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क्या वो लड़की सचमुच चोर थी-short fiction story in hindi

short fiction story in hindi

मैं दिल्ली में काम की तलाश कर रहा था,लेकिन सिर्फ बारहवीं पास लड़के को भला कौन सा कोई अच्छा काम मिलता, ऐसा नहीं था की मुझे काम करने की आवश्यकता थी, या मुझे खाना नसीब नहीं हो रहा था,लेकिन खुद के पैरो पर खड़े होने की ललक की वजह से कुछ काम करना चाहता था, खुद अपने द्वारा कमाए हुए पैसो से अपना खर्च चलना चाहता था,लेकिन भला इतने पढ़े लिखे को कौन काम देता,काम भी वैसा होना चाहिए जिसम खुद के स्वाभिमान का ठेस ना पहुंचे ना ही अपने परिवार वालो को मेरे काम से समस्या हो.साथ में अपनी पढ़ाई भी पूरी करना चाहता था, इसलिए मैंने सुबह में कोचिंग क्लास ज्वाइन कर ली अब दिन में काम की तलाश करने लगा. अंत जुलाई था, गर्मी काफी बढ़ गयी थी, उस गर्मी में मैं काम की तलाश में इधर- उधर भटक रहा था, तभी मेरे एक दोस्त ने मुझे अपने साथ चलने को कहा,मैं तैयार हो गया. वो मुझे दिल्ली से सटे नोएडा ले गया,जहाँ एक मोल के सामने मैं और मेरा दोस्त खड़ा हो गया, जहाँ तक मुझे मालुम था मेरा दोस्त काम कर रहा था और वो भी मुझे अपने साथ काम करवाने के लिए ही ले गया था, खैर मैं भी अपने दोस्त के साथ मोल के सामने खड़ा हो गया, कुछ ही दुरी पर वेव सिनेमा हॉल नजर आ रहा था, जहाँ मैं दिल्ली आने के बाद फिल्म देख चूका था, और मुझे याद आया की मैं इस मोल में भी घूम चूका हूँ, खैर आज मुझे घूमना नहीं था, बल्कि काम करना था, कुछ देर के बाद एक अधेड़ आदमी आया जिसे देख कर मेरा दोस्त नम्रता से सर झुकाया,और मुझे भी झुकाने कको बोला, मैंने भी सर झुका के उस आदमी का नमन किया, फिर मेरे दोस्त ने बताया की वह आदमी उसका बॉस है,मैं बहुत खुश हुआ, क्योंकि पहले ही दिन मुझे बॉस से मिलने का मौका जो मिल गया था, मेरे दोस्त ने मेरा परिचय करवाया और बोला यह भी काम करना चाहता है इसलिए इसे काम दे. बॉस ने मुझसे कुछ सवालात किये फिर काम करने की अनुमति दे दी,लेकिन काम क्या था, ये मुझे नहीं मालूम था. कुछ देर खड़े रहने के बाद एक और लड़का आया उसके हाथ में एक बेग था और उसने बेग से कुछ पर्चे निकले और मेरे दोस्त के साथ मुझे भी दे दिए और बताया की शाम तक सरे पर्चे बंट जाने चाहिए,मतलब साफ़ था की मोल के सामने खड़ा हो कर परचा बाटने का काम था,और परचा खत्म होने के बाद ही 100 रूपये मिलेंगे,ये भी उसने साथ ही साथ कह दिया. अब तो मैं सोच में पड़ गया की मुझे सड़क पर खड़े हो कर परचा बाटना होगा, क्या यह सही होगा? मुझे अपने दोस्त पर गुसा आ रहा था और मन ही मन गाली देने का दिल कर रहा था, क्योंकि दिल्ली से इतनी दूर ला कर परचा बटवाने का काम दिला रहा है. खैर कर क्या कर सकता था? सोचा वापस बस पकड़ कर चला जाउ. तभी मेरे दोस्त ने मेरे मन की बात जान ली और कहा , जब इतनी दूर आ ही गए हो तो काम करके ही जाओ कुछ मिल जाएगा, वैसे भी तुम्हे यहाँ कौन जानता है? मुझे मेरे दोस्त की बात पसंद आ गयी, सच ही था, मुझे याहं कौन जानता है? मैंने पुरे मन से पर्चे बाटें, सोचा काम कैसा भी हो काम काम होता है, इसलिए पूरी ईमानदारी से मैंने काम किया और शाम तक जब सारा पर्चा बाँट लिया तो बॉस का इंतजार करने लगा, कब वो आये और कब मुझे पैसा दे? सारा दिन खाना ना खाने की वजह से भूख भी बहुत तेज लगी थी , शाम से अब रात होने को आयी तो मुझसे ना रहा गया