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परिवर्तन-new awesome and beautiful hindi story about Change

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“मम्मी आख़िर आपको हो क्या गया है? ज़रा-ज़रा-सी बात का बतंगड़ बना देती हो.” अविका भुनभुनाती हुई अपने कमरे में चली गई और ज्ञान गहरी सांस लेकर अख़बार बगल में रखकर टहलने चले गए. विशाल अपनी गर्दन यूं हिलाते चला गया, मानो कह रहा हो कि मम्मी आपसे तो बात करना ही बेकार है. तृप्ति अकेली बैठी सोचती रही कि आख़िर छोटी-सी बात को इतना तूल उसने दिया ही क्यों? अच्छे-ख़ासे बैठे सब हंस-बोल रहे थे
अविका और विशाल अपने कॉलेज के दोस्तों के अजीबो-ग़रीब क़िस्से सुनाने लगे कि कैसे अविका की सहेली ने अपने बॉयफ्रेंड को बेवकूफ़ बनाकर उससे सभी को पार्टी दिलवाई और ख़र्चा करवाया. तृप्ति अच्छी-ख़ासी बैठी क़िस्सा सुन रही थी कि अचानक आज की पीढ़ी पर कटाक्ष और उनके तौर-तरीक़ों पर अपनी आपत्ति ज़ाहिर करने लगी. मज़ाक-मज़ाक में बात बढ़ गई और तृप्ति अपनी नैतिकता भरी बातों का बोझ उन पर डालने लगी.
तृप्ति देर तक बैठी सोचती रही कि आख़िर क्यों वो रोज़ अपने बच्चों से यूं उलझ पड़ती है? पर क्या करे वह भी, बड़े होते बच्चों की ग़लत बातों का समर्थन तो नहीं कर सकती? पहले बच्चे अपनी हर बात उसे बताते थे और वो भी कितने प्यार से उन्हें समझा देती थी, पर अब पता नहीं उसका धैर्य कहां चला गया है? हर समय अविका और विशाल की चिंता होती है. उम्र भी ऐसी है, कहीं कोई ऊंच-नीच हो गई तो कौन ज़िम्मेदार होगा?
शाम को डिनर टेबल पर भी सब चुपचाप खाना खा रहे थे. सबकी चुप्पी उसे अखर रही थी. तभी फ़ोन की घनघनाहट ने शांति भंग कर दी. अविका फ़ोन पर चहक रही थी. “अरे, वाह नानी! बड़ा मज़ा आएगा, मेरे जन्मदिन पर आप आ रही हैं. अभी सबको बताती हूं. मम्मी-पापा नानी आ रही हैं परसों.” तृप्ति ने अविका से रिसीवर ले लिया और अपनी मां से बतियाने लगी.
माहौल बदल चुका था. अविका तथा विशाल नानी के आने की तैयारी में लग चुके थे. “नानी मेरे कमरे में सोएगी.”
“नहीं-नहीं मेरे.”
“अच्छा! चल तू अपना बिस्तर नीचे लगा लेना.” अविका विशाल से कह रही थी. तृप्ति की आंखों में नींद नहीं थी. कितना अच्छा लगेगा! मां के आने की ख़बर से वह एक अजीब से सुकून से घिर गई. दूसरे दिन भोर में ही आंखें स्वतः खुल गईं. शरीर में स्फूर्ति थी, वरना और दिन होता, तो शारीरिक शिथिलता उसके चेहरे पर बनी रहती. विश्‍वास नहीं होता कि जब बच्चे छोटे थे, तो वो कैसे उनकी अलग-अलग फ़रमाइश पर थिरकती रहती थी. दोनों की अलग-अलग पसंद के टिफिन, ज्ञान का हमेशा सादा नाश्ता, तीन फ़रमाइशों पर रसोई में काम होता था. बड़े होते बच्चों के साथ, धीरे-धीरे थकान कब सिर उठाने लगी, उसे पता ही न चला.
