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पिकनिक-Picnic a new inspirational story by Maupassant in hindi language

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पिकनिक-मोपांसा-पति की आय थोड़ी थी सो गृहस्थी किसी प्रकार से चल रही थी। विवाह उपरान्त दो संताने भी हो गई। ऋण के भोझ से परिवार दब गया था। दरिद्रता पर पर्दा डालने के लिए उसने ऊपरी तौर पर टीम -टॉम बनाये रखा गया था। जब वह बीस बरस का था तब वह नौ सेना में सवा सौ रुपये पर क्लर्क की नौकरी कर ली। उसके घर के आस -पास रहनेवाले आधुनिक जीवन से अपरिचित ,ईश्वर भीरु और अभिमानी थे। धन का सर्वथा अभाव था। दरिद्रता से पीड़ित इस परिवार को दफ्तर के बड़ा बाबू की कृपा से अतिरिक्त काम का अलग से चालीस रुपये मिले। उसने पिकनिक मानाने का फैसला किया। एक बगीचे में जाने और वही भोजन करने का प्लान बनाया। हेक्टर बहुत दिनों से अपने बच्चों को कहता आ रहा था कि कभी पिकनिक पर चलेंगे। नियत समय पर गाड़ी और घोड़ा दोनों दरवाजे पर आकर खड़े हो गए घोड़ा तेज़ दम था उसने अपनी पत्नी से कहा कि देखो मैं कितनी तेज़ घुड़सवारी करता हूँ। अफसरों पर रौब डालने का इससे अच्छा कोई उपाय नहीं है। हाथ में चाबुक लिए जैसे ही उसने सवारी की। वह जीन के साथ ही नीचे गिर पडा और घोड़ा दो पैरोँ पर खड़ा होकर हिनहिनाने लगा। किसी तरह दूसरी बार डींग हाँकते हुए उसने घोडे केपीठ पर बैठकर सवारी की। . वह दम्भ में घोड़े पर उचक -उचक कर चल रहा था। सब लोग बाजार के रास्ते घर लौट रहे थे। विशाल राजपथ गाड़ियों से खचाखच भरा था बाजार के पहुंचते ही रोकने के वाउजूद घोड़ा तेज़ी से अस्तबल की तरफ भागा। गाडी पीछे छूट चुकी थी एक निर्जन सड़क पर घोड़ा सरपट दौड़ चला। तभी एक बूढी स्त्री सड़क लांघ रही थी। घोड़ा स भागा जा रहा था। रोकने में विफल होने पर वह चिल्लाया -ऐ औरत ऐ औरत। ‘ बुढ़िया शायद बहरी थी घोड़े से टकराकर वह तीन घुमण्डी खाकर वह दूर जा गिरी। घोड़ा जोर से उछाला और हेक्टर एक पुलिसमैन की गोद में जा गिरा। चार आदमी बुढ़िया को उठाकर ले आये। वह मरी सी प्रतीत होती थी। पुलिस हेक्टर को थाने ले चली पीछे भीड़ चल रही थी तभी उसकी पत्नी ,बच्चे भी चिल्लाते हुवे पहुंचे। थाने में हेक्टर ने छोटासा बयां दिया। पैंसठ की बुढ़िया उसने घोड़े के पीठ थपथपाये .को होश आ गया था और वह दर्द से कराह रही थी।
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उसे अस्पताल ले जाया गया। दूसरे दिन दफ्तर से लौटते हुवे बुढ़िया का हाल -चाल लेने अस्पताल पहुंचा। उसने बताया कि उसकी तो जिंदगी ही बर्बाद होगी ,कुछ भी फायदा नहीं हो रहा है। मैं तो हिल -डुल भी नहीं सकती . हेक्टर की तो नस -नस में कँपकँपी दौड़ गई। बुढ़िया की आँखों में कुटिलता साफ़ झलक रही थी। एक सप्ताह ,दो सप्ताह महीना गुजर गया मैडम बुढ़िया ने आरामकुर्सी नहीं त्यागी। वह अन्य रोगियों से हंस -हंस कर बाते करती पर अपनी कुर्सी पर अचल बैठी रहती। दिन -रात खाती और दिनों दिन मोटी होती जा रही थी। उसे कोयला ढोने और मजदूरी करने जैसे कार्यों से मुक्ति मिल गई थी . हेक्टर ने चार डॉक्टर को बुलाया। एक डॉक्टर ने उसे चलने को कहा तब वह चिल्ला कर बोली कि वह चल नहीं सकती। हेक्टर और उसकी पत्नी ने फैसला किया कि उस बुढ़िया को घर ले आया जाय ताकि खर्चा तो बचे। उसने नौकरानी को हटा दिया ताकि खर्चे में कटौती हो सके। उसने अन्य खर्चे भी काम किया। जब उसकी पत्नी को कहा कि उसे घर ले आया जाय तब वह यह सुनकर उछाल पड़ा। तुम यह क्या कहतीहो ?उसे घर पर रखें ? ताकि खर्चे काम हो सके उसकी स्त्री ने आँखों में आंसू भरकर कहा -‘प्यारे ,और हम कर ही क्या कर सकते हैं दोष तो मेरा नहीं था।

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