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दो नावों में पैर-four great new motivational stories in one post

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इसी उधेड़बुन में वह एक दिन जब सुबह सुबह टहलने जा रहे थे, सड़क पर एक सफाई करने वाली महिला, झाड़ू लगा रही थी. सुखी राम जी को भी सड़क पर चलते हुए देखकर महिला ने कहा, सेठ जी आप एक तरफ हो जाइए. बीच में रहेंगे तो आपके ऊपर धूल पड़ जाएगी. एक तरफ हो जाएंगे तो धूल से बचे रहेंगे.
महिला के इन शब्दों ने सेठजी की आंखें खोल दी. उन्हें भी महसूस होने लगा कि दो नावों में सवार होने वाले का कभी कल्याण नहीं होता है.
उन्होंने तुरंत दुकान की चाबी अपने बेटों को सौंपते हुए कहा:- मैंने इतने साल कमाने में बिता दिए हैं अब शेष जीवन कमाए हुए धन से लोगों की सेवा करना चाहता हूं और भगवान का भजन करना चाहता हूं.
यह सुनकर उनके बेटे को बुरा तो लगा, लेकिन परिवारजनों ने सुखीराम को सभी दायित्व से मुक्त कर दिया. सुखीराम भक्ति और सेवा में डूब चुके थे. कुछ ही समय में सुखीराम को लोग भगत सुखीराम के नाम से जानने लगे.

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2.
(बादशाह के खाली हाथ)

महमूद गजनवी ने हिंदुस्तान पर 17 बार आक्रमण किया और बहुत सारा धन दौलत, सोना-चांदी, हीरे जवाहरात लूटकर ले गया. वह एक तुर्क था और उसके पूर्वज मध्य एशिया से आए थे.
जब महमूद गजनवी की मौत का समय आया तो वह शक्तिशाली और जालिम बादशाह सोचने लगा:-“मेरे पास दुनिया की सारी ऐशो-आराम है
मैं जो चाहूं वह कर सकता हूं. मैंने दुनिया पर विजय प्राप्त की है और मेरा साम्राज्य चारों ओर फैला हुआ है. परंतु फिर भी मैं इतनी धन दौलत का क्या करूंगा? आखिर यह किस वक्त मेरे काम आएगी?”
उसने थोड़ी देर सोच कर सैनिकों को हुक्म दिया कि सारा माल निकाल कर बाहर सजा दिया जाए. जब सारा माल बाहर निकालकर सजाया गया तो कई मीलों तक फैल गया.
महमूद गजनवी कई घंटों तक सोने के सिक्कों, हीरो, मणियों और अनमोल हीरे जवाहरातों को देखता रहा.
यह सब देखकर वह रो पड़ा और बोला:-“इस सब दौलत को पाने के लिए मैंने करोड़ों बच्चे यतीम किए, लाखों औरतें विधवा की, लाखों बेगुनाह लोगों का कत्ल किया, लेकिन फिर भी यह दौलत आज मेरे साथ नहीं जा सकती.
उसने अपने सिपाहियों को हुक्म दिया कि जिस वक्त मेरी मृत्यु हो जाए तो मेरे दोनों हाथ कफन से बाहर निकाल देना ताकि दुनिया को यह पता चल जाए कि मैं इस दुनिया से खाली हाथ जा रहा हूं.

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3.

(एक चिड़िया का राजा को ज्ञान)