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अविका कभी-कभी मदद करने की कोशिश भी करती, तो उसके काम करने का रवैया तृप्ति को पसंद नहीं आता. उसकी टोका-टोकी से आहत अविका रसोई से बाहर आ जाती और तृप्ति झुंझलाती हुई किसी तरह काम निपटाती, लेकिन आज मां के आने की ख़बर ने मानो शरीर में ऊर्जा का संचार कर दिया हो. घर की नए सिरे से चाक-चौबंद व्यवस्था हो चुकी थी. मां को क्या-क्या पसंद है, इसकी सूची मन-ही-मन बन चुकी थी. मम्मी का मूड अच्छा देख अविका पूछ बैठी, “मम्मी, इस बार मैं अपना बर्थडे बाहर सेलिब्रेट कर लूं.”
“नहीं अविका, हम घर में ही करेंगे. प्लीज़, अपनी ज़रा ढंग की सहेलियों को बुलाना. इस बार नानी भी होंगी, तो थोड़ा ध्यान रखना.”
“मम्मी, मेरी सभी सहेलियां ढंग की ही हैं. आपको ही पता नहीं क्यों उनसे प्रॉब्लम होती है?” कहती हुई अविका वहां से चली गई. दूसरे दिन का नज़ारा रोज़ से अलग था. नानी के घर आने से घर में रौनक थी. दोनों बच्चे उन्हें घेरे बैठे थे.
“नानी, ये देखो हम लोग पिकनिक पर गए थे. ये मेरी सहेली नताशा कितनी स्मार्ट है न!”
“अरे, मुझे तो सबसे ज़ोरदार मेरी पोती लग रही है, पर ये बता तू यह पहन के क्या गई है पिकनिक पर, सलवार-सूट? तुझ पर तो जींस जंचती है.” सुनकर अविका ने कटाक्ष भरे नज़रों से अपनी मम्मी को देखा. उसे याद आया उस दिन उसने जींस के ऊपर कसा हुआ टॉप पहना, तो तृप्ति ने उसके ड्रेस सेंस को लेकर कितना भाषण दिया था. आहत अविका ने ग़ुस्से में सलवार-कुर्ता पहना और पिकनिक पर चली गई.
तभी तृप्ति ने पूछा, “मां, आज डिनर में क्या बनाऊं?” अविका और विशाल तुरंत बोल पड़े, “नूडल्स.” तो तृप्ति ने आंखें तरेर दीं.
“ठीक तो है तृप्ति, आज दोपहर का खाना इतनी देर से खाया है. ज़्यादा भूख भी नहीं. ऐसा कर नूडल्स बना ले. थोड़ी-थोड़ी सब खा लेंगे और गप्पे मारेंगे.”
“नानी, नूडल्स?” बच्चे आश्‍चर्य से बोल उठे, तो शारदाजी हंस पड़ीं. “तुम्हारे नाना को बहुत पसंद है. ह़फ़्ते में एक दिन तो ज़रूर बनाती हूं मैं.”
“क्या मां, आप भी…!”
“और क्या, नूडल्स के विज्ञापन में पता नहीं क्यों स़िर्फ बच्चे दिखाते हैं.” अविका व विशाल हंस पड़े. उन्हें ख़ूब मज़ा आया शारदाजी की बातों में.
“अविका, किसे-किसे बुला रही है अपने जन्मदिन पर?” अविका कुछ कहती इससे पहले तृप्ति मां से पूछ बैठी,“क्या-क्या बनाऊं उस दिन?”
“तृप्ति घर में इतना झंझट क्यों कर रही हो. होटल वगैरह में कर लो. व्यर्थ की भागदौड़ से बच जाओगी.” सुनते ही अविका उछल पड़ी. शारदाजी ने जन्मदिन की ज़िम्मेदारी विशाल और अविका को एक निश्‍चित बजट के साथ सौंप दी, जिसे दोनों ने बख़ूबी निभाया.
शाम को तृप्ति ने मां की दी हुई नीली साड़ी बड़े मनोयोग से पहनी, तो सभी ने दिल खोलकर तारीफ़ की. सभी ख़ुश थे. अविका का जन्मदिन ख़ुशी-ख़ुशी निपट गया. शारदाजी उसके सभी दोस्तों से गर्मजोशी से मिलीं. आज तृप्ति को भी कहीं कोई कमी नज़र नहीं आई. कितनी प्यारी तो हैं इसकी सहेलियां. वो सोचने लगी. इसी तरह हंसी-ख़ुशी एक ह़फ़्ता कैसे बीत गया कुछ पता ही नहीं चला. शारदाजी के वापस जाने को दो दिन ही शेष रह गए थे. मां के जाने की कसक तृप्ति के चेहरे पर झलकने लगी थी. इन दिनों बेटी के भीतर पलती कशमकश को शारदाजी की अनुभवी आंखों ने पढ़ लिया था. ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबी बेटी की शंका-आशंकाओं को वह भांप गई थीं.