मैंने अपने दोस्त को वापस घर चलने को कहा, तभी वो बंदा नजर आया जिसने पर्चा बाटने को दिया था, उसने बताया की बॉस नहीं आ पाएंगे, कल पैसा मिलेगा. ये सुन कर मुझे बहुत तेज गुस्सा आया लेकिन शरीर में इतनी ताकत भी नहीं थी की गुस्सा कर सकू. मैं जैसे- तैसे घर आया और खा कर सो गया, कल हो कर सारा शरीर दर्द दे रहा था, मैं काम पर नहीं गया और मुझे ऐसे काम करने भी नहीं थे. देखते ही देखते अगस्त का महीना आ गया और मैं एक बार फिर काम की तलाश कर ही रहा था की घर के पास वाले मार्किट में हॉलमार्क की दुकान में काम करने के लिए लड़का चाहिए,ऐसा लिखा हुआ मिला. मैं खुश हो गया की घर के पास ही नौकरी मिल रही है,मैं दुकान के अंदर गया तो पाया की पूरा दुकान गिफ्ट से भरा हुआ है, उस दिन मुझे मालुम हुआ की जिस तरह कार्ड, ग्रीटिंग और गिफ्ट के लिए आर्चिज प्रसिद्ध है उसी तरह हॉलमार्क भी है, मतलब साफ़ था की हॉलमार्क भी आर्चिज की तरह ही दुकान है,लेकिन मुझे ये समझ नहीं आ रहा था की पास में ही आर्चिज की दुकान है फिर हॉलमार्क में लोग क्यों खरीदने आएंगे. लेकिन मुझे क्या मुझे तो काम से मतलब था, इसलिए मैं दुकान में घुस गया और मुझसे एक लड़के ने पूछा क्या चाहिए? मैंने कहा जॉब चाहिए. लड़का बहुत खुश हुआ, उसने कहा, बाहर जाओ मैं आता हूँ. मुझे अजीब लगा की ये क्यों बाहर आएगा? फिर भी मैं उसकी बात मानते हुए दुकान के बाहर चला आया. कुछ देर के बाद लड़का दुकान से बाहर आया और उसने बताया की दुकान का मालिक यूँ ही किसी को नहीं रख लेता, मैं तुम्हे दूर का रिश्तेदार बताऊंगा और तुम हाँ में हाँ मिलाना, फिर तुम्हे जॉब मिल जायेगी, मैं बहुत खुश हुआ, भला दिल्ली जैसे शहर में भी कोई है जो दुसरो की मदद करता है. कुछ देर के बाद आने को बोल वो दुकान के अंदर चला गया. कुछ देर के बाद मैं दुकान के अंदर गया तो लड़के ने मालिक को बताया की मैं उसका दूर का रिश्तेदार हूँ और यहाँ काम की तलाश में आया हूँ, इसलिए मुझे काम पर रख ले. दुकान दार ने मुझसे प्रश्न पूछा,और काम पर रख लिया और बोला कल से आ जाओ,मैंने कहा, कल तो रविवार है,कल तो छुट्टी होनी चाहिए, इस पर दुकान दार ने बताया की यहाँ कोई छुट्टी नहीं होती 30 दिनों आना है,मैंने कहा, ठीक है. कल में तैयार हो कर तय समय पर दुकान पहुंच गया. लड़के ने साफ़- सफाई की, दुकान दार ने गिफ्ट पर लगे टैग को दिखा कर दाम समझाया फिर ग्रीटिंग कार्ड पर लगे कोड को पढ़ कर उसका दाम बताना सिखाया. मैं खुश था की मुझे कुछ सिखने को मिल रहा है. धीरे-धीरे भीड़ बढ़ने लगी, मेरी समझ में नहीं आ रहा था की कल तक इस दुकान पर भीड़ नहीं होती थी आज अचानक से इतनी भीड़ कैसे हो गयी और इतनी ज्यादा. सिर्फ लड़के और लड़की आ रहे थे, सभी चॉकलेट, गिफ्ट और फ्रेंडशिप कार्ड खरीद रहे थे, साथ में काम करने वाले लड़के ने बताया की आज फ्रेंडशिप डे है इसलिए इतनी भीड़ है, मेरी समझ में अब आया की अचानक से मालिक इतना दिलदार कैसे हो गया की तुरंत काम पर रख लिया, क्योंकि आज तो भीड़ होनी ही थी, और मेरी किस्मत आज पहला दिन और आज ही सबसे ज्यादा काम, लेकिन मैंने पूरी ईमानदारी से काम की. एक से एक खूबसूरत लड़की आ रही थी, सभी को मैं इंटरटेन कर रहा था, मेरे बात चीत के तरीके से दुकान का मालिक बहुत खुश हुआ, दिन में उसने मेरे और लड़के के लिए समोसा भी मंगवाया, मालिक ने कहा, तुम्हारे बात करने का स्टाइल बहुत अच्छा है. अभी समोसा खत्म भी नहीं हुआ था