एक राजा के महल में एक सुंदर बगीचा था. बगीचे में अंगूर की बेल लगी हुई थी और उस बैल पर एक चिड़िया रोज आकर बैठती थी.
चिड़िया प्रतिदिन अंगूर की बेल से चुन-चुनकर मीठे अंगूर खाती थी और खट्टे अंगूर को नीचे गिरा देती थी. बगीचे के माली ने चिड़िया को पकड़ने की बहुत कोशिश की पर वह माली के हाथ नहीं आती थी.
माली ने राजा को यह बात सुनाई. यह सुनकर राजा ने चिड़िया को सबक सिखाने की ठान ली और अगले दिन बगीचे में घूमते हुए जब चिड़िया अंगूर खाने आई तो राजा ने उसे पकड़ लिया
वह चिड़िया को मारने लगा तो चिड़िया ने कहा, राजन, मुझे मत मारो मैं आपको ज्ञान की चार बातें बताऊं.
राजा ने कहा जल्दी बता. चिड़िया बोली,
पहली बात:- हाथ आए शत्रु को कभी नहीं छोड़ना चाहिए.
दूसरी बात:- असंभव बातों पर भूलकर भी विश्वास नहीं करना चाहिए.
तीसरी बात:- बीती हुई बातों पर कभी पश्चाताप नहीं करना चाहिए.
फिर चिड़िया अचानक रुक गई राजा ने कहा चौथी बात भी बता दो. चिड़िया बोली, चौथी बात जरा ध्यान से सुनने की है. मुझे जरा ढीला छोड़ दें क्योंकि आपके हाथों में मेरा दम घुट रहा है.
राजा ने हाथ ढीला छोड़ दिया तो चिड़िया एकदम से उड़कर पेड़ की डाल पर बैठ गई और बोली,
चौथी बात यह थी कि मेरे पेट में दो हीरे हैं.
यह सुनकर राजा को बड़ा दुख हुआ. राजा की हालत को देखकर चिड़िया बोली, है राजन, आपने मेरी बात नहीं मानी. मैं आपकी शत्रु थी फिर भी आपने मुझे छोड़ दिया. दूसरी बात में मैंने बताया था कि असंभव बातों पर भूलकर भी विश्वास नहीं करना चाहिए. मैंने आपसे कहा कि मेरे पेट में दो हीरे हैं और आपने भरोसा कर लिया.

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4.

(किसी व्यक्ति की महानता उसके चरित्र और ज्ञान पर निर्भर करती हैं पहनावे पर नहीं)

वैसे तो पंडित जी को वेदों और शास्त्रों का बहुत ज्ञान था लेकिन वह बहुत ग़रीब थे. ना ही रहने के लिए अच्छा घर था और ना ही अच्छे भोजन के लिए पैसे.
एक छोटी सी झोपड़ी थी, उसी में रहते थे और भिक्षा माँगकर जो मिल जाता उसी से अपना जीवन यापन करते थे.
एक बार वह पास के किसी गाँव में भिक्षा माँगने गये, उस समय उनके कपड़े बहुत गंदे थे और काफ़ी जगह से फट भी गये थे.
जब उन्होने एक घर का दरवाजा खटखटाया तो सामने से एक व्यक्ति बाहर आया, उसने जब पंडित को फटे चिथड़े कपड़ों में देखा तो उसका मन घ्रणा से भर गया और उसने पंडित को धक्के मारकर घर से निकाल दिया, बोला- पता नहीं कहाँ से गंदा पागल चला आया है.
पंडित दुखी मन से वापस चला आया, जब अपने घर वापस लौट रहा था तो किसी अमीर आदमी की नज़र पंडित के फटे कपड़ों पर पड़ी तो उसने दया दिखाई और पंडित को पहनने के लिए नये कपड़े दे दिए.
अगले दिन पंडित फिर से उसी गाँव में उसी व्यक्ति के पास भिक्षा माँगने गया. व्यक्ति ने नये कपड़ों में पंडित को देखा और हाथ जोड़कर पंडित को अंदर बुलाया और बड़े आदर के साथ थाली में बहुत सारे व्यंजन खाने को दिए. पंडित जी ने एक भी टुकड़ा अपने मुँह में नहीं डाला और सारा खाना धीरे धीरे अपने कपड़ों पर डालने लगे और बोले- ले खा और खा.
व्यक्ति ये सब बड़े आश्चर्य से देख रहा था, आख़िर उसने पूछ ही लिया कि- पंडित जी आप यह क्या कर रहे हैं सारा खाना अपने कपड़ों पर क्यूँ डाल रहे हैं.
पंडित जी ने बहुत शानदार उत्तर दिया- क्यूंकी तुमने ये खाना मुझे नहीं बल्कि इन कपड़ों को दिया है इसीलिए मैं ये खाना इन कपड़ों को ही खिला रहा हूँ, कल जब में गंदे कपड़ों में तुम्हारे घर आया तो तुमने धक्के मारकर घर से निकाल दिया और आज तुमने मुझे साफ और नये कपड़ों में देखकर अच्छा खाना पेश किया. असल में तुमने ये खाना मुझे नहीं, इन कपड़ों को ही दिया है, वह व्यक्ति यह सुनकर बहुत दुखी हुआ.
किसी व्यक्ति की महानता उसके चरित्र और ज्ञान पर निर्भर करती हैं पहनावे पर न. अच्छे कपड़े और गहने पहनने से इंसान महान नहीं बनता उसके लिए अच्छे कर्मों की ज़रूरत होती है. यही इस कहानी की प्रेरणा है.

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