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तज़ुर्बा-experience a new short funny and motivational story of the month

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कभी -कभी तज़ुर्बा हमारी गलतियों को कम कर देता है और हमें विशिष्ट श्रेणी में लाकर खड़ा कर देता है। एक बार की बात है एक विशाल समुद्री जहाज पर्यटकों को लेकर सफर पर निकला था कुछ समुद्री मील सफर के बाद अचानक जहाज का इंजन खराब गया। कप्तान और जहाज के इंजीनियर ने लाख कोशिश की जहाज के इंजन की खराबी को ठीक किया जाये पर वे उसे ठीक नहीं कर सके। लोग भयभीत हो गए ,पता नहीं अब क्या होगा। उन्हें भय सताने लगा। थक हारकर कप्तान ने बंदरगाह कार्यालय से संपर्क किया बंदरगाह से कुछ इंजीनियर को हेलीकाप्टर से भेजा गया। वे लोग इंजन की खराबी दूर करने में जूट गए। पर काफी मसक्कत के बाद भी इंजन की खराबी को दूर नहीं कर सके। यात्रियों के सब्र का बाँध टूटने लगा। कप्तान सोचने लगे कि अब क्या किया जाये ? तभी यात्रियों में से एक ने कहा -एक अमुक इंजीनियर है जो शायद खराबी को दूर कर सके। कप्तान ने अपनी सहमति देते हुवे उस इंजीनियर को बुला भेजने हेतु हेलीकाप्टर भेज दिया। कुछ देर बाद वह इंजीनियर आया और एक छोटा सा टूल बॉक्स लेकर खराब इंजन के पास गया। बांकी सभी इंजीनियर उसके पीछे खड़े थे। पहले तो नए इंजीनियर ने चारों तरफ से जांचा -परखा फिर चलते -चलते इंजन के पास एक जगह रूका। उसने एक स्क्रू ड्राइवर निकाला और एक जगह स्क्रू को टाइट किया और इंजन को स्टार्ट करने को कहा। वाह ,इंजन तो स्टार्ट हो गया। कप्तान के तो ख़ुशी का ठिकाना ना रहा। सबो ने पूछा कि आखिर उस इंजीनियर ने कौन सा स्क्रू टाइट किया ? कप्तान उस इंजीनियर से बहुत प्रभावित था। उसने बिल के बारे में पूछा। इंजीनियर ने कहा -‘दस हज़ार रुपये। कप्तान ने कहा -महज एक स्क्रू को टाइट करने के दस हज़ार रुपये ? इंजीनियर ने मुस्कराते हुए कहा -‘भाई मेरे ,स्क्रू टाइट करने का बिल केवल एक सौ रुपया है। बांकी के 9900 रुपये यह जानने के लिए है कि स्क्रू कहाँ टाइट करना है। कप्तान यह सुनकर सन्न रह गया। उसे उसके रुपये दे दिए गए। इसे कहते हैं तज़ुर्बे का कमाल। और चलते -चलते गुलज़ार की चार पंक्तियाँ -इस जमाने में वफ़ा की तलाश ना कर मेरे दोस्त ,वो वक़्त और था जब मकान कच्चे और लोग सच्चे हुआ करते थे। ‘
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