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आख़िर इन बेचैनी भरे दिनों से वो भी तो दो-चार हुई थीं. जब तृप्ति तेज़ी से बढ़ रही थी और बेटा तरुण अपने करियर के जद्दोज़ेहद में लगा था, उस समय शारदाजी भी तो शारीरिक व मानसिक परिवर्तन की प्रक्रिया से गुज़र रही थीं. उम्र का यह दौर कितना मुश्किल होता है. आज तृप्ति उसी उम्र के दौर में है. उसकी शारीरिक थकान और मानसिक उद्वेलन का आकलन वो मां होने के नाते भली-भांति कर सकती हैं.
दूसरे दिन शारदाजी ने अविका के हाथों का बना खाना खाने की इच्छा ज़ाहिर की. अविका उत्साहित थी, लेकिन तृप्ति परेशान-सी नज़र आने लगी, तो मां ने प्यार से उसका हाथ पकड़कर अपने पास बिठा लिया. “क्यों चिंता करती है? वो कर लेगी सब.” “मम्मी, सच में मैं सब अच्छे से करूंगी और आपकी रसोई भी साफ़ रखूंगी. आप बस मेरा काम होने तक आना मत.”
“तृप्ति, उस पर भरोसा करो. आज ये जो भी और जैसा भी बनाएगी, हम सब खाएंगे और तारीफ़ भी करेंगे. क्यों अविका?” दुविधा में पड़ी तृप्ति मां के पास बैठ गई. तभी शारदाजी के स्नेहभरे स्पर्श ने उसे अंदर तक भिगो दिया. “मेरी बिटिया, कुछ परेशान और थकी-थकी-सी लगती है.” मां की बात पर तृप्ति हंसते हुए बोली, “तुम्हारी बेटी अब बड़ी हो गई है.” धीरे-धीरे तृप्ति अंतर्मन की गहराइयों में दबी अपनी आशंकाओं को मां के साथ साझा करने लगी. बातों बातों में तृप्ति ने अपने मन की बात बताई. “मां, अविका और विशाल की चिंता लगी रहती है. ज़माना कितना बदल गया है. उनकी सोच हमेशा सकारात्मक दिशा में बढ़े, बस, इतना ही चाहती हूं.”
“देख तृप्ति, हर पुरानी पीढ़ी आनेवाले नए युग के तेज़ ऱफ़्तार से आशंकित रहती है और नई पीढ़ी के क़दम उस ऱफ़्तार के साथ तालमेल बिठा ही लेते हैं. इसमें कुछ नया नहीं है. उम्र के इस दौर से सब गुज़रते हैं. तेरा बात-बात पर बेवजह चिंता करना, झुंझलाना अपनी समझ पर बच्चों का यूं अतिक्रमण करना, तुझे कितना परेशान कर देता होगा, ये समझती हूं मैं, पर देख अब बच्चे छोटे नहीं रह गए. बड़े हो रहे हैं. उनका अपना अनुभव और समझ उनमें पनपने दे.
जहां तक मैंने देखा है, दोनों समझदार हैं. अब उन पर ज़बरदस्ती अपनी मर्ज़ी थोपना ठीक नहीं है. बच्चों को हमेशा बड़ों की तरह टोकोगी, तो वो तुमसे दूर होते जाएंगे. ये उम्र तो उन्हें अपना दोस्त बनाने की है, तभी वे अपनी बातें और समस्याएं तुमसे शेयर करेंगे, वरना बात-बात पर टोके जाने के डर से वे तुम्हें कुछ नहीं बताएंगे. बच्चों का उचित मार्गदर्शन करो, पर इतनी दख़लअंदाज़ी भी मत करो कि वे तुम्हें अपना सबसे बड़ा आलोचक मानकर दूर हो जाएं. परिपक्व होते बच्चों की सोच और तौर-तरीक़ों में परिवर्तन तो आएगा ही और ये अनवरत् चलता भी रहेगा.
