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भगवान श्री राम कैसे इस लोक को छोड़कर वापस विष्णुलोक कैसे गए-new devotional story in hindi

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1.

(भगवान श्री राम कैसे इस लोक को छोड़कर वापस विष्णुलोक कैसे गए)

भगवान श्री राम कैसे इस लोक को छोड़कर वापस विष्णुलोक गए। भगवान श्री राम के मृत्यु वरण में सबसे बड़ी बाधा उनके प्रिय भक्त हनुमान थे। क्योंकि हनुमान के होते हुए यम की इतनी हिम्मत नहीं थी की वो राम के पास पहुँच चुके। पर स्वयं श्री राम से इसका हल निकाला। आइये जानते है कैसे श्री राम ने इस समस्या का हल निकाला। एक दिन, राम जान गए कि उनकी मृत्यु का समय हो गया था। वह जानते थे कि जो जन्म लेता है उसे मरना पड़ता है। “यम को मुझ तक आने दो। मेरे लिए वैकुंठ, मेरे स्वर्गिक धाम जाने का समय आ गया है”, उन्होंने कहा। लेकिन मृत्यु के देवता यम अयोध्या में घुसने से डरते थे क्योंकि उनको राम के परम भक्त और उनके महल के मुख्य प्रहरी हनुमान से भय लगता था।
यम के प्रवेश के लिए हनुमान को हटाना जरुरी था। इसलिए राम ने अपनी अंगूठी को महल के फर्श के एक छेद में से गिरा दिया और हनुमान से इसे खोजकर लाने के लिए कहा। हनुमान ने स्वंय का स्वरुप छोटा करते हुए बिलकुल भंवरे जैसा आकार बना लिया और केवल उस अंगूठी को ढूढंने के लिए छेद में प्रवेश कर गए, वह छेद केवल छेद नहीं था बल्कि एक सुरंग का रास्ता था जो सांपों के नगर नाग लोक तक जाता था। हनुमान नागों के राजा वासुकी से मिले और अपने आने का कारण बताया। वासुकी हनुमान को नाग लोक के मध्य में ले गए जहां अंगूठियों का पहाड़ जैसा ढेर लगा हुआ था! “यहां आपको राम की अंगूठी अवश्य ही मिल जाएगी” वासुकी ने कहा। हनुमान सोच में पड़ गए कि वो कैसे उसे ढूंढ पाएंगे क्योंकि ये तो भूसे में सुई ढूंढने जैसा था। लेकिन सौभाग्य से, जो पहली अंगूठी उन्होंने उठाई वो राम की अंगूठी थी। आश्चर्यजनक रुप से, दूसरी भी अंगूठी जो उन्होंने उठाई वो भी राम की ही अंगूठी थी। वास्तव में वो सारी अंगूठी जो उस ढेर में थीं, सब एक ही जैसी थी। “इसका क्या मतलब है?” वह सोच में पड़ गए।
वासुकी मुस्कुराए और बाले, “जिस संसार में हम रहते है, वो सृष्टि व विनाश के चक्र से गुजरती है। इस संसार के प्रत्येक सृष्टि चक्र को एक कल्प कहा जाता है। हर कल्प के चार युग या चार भाग होते हैं। दूसरे भाग या त्रेता युग में, राम अयोध्या में जन्म लेते हैं। एक वानर इस अंगूठी का पीछा करता है और पृथ्वी पर राम मृत्यु को प्राप्त होते हैं। इसलिए यह सैकड़ो हजारों कल्पों से चली आ रही अंगूठियों का ढेर है। सभी अंगूठियां वास्तविक हैं। अंगूठियां गिरती रहीं और इनका ढेर बड़ा होता रहा। भविष्य के रामों की अंगूठियों के लिए भी यहां काफी जगह है”।
हनुमान जान गए कि उनका नाग लोक में प्रवेश और अंगूठियों के पर्वत से साक्षात, कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। यह राम का उनको समझाने का मार्ग था कि मृत्यु को आने से रोका नहीं जा सकेगा। राम मृत्यु को प्राप्त होंगे। संसार समाप्त होगा। लेकिन हमेशा की तरह, संसार पुनः बनता है और राम भी पुनः जन्म लेंगे.

