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किस्सा दो अजूबों का-Tale of two men a new short motivational story in hindi

किस्सा दो अजूबों का
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किसी जमाने में दो अफसर थे। दोनों बड़े ही मनमौजी और तरंगी। एक बार क्या धुन समायी कि दोनों एक ऐसे द्वीप पर पहुँच गए जहां आदमी का नामो निशाँ नहीं था। दोनों अफसर ने जिंदगी भर चाकरी की थी दफ्तर में कैद लिहाज़ा दोनों कूप मंडूक थे। बस उन्हें इन शब्दों तक ही दौड़ थी -‘ अपनी वफादारी का यकीं दिलाता हूँ। कुछ वक़्त गुजरने के बाद दोनों की दफ्तर से छुट्टी हो गई। दोनों के पास अब कुछ करने -धरने को कुछ भी नहीं था। दोनों को पेंशन मिलता था और दोनों ने बावर्चिन रख लिया था। एक ने कहा -महानुभाव अभी -अभी एक सपना देखा है। एक ऐसा द्वीप देखा है जहां ना कोई आदमी है और ना ही निशान । दूसरे ने उछाल कर कहा -है राम क्या माज़रा है ?कहाँ है हम ? यह देखने के लिए कि यह सपना है या हकीकत एक दूसरे को छूने लगे। उन्हें एक ठोस हकीकत लगा। सामने समुद्र की लहरें थी। अब हम यहां क्या करेंगे ? एक ने रूवांसे भरे लहजे में कहा। ऐसा करते है आप जाएँ पूरब और मै जाऊँगा पश्चिम। शाम को इसी जगह मिलेंगे हो सकता है कोई सूरत निकल आये। पूरब और पश्चिम की तलाश शुरू हुयी। फिर उन्होंने दाएं और बाएं जाने की तरकीब निकाली। दोनों चल पड़े। दाएं जानेवाला अफसर ने देखा पेड़ फलों से लदे है। उसका मन एक सेब खाने को हुआ पर पेड़ इतने ऊँचे थे कि उन तक पहुँच पाना कठिन था। चढ़ने की कोशिश की पर बेकार। हाथ तो कुछ नहीं आया पर कमीज तार -तार हो गया। वह एक सोते के पास पहुंचा। तालाब में मछलियां अठखेलियां कर रही थी। मुंह में पानी भर आया पर पकड़ में कुछ नहीं आया। जंगल पहुंचा जंगली मुर्गे ,तीतर -बटेर हर जगह खुराक ही खुराक पर मिले कैसे ? दोनों फिर उसी नियत स्थान पर मिले खाली हाथ।
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एक ने कहा -कौन कल्पना कर सकता है कि इंसान की खुराक अपनी असली शक्ल में हवा में उड़ाती और पानी में तैरती फिर रही है। या फिर पेड़ों पर लड़ी है। दोनों के पेट में चूहे कूद रहे थे। नतीजा तो यही निकला कि यदि कोई बटेर खाना चाहे तो सबसे पहले उसे पकडे उसकी गर्दन पर छूरी चलाये फिर उसे भूने . एक अफसर ने कहा -मेरा तो ऐसा मन होता है कि अपने जूते खा जाऊं ,दूसरे ने कहा -दास्ताने भी कुछ बुरे नहीं होंगे। दोनों ने एक दूसरे को घूरा दोनों एक दूसरे की तरफ बढ़ने लगे। एक दूसरे को फाड खाने को टूट पड़े एक ने दूसरे का तमगा निगल लिया खून बहते देखा तब उन्हें होश आया। अरे राम ,राम ऐसे तो हम एक दूसरे को नोच खाएंगे। फिर बहस करने लगे। एक ने कहा -सूरज पहले निकलता है फिर छिपता है ,इसके उलट क्यों नहीं होता ? आप भी अजीब घनचक्कर आदमी है जनाब , आप तो पहले उठते है फिर दफ्तर जाते है ,कलम घिसते है फिर आराम करते है। पर इसके उलट पहले मैं नींद ले लूँ तरह -तरह के सपने देखूं फिर बिस्तर से उठूं . खाने की बात पर दोनों उदास हो गए। एक ने कहा -सूना है ,इंसान बहुत समय तक अपने शरीर में संचित रसों पर ज़िंदा रह सकता है। दोनों अफसर सिर थामकर बैठे थे। किसी भी चीज़ पर ध्यान लगाते तो फिर वह खाने पर ही आ जाता। महानुभाव हम किसी देहाती को ढूंढ लाएं वह गवार हमारे लिए पाँव रोटी लाएगा ,मछलियां पकड़ लाएगा और परिंदे भी पकड़ेगा। दोनों कोई गवाँर को ढूढ़ने निकल पड़े। उन्होंने पेड़ के नीचे लम्बे तगड़े आदमी को पड़ा देखा। बिलकुल कामचोर लगा। उठ रे आलसी ,दोनों अफसर उसे डांटने लगे। देखता नहीं हम दोनों दो दिनों से भूख से डैम तोड़ रहे है उठ और लग जा काम से / वह पेड़ पर चढ़ गया। और दस -दस सेब तोड़ लाये। जमीन खोदकर आलू निकाले। एक बटेर फाँस कर लाया। आलसी गवाँर ने कहा -अब तो आप लोग खुश है ना ? इज़ाज़त हो तो अब मैं आराम कर लूँ , आलसी व्यक्ति ने कहा। पर आराम करने से पहले एक रस्सी दे जाओ। उनलोगों ने रस्सी से देहाती को पेड़ से बाँध दिया। और खुद आराम करने लगे। उनका पेंशन जमा हो रहा था और मुफ्तखोरी से उनलोगों का तोंद भी बढ़ता चला जा रहा था , बहुत दिन बिताने के बाद उन्हें बावर्चियों की याद सताने लगी। उस आलसी व्यक्ति ने एक नाव बना डाली ताकि दोनों यहां से निकल सके। देख रे बदमाश ,हमें डुबो मत देना, प्रचंड लहरों को देखकर एक ने कहा। तसल्ली रखिये हुजूर कोई पहली बार थोड़े ही है। वह नाव खेता गया और उन्हें ताज़ी मछलियां भी खिलाता रहा। दोनों पहुँच गए सकुशल अपने घर। बावर्चिन उन्हें हट्टा कट्टा देखकर हैरान हो गई। पेंशन की इतनी रकम मिली कि पूछिए मत। उनलोगों ने देहाती को भुलाया नहीं चांदी के पांच कोपेक इनाम में दिए और वोदका भी मन भरकर पीने दिया। मज़े कर मियाँ देहाती।

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