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New Three hindi inspirational stories of ancient times

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1
(जब जादूगर ने संत को बताया इबादत का मतलब)

संत अबू हफस हदद बेनागा इबादत करते थे। एक दिन जादूगर के करतबों से आकर्षित होकर उन्होंने उससे जादू सीखने की जिद की। जादूगर ने उनसे पूछा कि क्या वह अल्लाह की इबादत करते हैं। उनके द्वारा हां कहने पर जादूगर बोला, ‘देखो जी जादू और इबादत का मेल नहीं बैठता है। अगर जादू सीखना है तो इबादत बंद करना होगी। जादू सीखने की ठान ही ली है तो चालीस दिन तक इबादत मत करो और फिर मेरे पास आओ।’
संत अबू ने निश्चय कर लिया था कि जादू सीखना है इसलिए जादूगर के कहे मुताबिक उन्होंने 40 दिनों तक इबादत बिल्कुल नहीं की और उसके बाद जादूगर के पास गए। जादूगर उनको करतब सीखा रहा था, लेकिन वह उनको सीख नहीं पा रहे थे।
तब जादूगर ने उनसे कहा, ‘शायद तुमने मेरा कहना नहीं माना और इस दौरान इबादत करते रहे।’ अबू द्वारा इंकार करने पर जादूगर बोला, ‘फिर तुमने जरूर कोई नेक काम किया होगा।’ संत ने पहले तो ना किया फिर उनको याद आया और वो बोले, ‘हां’ जब मैं इधर आ रहा था तो रास्ते में मुझे बहुत से पत्थर पड़े मिले। मैने सोचा किसी को ठोकर लग सकती है इसलिए उनको सड़क से उठाकर एक तरफ कर दिया था। शायद यही नेक काम हो सकता है।’
जादूगर ने सुना तो हंसकर बोला ‘तुम कितने मूर्ख हो जिस खुदा ने जन्म दिया उसको ही भूल गए। जिसकी तुम रोज इबादत करते थे, केवल इल्म सीखने के लिए तुमने उससे मुंह फेर लिया और अब वह भी हासिल करना चाहते हो। अरे सबसे बढ़ा जादूगर तो वही है। उसके आगे सारे जादू बेअसर हो जाते हैं।’ इन शब्दों ने अबू पर असर किया। उन्हे खेद हुआ कि उन्होंने सचमुच तुच्छ जादू के लिए खुद को भुलाने की चेष्टा की। उन्होंने कसम खाई कि उससे अब कभी मुंह नही मोड़ेंगे।

2.
(शिवाजी ने एक नारी का ऐसे किया था सम्मान)
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छत्रपति शिवाजी महाराज जितने तलवार के धनी थे उतने ही वह चरित्र के भी धनी थे। अपने चरित्र और तलवार को उन्होंने कभी दागदार नहीं होने दिया। एक बार शिवाजी के वीर सेनापति ने कल्याण का किला जीता। हथियारों के जखीरे के साथ उनके हाथ अकूत संपत्ति भी लगी। एक सैनिक ने मुगल किलेदार की बहू को, जो दिखने में काफी सुंदर थी, उसके सामने पेश किया। वह सेनापति उस नवयौवना के सौंदर्य पर मुग्ध हो गया। सेनापति ने शिवाजी महाराज को बतौर नजराना उस महिला को भेंट करने की ठानी।