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2.
(मान कुँवरी जी की भगती और श्री मदनमोहन जी की कथा)

एक सेठ की बेटी मान कुँवरी दस वर्ष की अवस्था में विधवा हो गई। थोड़े ही दिनों के पश्चात् श्रीगुसांईजी गुजरात पधारे तो इस मान कुँवरी को ब्रह्म सम्बंध कराया इसके यहां श्रीमदनमोहनजी की सेवा पधराई । यह श्रीठाकुरजी की सेवा करने लगी । इस बाई ने श्रीमदनमोहनजी की जीवन पर्यन्त सेवा की । इसने श्रीमदनमोहन जी के स्वरूप के अलावा अन्य किसी स्वरूप के दर्शन भी नहीं किए । यह सेवा छोड़कर कभी घर से बाहर भी नहीं गई । जैसे श्रीमदनमोहनजी है वैसे सभी के यहाँ श्रीठाकुरजी का स्वरूप होगा,यह मन में निश्चय करके रखती थी| जब मानकुँवरी साठ वर्ष की हुई तो इसके पिता का देवलोक हो गया । अत: वह मनुष्य रखकर सेवा करने लगी । एक दिन एक विरक्त वैष्णव उस गाँव में आया।
शीतकाल का समय था । मानकुँवरी के घर आकर ठहरा था| उसने अपने श्रीठाकुरजी की झाँँपी मानकुँवरी को दी और स्वयं तालाब पर स्नान करने चला गया । मानकुँवर बाई ने श्रीठाकुरजी को जगाया,उसकी झाँँपी में श्रीठाकुरजी बालकृष्णजी थे । उस बाई ने श्रीमदनमोहनजी के अलावा अन्य किसी भी स्वरूप के दर्शन नहीं किये थे । वह विचार करने लगी । कि ठण्ड के कारण श्रीठाकुरजी सिकुड़ गए है, ठण्ड बहुत पड़ती है| इस वैष्णव ने श्रीठाकुरजी के लिए ठण्ड का कोई उपचार नहीं रखा है । उस बाई के नेत्रों से जल प्रवाहित होने लगा । उसके मन में बहुत ताप हुआ,वह अंगठी लेकर बैठ गई । तेल में अनेक प्रकार की गरम औषध डालकर तेल को गर्म किया और सुहाते – सुहाते तेल से श्रीठाकुरजी के हाथ पैर मींढने लगी । उसने समजा श्रीठाकुरजी को बहुत श्रम हुआ है।
उसने श्रम के लिए श्रीठाकुरजी से क्षमा याचना की । उसकी प्रार्थना सुनकर तथा उसके शुद्धभाव को देखकर श्रीबालकृष्ण भगवान श्रीमदनमोहनजी के स्वरूप में हो गए । डोकरी बाई बहुत प्रसन्न हुई । डोकरी ने रसोई करके भोग रखा,उस वैष्णव ने आकर दर्शन किए । श्रीठाकुरजी को शीत के उपचार के रूप में रजाई ओढा रखी थी अत: वह वैष्णव समज बहिन सका कि यह कौन से श्रीठाकुरजी हैं वह वैष्णव वहाँ दस-पन्द्रह दिन रहा । वह जाने लगा तो बाई ने आग्रह किया कि शीत पड़ रही है श्रीठाकुरजी को श्रम होता है अत: शीतकाल यहीं व्यतीत करो । फाल्गुन में चले जाना।
उसने अपने श्रीठाकुरजी की जांपी को सँभाला । श्रीबालकृष्ण के स्थान पर श्रीमदनमोहनजी के स्वरूप को देखकर वैष्णव ने मान कुँवरी बाई से जगडा किया, वह बोला – “तुमने मेरे श्रीठाकुरजी को बदल लिया है ।” मानकुँवर ने बहुत समजाया । अन्तत:जगडा श्रीगोकुल तक पहुँचा । दोनों जने श्रीगोकुल में श्रीगुसांईजी के समक्ष उपस्थित हुए । श्रीगुसांईजी ने दोनों की बातें सुनी । श्रीगुसांईजी ने जांपी लेकर श्रीठाकुरजी को देखा । श्रीठाकुरजी ने श्रीगुसांईजी से कहा – “मैं डोकरी के भाव के कारण बालकृष्ण से मदन मोहन हुआ हूँ ।”
इस डोकरी ने मेरे मदन मोहन स्वरूप के अलावा अन्य किसी स्वरूप के दर्शन ही नहीं किए हैं अत: इसके भाव में कोई विक्षेप न हो, मैं श्रीमदनमोहन के स्वरूप में अवस्थित हूँ । श्रीगुसांईजी ने उनका झगडा निपटा दिया| उन्होंने कहा – ” ये ही तेरे श्रीठाकुरजी हैं ।” डोकरी ने उससे कहा – ” तू श्रीठाकुरजी को ठण्ड मारता है, ऐसे लोगों को श्रीठाकुरजी पधरा कर नहीं दिये जाने चाहिए।” श्रीगुसांईजी डोकरी के शुद्ध भाव को देखकर हँसने लगे । वह वैष्णव उस डोकरी के पैरों में पड़ गया। उसने कहा – ” मैं अब कहीं नहीं जाऊँगा,तुम्हारे यहाँ टहल करूँगा ।” वह मानकुँवरीबाई श्रीयमुनाजी का जल पान करके श्रीनाथजी के दर्शन करने गई । श्रीनाथजी के दर्शन करके अपने देश में जाकर श्रीठाकुरजी की सेवा करने लगी । वह मानकुँवर श्रीगुसांईजी की इसी कृपा पात्र थी।

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