तुम्हीं सोचो उम्र के साथ-साथ तुम्हारी सोच में भी कितना परिवर्तन आ चुका है. अपने और बच्चों के बीच अविश्‍वास की दीवार तोड़ो. उनकी बात शांतिपूर्वक सुनो और अपना फैसला तुरंत मत सुनाओ. तुम्हारे बच्चे उम्र की उस दहलीज़ पर हैं, जिसमें वे अपने लिए कुछ आज़ादी चाहते हैं. उन्हें अभिव्यक्ति का अवसर दो. अपने ऊपर चढ़ा बड़प्पन का लबादा उतारकर उनके साथ कभी-कभी ठहाके भी लगाओ. तुम्हारा बचपना जब बाहर आएगा, तो वे दोस्तों की तरह तुम्हारे क़रीब आएंगे.” वातावरण गंभीर हो गया था कि तभी मां विषय को बदलने के अंदाज़ में पूछ बैठीं, “अब ज़रा ये बताओ कि अपने शरीर का क्या हाल कर डाला है. कितना वज़न बढ़ गया है मालूम भी है तुम्हें.” झेंपती हुई तृप्ति बोली, “मां, उम्र के साथ थोड़ा परिवर्तन तो आएगा ही.”
“देखो बिटिया, स्त्री का शरीर तो बना ही परिवर्तन के लिए है, पर जितना अपने मन और तन को नियमों से बांधोगी, उतनी ही आसानी से इस बदलाव को स्वीकार कर पाओगी. मैं और तुम्हारे पापा अभी भी कुछ दूर तक सैर को ज़रूर जाते हैं, तो तुम भी प्राणायाम और कुछ नियमित व्यायाम ज़रूर करो. अगर दिनभर का कुछ समय अपने लिए नहीं निकाला, तो क्या फ़ायदा. रचनात्मक कार्यों में स्वयं को व्यस्त रखो. बच्चों को सिखाने की चिंता के साथ ख़ुद भी कुछ नया करने का ज़ज़्बा पैदा करो, तब देखो तुम्हारा नज़रिया कैसे बदलता है. परिस्थितियों को विषम हम बना देते हैं, जबकि वो इतनी जटिल नहीं होती हैं. जिस दिन तुम्हारे सोचने-विचारने का नज़रिया बदला, समझो आधी कठिनाइयां टल गईं. इस समय ज्ञान को भी उसके हिस्से का समय दो.” मां की बातें उसके मन की गांठों को एक-एक कर सुलझाती गईं. अपनी ओर कृतज्ञता से देखती तृप्ति को मां ने गले लगा लिया. तभी अविका ने ऐलान कर दिया कि खाना तैयार है.
तृप्ति तेज़ क़दमों से रसोई की ओर चल दी, वहां पहुंचकर आश्‍चर्यचकित रह गई. कितना कुछ बनाया था अविका ने. ज्ञान और विशाल पहले से ही वहां मौजूद थे. साफ़-सुथरी रसोई देखकर लगा ही नहीं कि यहां अविका ने खाना बनाया है. संशय में पड़ी तृप्ति ने ज्यों ही कौर मुंह में डाला, तो उसकी नज़र अविका पर पड़ी, जो उत्सुक निगाहों से मां के चेहरे के हाव-भाव पढ़ रही थी. तृप्ति ने इशारे से उसे बुलाया, फिर प्यार से अपनी बांहों में भरकर ढेर सारी अनकही प्रशंसा उसे पारितोषिक के रूप में दे दी.
शारदाजी तो पहले ही अपनी नातिन के प्रति आश्‍वस्त थीं. इधर ज्ञान और विशाल तारीफ़ों के पुल बांध रहे थे. तृप्ति के चेहरे की ख़ुशी प्रशंसा, भरोसा और विस्मय के मिले-जुले भाव अविका को उल्लास से भर गए. तृप्ति आह्लादित थी. आज उसे अविका का एक अलग रूप दिखा या शायद उसके स्वयं के बदले नज़रिए से बहुत कुछ परिवर्तित हो गया था.
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