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सेनापति उस नवयौवना को एक पालकी में बिठाकर शिवाजी महाराज के दरबार में पहुंचा। शिवाजी उस समय अपने सेनापतियों ते साथ शासन-व्यवस्था के संबंध में विचार-विमर्श कर रहे थे। युद्ध में जीतकर आए सेनापति ने शिवाजी को प्रणाम किया और कहा कि महाराज वह कल्याण से जीतकर लाई गई एक चीज को आपको भेंट करना चाहता है। यह कहकर उसने एक पालकी की ओर इंगित किया।
शिवाजी ने ज्यों ही पालकी का पर्दा उठाया तो देखा की उसमें एक सुंदर मुगल नवयौवना बैठी हुई है। शिवाजी महाराज का शीश लज्जा से झुक गया और वह बोले, ‘काश! हमारी माता भी इतनी खूबसूरत होती तो मैं भी खूबसूरत होता।’ इसके बाद अपने सेनापति को डांटते हुए उन्होंने कहा कि ‘तुम मेरे साथ रहते हुए भी मेरे स्वभाव के समझ नहीं सके। शिवाजी दूसरे की माता-बेटियों को अपनी मां के समान मानता है। अभी इनको ससम्मान इनकी माता के पास छोड़कर आओ।’
सेनापति शिवाजी के व्यवहार से काफी अचंभित हुआ। कहां तो वह अपने आपको इनाम का हकदार समझ रहा था और नसीब हुई तो सिर्फ फटकार। लेकिन मुगल सूबेदार की बहू को उसके घर पहुंचाने के उसके पास कोई चारा नहीं था। मन ही मन उसने शिवाजी महाराज के चरीत्र को पहचाना और मुगल खेमे की महिला को उसके खेमे तक पहुंचा दिया।

3.
(क्रोध में दिए गए घाव कभी नहीं भरते)
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बहुत समय पहले की बात है, एक गाँव में एक लड़का रहता था. वह बहुत ही गुस्सैल था, छोटी-छोटी बात पर अपना आप खो बैठता और लोगों को भला-बुरा कह देता. उसकी इस आदत से परेशान होकर एक दिन उसके पिता ने उसे कीलों से भरा हुआ एक थैला दिया और कहा कि, ”अब जब भी तुम्हे गुस्सा आये तो तुम इस थैले में से एक कील निकालना और बाड़े में ठोक देना।
पहले दिन उस लड़के को चालीस बार गुस्सा किया और इतनी ही कीलें बाड़े में ठोंक दी.पर धीरे-धीरे कीलों की संख्या घटने लगी,उसे लगने लगा की कीलें ठोंकने में इतनी मेहनत करने से अच्छा है कि अपने क्रोध पर काबू किया जाए और अगले कुछ हफ्तों में उसने अपने गुस्से पर बहुत हद्द तक काबू करना सीख लिया. और फिर एक दिन ऐसा आया कि उस लड़के ने पूरे दिन में एक बार भी अपना आपा नही खोया।
जब उसने अपने पिता को ये बात बताई तो उन्होंने ने फिर उसे एक काम दे दिया, उन्होंने कहा कि, ”अब हर उस दिन जिस दिन तुम एक बार भी गुस्सा ना करो इस बाड़े से एक कील निकाल निकाल देना।
लड़के ने ऐसा ही किया, और बहुत समय बाद वो दिन भी आ गया जब लड़के ने बाड़े में लगी आखिरी कील भी निकाल दी, और अपने पिता को ख़ुशी से ये बात बात बताई
तब पिताजी उसका हाथ पकड़कर उस बाड़े के पास ले गए, और बोले, ” बेटे तुमने बहुत अच्छा काम किया है, लेकिन क्या तुम बाड़े में हुए छेदों को देख पा रहे हो। अब वो बाड़ा कभी भी वैसा नहीं बन सकता जैसा वो पहले था। जब तुम क्रोध में कुछ कहते हो तो वो शब्द भी इसी तरह सामने वाले व्यक्ति पर गहरे घाव छोड़ जाते हैं।”
इसलिए अगली बार अपना आपा खोने से से पहले आप भी ये जरूर सोच लें कि ये सामने वाले पर कितना गहरा घाव छोड़ सकता है, हो सकता है उस समय आपका गुस्सा आपको जायज लगे लेकिन ये भी हो सकता है की बाद में आपको अत्यधिक पश्चाताप बावजूद भी सुकून न मिले !!
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