की तभी एक बार फिर से भीड़ दुकान में लग गयी, मैं सभी के जरुरत के हिसाब से कार्ड और गिफ्ट देने लगा, करीब 3 बजे न्यूज़ चैनल वाले भी दुकान में आ गए, और दुकान दार का इंटरव्यू लेने लगे, दुकान दार मुझे बुलाया लेकिन मैं नहीं गया और साथ में काम करने वाले लड़के को भेज दिया, मुझे डर था की घर बैठे अगर मम्मी पापा ने न्यूज़ चैनल पर देख लिया की मैं गिफ्ट कार्नर में काम करता हूँ तो मेरी खैर नहीं क्योंकि घर से इतनी दूर मैं दिल्ली पढ़ने आया था ना की दुकान में काम करने के लिए.इसलिए मैं कैमरे के सामने नहीं गया. शाम को एक बार फिर भीड़ जुटी तो मैं लड़कियों से बात कर रहा था, तभी एक खूबसूरत लड़की को देख मेरा दिल उससे बात करने को हो ही रहा था की मेरे साथ काम करने वाला लड़का उससे बात करने लगा और मैं दूसरी लड़की से बात करने में लग गया . वो खूबसूरत सी लड़की बिना कुछ लिए दुकान से बाहर जाने लगी तो, दूकानदार ने उससे रोका और बोला तुमने जो समान लिया है उससे वापस कर दो, लड़की मना कर रही थी, उसने गुस्सा में बोला, क्या मैं आपको चोर लगती हूँ जो आप मुझ पर चोरी का आरोप लगा रहे हैं,दूकानदार ने कहा, यहाँ सभी लड़किया ऐसे ही बोलती हैं, बाद में चोर साबित होती हैं, मुझे भी लड़की के पहनावे से उसके बात करने के अंदाजु से उसकी खूबसूरती को देख कर वो कहीं से चोर नहीं नजर आ रही थी, मुझे लगा दुकानदार को गलतफहमी हुई हैं, इसलिए उस खूबसूरत लड़की को चोर समझ रहे हैं, लड़की भी बार बार अपने ऊपर लगाए हुए इल्जाम को झूठा बता रही थी,तभी दुकानदार ने मुझे तलाशी लेने को कहा, भला मैं तलाशी कैसे लेता, मेरी हिम्मत नहीं हो पा रही थी, लड़की की तलाशी ले सकू? लेकिन मेरे साथ काम करने वाला लड़का तलाशी लेने के लिए जैसे भी आगे बढ़ा लड़की सामान वापस रख कर दुकान से चली गयी,जिसे देख कर मुझे आस्चर्य हो रहा था की भला इतनी खूबसूरत और अमीर लड़की जो कार से आयी है और जिसका पहनावा देखने लायक था, उसका ड्रेस भी मंहगा था फिर भला उसे चोरी करने की क्या जरूरत थी, इधर मैं उस लड़की के बारे में सोच ही रहा था,लेकिन दूसरी तरफ लड़के को दूकानदार खूब डांट रहा था,लड़के को बोला जा रहा था की कैसे काम करते हो की लड़की चोरी कर लेती है, अगर सामान गायब हुआ तो तुम्हारी वेतन से पैसा काट लूंगा, जिसे सुन कर लड़का रोने लगा, और रोते-रोते कहा,मैंने सोचा तुम दुकान पर काम करने आये हो तो मुझे मेरे पैसे मिल जाएंगे और मैं दुकान छोड़ दूंगा, क्योंकि दुकान डर ने एक महीने का वेतन अपने पास रखा है और कहा है जब तक दूसरा लड़का मेरी जगह नहीं ले लेता वो मुझे पूरा पैसा नहीं देगा. लड़के की बात सुन कर तब मेरी समझ में आया की लड़के ने मेरी मदद आगे बढ़ कर क्यों की? मतलब मामला ये था, खैर मालिक के व्यवहार से मैं जरूर सोच में दुब गया था रात को 10 बजने को आयी और दुकान बंद करने का समय आया तो मालिक ने मुझे और लड़के को सारा चॉकलेट गईं कर रखने को कहा, मैंने कहा यह ड्रामा क्या है? अब सारा चॉकलेट गिनना पड़ेगा, लड़के ने कहा, ये रोज का ड्रामा है, इस तरह रात के 11 बजे फुर्सत मिली एक बार फिर मैं रात को खाना खा कर सो गया और अगले दिन काम पर नहीं गया. मैंने सोच लिया था अब कहीं काम नहीं करूँगा, सिर्फ और सिर्फ पढ़ाई करूँगा.आज भी यह घटना याद आती है तो खुद पर विश्वास नहीं होता की क्या सचमुच वह लड़की चोर थी????????

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