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महबूब-Lover a new short inspirational Love story of maxim gorgy

महबूब -मैक्सिम गोर्की
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बात उन दिनों की है जब मैं एक टूटी -फूटी इमारत में किराए पर रहता था। बस किराया बहुत कम था। मेरे सामने वाले कमरे में एक लड़की रहती थी जिसको औरत कहना मुनासिब होगा। उसका नाम टेरेसा था। लाल बालो वाली लम्बी कद वाली टेरेसा में एक अजब कशिश थी। उसकी शख्सियत में नज़र आती मर्दानगी मेरे अंदर एक डर पैदा करती थी कभी -कभी सीढ़ियों पर उसने सामना हो जाता था। उसके बाल अक्सर खुले हुआ करते थे दो तीन बार मैंने उसे नशे की हालात में दरवाज़े केव पास खड़े देखा। आँखों में उदासी और होठों पर व्यंगात्मक मुस्कान। क्या ख़याल है मेहरबान शागिर्द ? एक असभ्य हंसी और यही हंसी मेरे दिल में नफ़रत पैदा कर देती। मैं इन सब से बचने के लिए कमरा बदलने को तैयार था। मेरे कमरे के बाहर जो हसीं नज़ारा दिखता था वह दूसरे कमरे से नहीं दिखता था इसी वजह से यह कमरा नहीं छोड़ना चाहता था। एक दिन टेरेसा तेज़ी से कमरे के भीतर दाखिल हुई और कहा -बादशाही बरकरार हो जनाब शागिर्द। क्या बात है ?मैं उठ कर बैठ गया। मैं एक निवेदन करने आई हूँ। वह कहने लगी -‘मैं एक खत भेजना चाहती हूँ। यानी एक खत लिखवाना चाहती हूँ। ‘ उसकी लहजे में गजब की नरमी थी। मैंने कहा -बैठो और लिखवाओ .’ किसके नाम लिखवाना है ? मेरे प्यारे बोरिस ,उसने कहना शुरू किया। मेरी जान ,मेरे मेहबूब ,मेरी जान तुममे अटकी है। तुमने बहुत दिनों से कोई स्नेह भरा सन्देश नहीं भेजा है क्या तुम्हे अपनी नन्ही उदास कबूतरी की याद नहीं आती ? फकत तुम्हारी टेरेसा। मुझे अंदर ही अंदर हंसी आ रही थी। नन्ही उदास कबूतरी 6 फ़ीट ऐसी कबूतरी जिसका घोंसला पेड़ों की वजय किसी घर की चिमनी में हो ? यह बोरिस कौन है ? मैंने पूछा। एक नौजवान। ‘ हाँ तुम हैरान क्यों हो ? क्या मुझ जैसी लड़की के लिए कोई नौजवान मेहबूब नहीं हो सकता ? मैं हैरान था वह खुद को लड़की कहने पर तुली हुई थी हाँ कोई नौजवान तुम्हारा मेहबूब क्यों नहीं हो सकता ? वह फिर चली गई। दो हप्ते बाद वह एकाएक कमरे में दाखिल हुई और बोली -‘मेहरबान शागिर्द , अगर कोई व्यस्तता नहीं हो तो तुम एक और खत लिख कर दो आवाज़ में वही नरमी थी। बोरिस के नाम ? नहीं इस बार का खत उनकी तरफ से है। क्या ? मैं तो हैरत की मुद्रा में था। यह खत मेरे लिए नहीं है। मेरे एक दोस्त की तरफ से है। उसकी भी मेरे जैसी एक मेहबूबा है उसे खत लिखवा कर भेजना है क्या तुम उस दूसरी टेरेसा के नाम खत लिख डोज ? उसके हाथ काँप रहे थे। सुनो मैडम ,यह क्या चक्कर है ? आप मुझे हकीकत नहीं बता रही हो। मुझे गुमान हो रहा है कि यह बोरिस और टेरेसा कही भी नहीं है। मुझे इस गोरखधंधे से दूर ही रखे . मेरी बात सुनकर वह भयभीत हो गई। मेहरबान शागिर्द , फिर वह अचानक खामोश हो गई और कमरे से बाहर निकल गई। वह बहुत गुस्से में थी। उसे मनाकर अपने कमरे में लाया सुनो -मेरी आवाज सुनते ही उसकी आँखे लाल हो गई। वह तेज़ी से मेरी तरफ मुड़ी और मेरे कंधे पर हाथ रखकर दर्द भरे स्वर में कहा – बोरिस और टेरेसा कहाँ रहें कैसे रहें तुम्हे भला क्या फर्क पड़ता है क्या कागज पर कलम चलना तुम्हारे लिए मुश्किल काम है ? माफ़ करना ,यह सब क्या है ?
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तुम्हारा मतलब कोई बोरिस और टेरेसा नहीं है ? टेरेसा तो मैं हूँ। वह एक कागज़ का टुकड़ा लेकर आई। अगर खत लिखना इतना कठिन काम है तो यह लो -कहकर उस कागज़ के टुकड़े को मेरे मुंह पर दे मारा। यह वही खत है जो तुमने बोरिस के नाम लिखा था ,अब मैं किसी दूसरे से लिखवा लुंगी . मैं उसकी तरफ देखता रह गया। तुमने खत भेजा नहीं टेरेसा ? कोई बोरिस नहीं है -उसने कहा। पर मैं चाहती हूँ कि वह रहे। अगर वह इस दुनिया में नहीं है तो इससे क्या फर्क पड़ता है ? जब मैं उसके नाम खत लिखवाती हूँ तो मुझे लगता है कि वह कहीं मौजूद है। मैं एक खत उसकी तरफ से लिखवाती हूँ और उसका जवाब भी लिखवाती हूँ। उसकी आँखों से अविरल अश्रु बह रहे थे। मैं गर्दन झुकाये खड़ा रहा जैसे कोई गुनहगार अदालत में खड़ा रहता है। और मैंने आँखों में भर आये अंशु को रोकने की कोशिश भी नहीं की

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