरहठे ने उसकी मुस्कें कास ली और रुपये -पैसे सब छीन लिए मरहठे ने घोड़े के गर्दन पर तलवार चला दी और उसकी जीन उतार ली। धर्मसिंह को कैद कर लिया गया और जंगल की तरफ चल पड़े। वे एक घाटी के पास पहुंचे। उसे एक कोठरी में पावं में बेड़ी डालकर कैद कर कमरे में टाला लगा दिया। झरोखे से उसने देखा कि एक मरहठे का झोपड़ी है ,दो पेड़ हैं और द्वार पर एक काला कुत्ता बैठा है।
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तभी कमरा खुला। एक मरहठा शायद अपनी भाषा में कह रहा था कि बड़ा अच्छा राजपूत है। कुछ रोटी और पानी दिया गया और कोठरी का टाला बंद कर दिया गया . उसे कुछ देर बाद एक सावला पुरुष ने कहा -देखो राजपूत तुम्हे दयाराम ने पकड़ा है / और सम्पत रओ के हाथों बेच डाला है अब वही तुम्हारा स्वामी है। घर से रुपये मंगवा लो तीन हज़ार रुपये तुमको छोड़ दिया जाएगा। धरमसिंघ ने कहा -मैं तीन हज़ार नहीं दे सकता केवल पांच सौ दे सकता हूँ। पर मरहठे तीन हज़ार से काम पर तैयार नहीं था और उसपर कोड़े मारने की धमकी देने लगा। अंत में एक हज़ार की मांग की गई। मरहठों ने चरण सिंह और धरम सिंह को एक साथ कमरे में कैद कर रख दिया। एक महीना गुजर गया , एक दिन आंधी आई। गाँव की गलियों में नदियाँ बहने लगी। और एक अँधेरी रात में दोनों भाग चले।

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